Middle East Crisis impact on India: ईरान के साथ एक मोर्चे पर इजराइल और अमेरिका और दूसरी ओर इजराइल और लेबनान के साथ जारी संघर्षों का प्रभाव वैश्विक अर्थव्यवस्था पर स्पष्ट रूप से दिखाई देने लगा है। संयुक्त राष्ट्र की एक ताज़ा रिपोर्ट के अनुसार, इस संघर्ष के कारण भारत में लगभग 25 लाख लोग गरीबी में धकेले जा सकते हैं।
Middle East Crisis Effect on India: संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम (UNDP) की रिपोर्ट ‘मिडिल ईस्ट में सैन्य तनाव: एशिया और प्रशांत क्षेत्र में मानव विकास पर प्रभाव’ में कहा गया है कि इस संघर्ष के चलते पूरे एशिया-प्रशांत क्षेत्र में मानव विकास पर नकारात्मक दबाव बढ़ा रहा है। आवश्यक वस्तुओं की महंगाई (Inflation Rate) में लगातार बढ़ोतरी दर्ज की जा रही है। मध्य पूर्व में जारी संघर्ष के चलते दुनिया भर में 88 लाख गरीबी (Poverty in India) में धकेले जा सकते हैं। इस संघर्ष से यह अनुमान लगाया जा रहा है कि एशिया-प्रशांत क्षेत्र को 299 अरब डॉलर तक आर्थिक नुकसान हो सकता है।
ईरान-अमेरिका और इजराइल-लेबनान के बीच जारी युद्ध के चलते ईंधन, माल ढुलाई और अन्य आवश्यक वस्तुओं की लागत में तेजी से वृद्धि दर्ज की जा रही है। इसके चलते आम लोगों की क्रय शक्ति घट रही है। युद्ध के चलते दुनिया भर में खाद्य असुरक्षा बढ़ रही है। ज्यादातर देशों के सरकारी बजट पर दबाव बढ़ रहा है और लोगों की आजीविका कमजोर हो रही है। यदि ये हालत कुछ महीने और जारी रहा तो कई देशों में आर्थिक मंदी छा सकती है।
India's Poverty Rate: भारत के संदर्भ में रिपोर्ट का आकलन काफी चिंताजनक है। इसमें कहा गया है कि देश में गरीबी दर 23.9 प्रतिशत से बढ़कर 24.2 प्रतिशत तक पहुंच सकती है। इसका मतलब है कि करीब 24.64 लाख लोग अतिरिक्त रूप से गरीबी रेखा के नीचे चले जाएंगे। इस प्रकार देश में कुल गरीबों की संख्या 35.15 करोड़ से बढ़कर लगभग 35.40 करोड़ तक पहुंच सकती है।
रिपोर्ट के अनुसार, भारत को मानव विकास सूचकांक (Human Development Index) में गिरावट दर्ज की जा सकती है। भारत को इस मोर्चे पर 0.03 से 0.12 वर्ष तक का नुकसान हो सकता है। भारत के साथ, पाकिस्तान, नेपाल और वियतनाम जैसे देशों को भी इस मोर्चे पर झटके का सामना करना पड़ सकता है। रिपोर्ट में चीन पर इसका प्रभाव अपेक्षाकृत न्यूनतम रहने की संभावना जताई गई है। वहीं, ईरान में मानव विकास के स्तर पर एक से डेढ़ वर्ष तक की गिरावट देखी जा सकती है।
India's Export-Import will Impact due to Iran War: भारत, बांग्लादेश और पाकिस्तान की स्थिति इसलिए भी संवेदनशील है क्योंकि ये देश ऊर्जा और अन्य आवश्यक संसाधनों के लिए पश्चिम एशिया पर काफी हद तक निर्भर हैं। भारत अपनी जरूरत का 90 प्रतिशत से अधिक कच्चा तेल आयात करता है। भारत, पश्चिम एशिया से 40 प्रतिशत से अधिक तेल आयात करता है। इसके अलावा, घरेलू गैस (LPG) का 90 प्रतिशत हिस्सा भी इसी क्षेत्र से आता है। भारत अपनी जरूरत का लगभग 45 प्रतिशत उर्वरक पश्चिम एशिया से आयात करता है। वहीं, देश में यूरिया उत्पादन की निर्भरता भी आयातित एलएनजी पर ही है। यूरिया उत्पादन का करीब 85 प्रतिशत हिस्सा आयातित एलएनजी से होता है। फिलहाल देश के पास 6.114 मिलियन टन यूरिया का भंडार है, जो अल्पकालिक राहत प्रदान करता है, लेकिन लंबे समय तक संकट जारी रहने पर यह पर्याप्त नहीं होगा। भारत में खरीफ सीजन की बुवाई और फसलों के उत्पादन पर इसका नकारात्मक पड़ेगा और इसके चलते भविष्य में आवश्यक खाद्य वस्तुओं की कीमतों में बढ़ोतरी हो सकती है।
एलएनजी की कीमतों में वृद्धि का असर अब ऊर्जा क्षेत्र में भी दिखाई देने लगा है। भारत सहित कई एशियाई देश बिजली उत्पादन के लिए फिर से कोयले पर निर्भरता बढ़ा रहे हैं। वहीं, व्यापार पर भी इस संकट का गहरा असर पड़ रहा है। माल ढुलाई शुल्क में वृद्धि, युद्ध जोखिम बीमा, समुद्री मार्गों में बदलाव और शिपमेंट में देरी के कारण आपूर्ति श्रृंखला प्रभावित हो रही है। भारत के कुल निर्यात का 14 प्रतिशत और आयात का लगभग 20.9 प्रतिशत हिस्सा पश्चिम एशिया से जुड़ा है। इसमें 48 अरब डॉलर के गैर-तेल निर्यात जैसे बासमती चावल, चाय, रत्न और आभूषण तथा वस्त्र शामिल हैं।
रिपोर्ट में चेतावनी दी गई है कि भारत, पाकिस्तान, बांग्लादेश, नेपाल और फिलीपींस जैसे देशों में खाद्य संकट और गहरा सकता है। खाड़ी देशों में आर्थिक गतिविधियों में कमी आने से वहां काम करने वाले प्रवासी श्रमिकों की आय प्रभावित होगी, जिससे उनके द्वारा भेजी जाने वाली धनराशि (रेमिटेंस) में कमी आ सकती है। इससे इन देशों में घरेलू आय और क्रय शक्ति पर सीधा असर पड़ेगा। दुनिया में सबसे ज्यादा रेमिटेंस (125–137 अरब डॉलर प्रति वर्ष) पाने वाला देश भारत है।
अक्टूबर 2024 तक लगभग 93.7 लाख भारतीय खाड़ी सहयोग परिषद (GCC) के देशों में रह रहे थे और वे भारत के कुल रेमिटेंस का 38 से 40 प्रतिशत योगदान देते हैं। यदि इन देशों की अर्थव्यवस्था प्रभावित होती है, तो इसका सीधा असर भारत के लाखों परिवारों की आय पर पड़ेगा। युद्ध के चलते रोजगार के क्षेत्र में भी स्थिति चुनौतीपूर्ण हो सकती है। भारत में लगभग 90 प्रतिशत रोजगार अनौपचारिक क्षेत्र में है। हॉस्पिटैलिटी, फूड प्रोसेसिंग, निर्माण सामग्री, स्टील और रत्न-आभूषण जैसे उद्योगों में लागत बढ़ने, आपूर्ति में कमी और ऑर्डर रद्द होने जैसी समस्याएं सामने आ सकती हैं। इससे काम के घंटे घट सकते हैं, नौकरियां जा सकती हैं और छोटे व्यवसायों पर अस्तित्व का संकट खड़ा हो सकता है।
रिपोर्ट के अनुसार, होर्मुज़ जलडमरूमध्य के आसपास आपूर्ति बाधित होने के कारण चिकित्सा उपकरणों की लागत में लगभग 50 प्रतिशत तक वृद्धि हो सकती है, जबकि दवाओं की कीमतें पहले ही 10 से 15 प्रतिशत तक बढ़ चुकी हैं।