केंद्र सरकार की 'डायनामिक ग्राउंड वॉटर असेसमेंट रिपोर्ट 2025' रिपोर्ट में खुलासे ने बढ़ाई खुशखबरी, लेकिन IIT रुड़की ने पानी पर गंभीर खतरे को लेकर चेताया... एमपी की ग्राउंड रिपोर्ट पर पत्रिका की खास पेशकश
MP News: भारत के बड़े शहरों में भूजल का स्तर खतरनाक गति से गिर रहा है। आइआइटी रुड़की के शोधकर्ताओं ने 10 लाख से अधिक आबादी वाले देश के 54 प्रमुख शहरों पर किए गए अध्ययन में इस गंभीर खतरे के प्रति आगाह किया है। हाल ही सामने आई स्टडी रिपोर्ट के अनुसार, 1996 से 2023 के बीच इन 54 में से 23 शहरों में भूजल स्तर में भारी गिरावट दर्ज की गई है। उत्तर और मध्य भारत के शहरों में यह गिरावट -0.12 से -0.45 मीटर प्रति वर्ष की दर से हो रही है।
केंद्र सरकार की 'डायनामिक ग्राउंड वॉटर असेसमेंट रिपोर्ट 2025' के अनुसार मध्यप्रदेश के 82.82 प्रतिशत निगरानी वाले कुओं में जलस्तर बढ़ा है। यह आंकड़ा राष्ट्रीय औसत 73.25 प्रतिशत से बेहतर है।
रिपोर्ट के अनुसार 1036 कुओं के डेटा में से 858 कुओं में जलस्तर बढ़ा है। इनमें से लगभग 49 प्रतिशत कुओं में 0 से 2 मीटर तक वृद्धि दर्ज की गई। 176 कुओं (लगभग 17 प्रतिशत) में जलस्तर में गिरावट भी दर्ज की गई है, जो कुछ क्षेत्रों में जलसंकट को दर्शाता है।
मालवा क्षेत्र के इंदौर, उज्जैन और शाजापुर जैसे जिले क्रिटिकल' श्रेणी में हैं। यहां भूजल दोहन 80 प्रतिशत से ज्यादा है। इससे जल संकट की आशंका बनी हुई है।
भोपाल की ताजा स्थिति की बात करें तो पीने के पानी का संकट सामने आने लगा है। राजधानी में ग्राउंड वाटर का लेवल देखते हुए बोरवेल खनन पर रोक लगा दी गई है। कलेक्टर कौशलेंद्र विक्रम सिंह ने पूरे जिले को 'जल- अभाव क्षेत्र' घोषित किया है।
यदि देशभर के राज्यों से मध्य प्रदेश की तुलना की जाए, तो मध्य प्रदेश की स्थिति राजस्थान, हरियाणा और पंजाब जैसे राज्यों से काफी बेहतर है। जहां देश के कई हिस्सों में पानी का बहुत ज्यादा दोहन यानी जरूरत से ज्यादा इस्तेमाल चिंता का विषय है, वहीं मध्य प्रदेश के 317 सरकारी ब्लॉकों में से 221 ब्लॉक यानी करीब 70% ब्लॉक पूरी तरह 'सुरक्षित' श्रेणी में हैं। इसका मतलब साफ है कि इन इलाकों में उतना ही पानी जमीन के अंदर वापस जा रहा है जितना कि लोगों द्वारा बाहर निकाला जा रहा है।
मध्य प्रदेश सरकार के प्रयासों और लोगों की जागरुकता को मध्य प्रदेश के भूजल स्तर को बेहतर करने में सफलता मिली है। यहां …
-अटल भूजल योजना: मध्य प्रदेश के जिन इलाकों को कभी जल संकटग्रस्त कहा जाता था, वहां इस योजना ने कमाल किया है। रिपोर्ट के मुताबिक, राज्य में इस योजना की वजह से भूजल गिरावट की रफ्तार में 5 मीटर तक प्रति वर्ष तक की कमी आई है। लगभग 13,493 हेक्टेयर खेती की जमीन को नई सिंचाई पद्धतियों (जैसे ड्रिप सिंचाई) से जोड़ा गया है ताकि कम पानी में ज्यादा पैदावार हो सके।
-अमृत सरोवर और तालाब योजना: अमृत सरोवर योजना के तहत राज्य में 2,901 नए तालाब बनाए और पुराने सुधारे गए हैं। ये तालाब बारिश के पानी को रोककर जमीन के अंदर भेजने का काम कर रहे हैं।
-जल शक्ति अभियान योजना: राज्य में करीब 5 लाख से ज्यादा जल संरक्षण के काम (जैसे चेक डैम, मेढ़ बंधान और सोखता गड्ढे) किए गए हैं, जिनका सीधा फायदा जमीन के जलस्तर को मिला है।
-नदी पुनर्जीवन अभियान: मध्य प्रदेश में कई छोटी नदियों और नालों के वॉटर शेड क्षेत्र में जल संरक्षण, गेबियन संरचना, ट्रेंच, और तालाब निर्माण पर जोर दिया जा रहा है।
-रूफ वाटर हार्वेस्टिंग- जल गंगा संवर्धन अभियान के तहत सरकारी और निजी भवनों पर रूफ वॉटर हार्वेंस्टिंग को अनिवार्य किया गया है। ताकि भूजल स्तर सुधारा जा सके।
बता दें कि दल संरक्षण के अभियान के तहत एमपी के 18 विभाग मिलकर काम कर रहे हैं। इनमें पंचायत एवं ग्रामीण विकास विभाग को नोडल विभाग विभाग बनाया गया है। राज्य में 1 लाख से ज्यादा जलदूत तैयार किए जा रहे हैं। ये जलदूत जल संरक्षण के प्रति जागरुकता फैलाने का काम करेंगे।
पानी में नाइट्रेट की मात्रा का ज्यादा पाया जाना दर्शाता है कि यहां खेती में यूरिया जैसी खाद को इस्तेमाल ज्यादा किया जाता है। वहीं यह स्थिति शहरों में सीवेज यानी गंदे पानी के सही निपटान में भी कमी को भी दर्शाती है।
मध्य प्रदेश - 70% (221 ब्लॉक) -जलस्तर में सुधार, अधिकांश क्षेत्र सुरक्षित श्रेणी में।
छत्तीसगढ़ - 90% से अधिक -यहां की स्थिति बहुत अच्छी है, लगभग पूरा राज्य सुरक्षित है।
महाराष्ट्र -85.24%- -जल संरक्षण के मामले में मध्य प्रदेश से थोड़ा बेहतर प्रदर्शन।
राजस्थान - अति-दोहित श्रेणी -यहां जमीन से पानी तो निकलता है लेकिन, उतना रिचार्ज नहीं हो पाता।
पंजाब/हरियाणा - अति-दोहित श्रेणी - यहां खेती के लिए पानी का जरूरत से ज्यादा इस्तेमाल (Over-extraction) सबसे बड़ी समस्या है।
मध्य प्रदेश के कुल 317 सरकारी ब्लॉकों में से 221 ब्लॉक ऐसे हैं जो पूरी तरह 'सुरक्षित' माने गए हैं। कहना होगा कि यह है वे इलाके हैं जहां उतना ही पानी निकाला जा रहा है, जितना बारिश या अन्य तरीकों से जमीन के अंदर वापस जा रहा है।
हालांकि, मालवा अंचल के इंदौर, उज्जैन, शाजापुर में जल संरक्षण अब भी चुनौती बना हुआ है। इंदौर जैसे औद्योगिक और घनी आबादी वाले क्षेत्रों को 'क्रिटिकल' या गंभीर श्रेणी में रखा है, जहां पानी का दोहन 80% से ज्यादा है।
मध्य प्रदेश में भूजल को लेकर सामने आए आंकड़े एक ऐसी तस्वीर पेश कर रहे हैं, जो एक ओर तो सुधार की स्थिति को दर्शाते हैं, वहीं दूसरी और जल संकट की बात भी करते हैं। इस विरोधाभास के बीच patrika.com ने बात की पर्यावरणविद से जानें क्या कहते हैं एक्सपर्ट?
यह विरोधाभास सामान्य है। ऐसे सरकारी आंकड़े देखें तो यह निगरानी कुओं के सीमित नेटवर्क पर आधारित होती है। जो पूरे क्षेत्र की स्थिति को नहीं दर्शाते। दूसरी ओर बड़े शहरों की स्थिति वो भी इससे साफ नहीं होती। शहरी क्षेत्रों में आबादी के मुताबिक जल की मांग तेजी से बढ़ी है। ऐसे में लोकल स्तर पर गिरावट नजर आती है। इसलिए ये दोनों ही डेटा अपने-अपने संदर्भ में सही हो सकते हैं।
भूजल स्तर में हालिया सुधार का बड़ा कारण पिछले कुछ वर्षों से अच्छा मानसून भी हो सकता है। लेकिन अगर रिचार्ज की संरचनाएं मजबूत नहीं होंगी, तो दोहन लगातार बढ़ता जा रहा है, तो यह स्थायी सुधार बिल्कुल नहीं कहा जा सकता। इसे दीर्घतालिक सुधार तभी कहा जाएगा, जब यह ट्रेंड लगातार कई वर्षों तक बना रहे।
जब किसी क्षेत्र में 70 से 80 फीसदी से अधिक भूजल का इस्तेमाल किया जा रहा है, तो उसे चेतावनी की श्रेणी माना जाता है। मालवा क्षेत्र में यही स्थिति बन रही है। यहां रिचार्ज की तुलना में दोहन ज्यादा है। यह भविष्य में जल संकट की आशंका को बल देता है। खासकर सूखे वर्षों में हालात बदतर होने का बड़ा संकेत।
इसे सीधे सिस्टम फैलियर कहना ठीक नहीं होगा। लेकिन यह इशारा जरूर है कि शहरी जल प्रबंधन पर दबाव बढ़ता जा रहा है। बोरवेल पर रोक जैसे कदम सरकारों द्वारा तब उठाए जाते हैं, जब भूजल स्तर को बचाने के लिए तत्काल नियंत्रण जरूरी हो जाता है। इसे एक तरह का प्रिवेंटिव कदम माना जा सकता है।
इसका सबसे बड़ा सॉल्यूशन तो यह होगा कि वर्षा जल संचयन को सख्ती से लागू किया जाए। इसके साथ ही भूजल दोहन पर नियंत्रण, वाटर रिसाइक्लिंग और स्थायी जल स्रोतों का संरक्षण करना जरूरी होगा। इसे बेहतर बनाने के लिए अकेले सरकारी प्रयास काफी नहीं होंगे, बल्कि आम लोगों की भागीदारी भी उतनी ही जरूरी है। तभी इस समस्या का समाधान हो पाएगा।
राज्यों में पानी की स्थिति पूरी तरह से राज्य सरकार के ही हाथ में होती है। हां केंद्र सरकार तकनीकी और आर्थिक दृष्टि से मदद करती है। लेकिन यह तस्वीर साफ है कि भूजल स्तर बढ़ने के बादजूद यदि अब भी सख्त और मजबूत कदम नहीं उठाए गए, तो इंदौर के भागीरथपुरा जैसी त्रासदी फिर से सामने आ सकती हैं।