Migration in India: बेरोजगारी के चलते लोगों को अपनी मिट्टी, अपना परिवार छोड़कर एक राज्य से दूसरे राज्य या दूसरे देश तक जाना पड़ता है। पलायन का मसला पिछले कुछ समय से कई चुनावों में उठाया जाता रहा है। पलायन के मसले पर पढ़िए विस्तृत रिपोर्ट।
Migration from West Bengal : पश्चिम बंगाल, बिहार से लेकर नेपाल तक में चुनाव के दौरान पलायन का मुद्दा जोरशोर से उठने लगा है। बिहार विधानसभा चुनाव 2025 के दौरान जन स्वराज पार्टी के प्रमुख प्रशांत किशोर और राष्ट्रीय जनता दल के नेता तेजस्वी यादव समेत पक्ष और विपक्ष के तमाम नेताओं ने उठाया था।
बिहार से पलायन के मुद्दे को उठाने में फर्क बस इतना रहा कि विपक्ष ने जहां सत्ता पक्ष को पलायन के लिए जिम्मेदार ठहराया, वहीं बीजेपी-जदयू ने कहा कि बिहार में डबल इंजन सरकार बड़े पैमाने पर उद्योग लगाएगी और युवाओं को रोजगार दिया जाएगा। हालांकि, बिहार में विधानसभा चुनाव के नतीजों में पलायन के मुद्दे का असर दिखा नहीं। सत्ता पक्ष को भारी बहुमत मिला। नेपाल में भी मेयर से प्रधानमंत्री बने बालेन शाह ने भी खूब जोरशोर से उठाया था। उन्हें चुनाव में प्रचंड जीत भी मिली।
पश्चिम बंगाल में विधानसभा 23 और 29 अप्रैल, 2026 को होना है। जाहिर सी बात है कि विपक्षी पार्टी बीजेपी पलायन का मुद्दा जोरशोर से उठा रही है। आइए जानते हैं कि पश्चिम बंगाल समेत किन राज्यों से कितना पलायन हुआ है।
वर्ष 2011 की जनगणना के अनुसार, पश्चिम बंगाल से बड़ी संख्या में लोगों का राज्य से बाहर जाना हुआ, लेकिन यह शीर्ष राज्यों में शामिल नहीं था। पलायन में सबसे शीर्ष पर उत्तर प्रदेश रहा, जहां से 1.23 करोड़ लोगों का पलायन हो चुका था। उत्तर प्रदेश में वर्ष 2017 से भाजपा की सरकार है। बिहार से 74.53 लाख लोगों का पलायन हुआ था। यहां भी लंबे समय से नीतीश कुमार के नेतृत्व वाली ही सरकार रही है। बिहार में जदयू और बीजेपी गठबंधन की सरकार ही बनी रही। पलायन के मामले राजस्थान तीसरे नंबर पर है। यहां से 37.57 लाख आबादी पलायन का शिकार हो चुकी थी। पश्चिम बंगाल पलायन के मामले में सातवें स्थान पर है। वर्ष 2011 की जनगणना के अनुसार, यहां से 24.06 लाख लोगों का पलायन हो चुका है। इनमें 14.52 लाख महिलाएं और 9.53 लाख पुरुष शामिल थे। आइए पहले बिहार से पलायन की वजहों को समझने की कोशिश करते हैं।
बिहार से पलायन के प्रमुख गंतव्यों में दिल्ली, महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश, पंजाब, हरियाणा और गुजरात शामिल हैं। दिल्ली और एनसीआर क्षेत्र में बड़ी संख्या में बिहारी प्रवासी निर्माण, घरेलू काम और छोटे व्यवसायों में लगे हैं, जबकि महाराष्ट्र में बिहार के लोग औद्योगिक और सेवा क्षेत्र में काम करते हैं। पंजाब और हरियाणा में कृषि कार्यों के लिए बिहारी मजदूरों की मांग लंबे समय से बनी हुई है।
बिहार से बाहर जाने वालों में सबसे बड़ी संख्या युवा पुरुषों की होती है, जो रोजीरोटी की तलाश के लिए प्रवास करते हैं, जबकि महिलाओं का पलायन अधिकतर विवाह के कारण होता है। बंगाल से सबसे ज्यादा प्रवासन महिलाओं का होता है और यह शादी के चलते होता है। वर्ष 2016-17 के आर्थिक सर्वेक्षण में भी यह सामने आया कि बिहार श्रम-आधारित नेट प्रवासी के मामले में शीर्ष राज्यों में रहा। पलायन की मजबूरी के असंख्य मार्मिक दृृश्य कोरोनाकाल में देखने को मिला, जब बड़ी संख्या में प्रवासी मजदूरों ने अपने घर वापसी की।
हाल ही में नेपाल में आम चुनाव संपन्न हुआ है, जहां पलायन का मुद्दा जोरशोर से उठा। नई बालेन सरकार से अपने परिजनों की घर वापसी कराने की लोगों को बहुत उम्मीद है। नई सरकार की ईरान-इजराइल और अमेरिका के बीच एक महीने से ज्यादा समय से युद्ध जारी रहने के बाद नेपालियों को खासतौर पर खाड़ी देशों से लौटाने की होगी।
नेपाल से होने वाला पलायन मुख्य रूप से रोजगार, शिक्षा और बेहतर जीवन स्तर पाने की तलाश में होता है। नेपाल की अर्थव्यवस्था लंबे समय से अप्रवासियों के पीछे छूट गए परिवार को पैसे भेजने पर निर्भर है। विभिन्न रिपोर्टों और नेपाल सरकार तथा अंतरराष्ट्रीय एजेंसियों के आंकड़ों के अनुसार, लाखों नेपाली नागरिक विदेशों में काम कर रहे हैं।
सबसे बड़ा गंतव्य भारत है। खुली सीमा और ऐतिहासिक संबंधों के कारण अनुमानित 30–40 लाख नेपाली भारत में रहते और काम करते हैं। इसके अलावा खाड़ी देशों में नेपाल के करीब 20 लाख नेपाली रहते हैं। मलेशिया भी नेपाली प्रवासियों का बड़ा केंद्र है, जहां करीब 4-5 लाख नेपाली श्रमिक मौजूद हैं। हाल के वर्षों में दक्षिण कोरिया में रोजगार के अवसर बढ़ने के कारण लगभग 50-60 हजार नेपाली कामगार वहां गए हैं। जापान में भी शिक्षा और तकनीकी प्रशिक्षण के लिए नेपाली युवाओं की संख्या तेजी से बढ़ रही है, जहां इनकी आबादी लगभग 1 लाख के आसपास पहुंच चुकी है।
नेपाली मूल के लोग अमेरिका में लगभग 2 लाख, ब्रिटेन में करीब 1 लाख, और ऑस्ट्रेलिया में भी करीब 1 लाख रहते हैं। ब्रिटेन में गुरखा सैनिकों और उनके परिवारों की ऐतिहासिक भूमिका भी महत्वपूर्ण रही है।
पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में पलायन का मुद्दा उठ रहा है। आइए जानते हैं कि क्यों दूसरे राज्यों में पलायन करने को मजबूर हैं बंगाल के लोग।
देश में 2011 में अंतर-राज्यीय प्रवासियों की संख्या 5.43 करोड़ था। यह देश की कुल आबादी का 4.5% था, जबकि पश्चिम बंगाल का उस समय राज्य की आबादी का 2.63% था। पश्चिम बंगाल से सबसे ज्यादा प्रवासी पड़ोसी राज्य झारखंड में थे, जिनकी संख्या 4.95 लाख थी। इसके बाद महाराष्ट्र 3.1 लाख, उत्तर प्रदेश 2.34 लाख, बिहार 2.28 लाख और दिल्ली 1.82 लाख का स्थान था। दरअसल, पूरे भारत में शीर्ष 50 सबसे लोकप्रिय प्रवासन मार्गों में से दो पश्चिम बंगाल से शुरू होकर झारखंड और महाराष्ट्र तक जाते हैं।
जनगणना के आंकड़ों से यह भी पता चला कि 2001 की तुलना में 2011 में पश्चिम बंगाल से प्रवासियों की संख्या में 45% की वृद्धि हुई। संख्या के लिहाज से देखें तो इस अवधि में 7.18 लाख अधिक लोगों ने राज्य छोड़ा।
2011 में विवाह, पश्चिम बंगाल से प्रवासन का सबसे बड़ा कारण था। कुल 9.35 लाख यानी 38.88% प्रवासियों ने इस कारण को बताया। 9.35 लाख में से 9.14 लाख महिलाएं थीं। शादी के चलते पुरुषों की पलायन संख्या सिर्फ 20,000 के आसपास थी। इसके बाद रोजगार और परिवार के साथ स्थानांतरण प्रमुख कारण रहे, जिनकी हिस्सेदारी क्रमशः 5.85 लाख (24.34%) और 4.74 लाख (19.72%) थी।
जनगणना के प्रवासन संबंधी आंकड़े करीब देढ़ दशक से ज्यादा पुराने हो चुके हैं। इसके बाद वर्ष 2016-17 के आर्थिक सर्वेक्षण में ‘कोहोर्ट-आधारित माइग्रेशन मेट्रिक (CMM)’ का इस्तेमाल किया गया, जो शुद्ध प्रवासन को मापने का एक तरीका है। इसमें किसी क्षेत्र में एक जनगणना अवधि के 10-19 वर्ष आयु वर्ग की आबादी और उसी क्षेत्र में एक दशक बाद 20-29 वर्ष आयु वर्ग की आबादी के प्रतिशत बदलाव को देखा जाता है। रिपोर्ट के अनुसार, “यह मुख्य रूप से श्रम प्रवासन को दर्शाता है, क्योंकि विवाह जैसे अन्य कारणों से होने वाले द्विपक्षीय प्रवास इस गणना में संतुलित हो जाते हैं।”
वर्ष 2016-17 के आर्थिक सर्वेक्षण के अनुसार, उत्तर प्रदेश और बिहार में इस तरह का शुद्ध प्रवासन सबसे ज्यादा था और 1991-2001 तथा 2001-11 के बीच इसमें वृद्धि देखी गई। वहीं पश्चिम बंगाल में 1991-2001 के दौरान करीब 30,000 लोग (20-29 वर्ष आयु वर्ग) राज्य से बाहर गए थे, जो 2001-11 के दौरान बढ़कर 2.35 लाख हो गए।