MP News: 1 अप्रैल 2026 से देश के शहरों में कचरा प्रबंधन का तरीका पूरी तरह बदलने जा रहा है। अब तक सिर्फ नगर निगम की जिम्मेदारी माना जाने वाला कचरा अब बड़े अपार्टमेंट्स, होटलों और बड़े संस्थानों की खुद अपनी जिम्मेदारी होगा। सुप्रीम कोर्ट के हालिया आदेश के बाद यह साफ हो गया है कि आने वाले समय में कचरे को फेंकने नहीं बल्कि उसे संभालने का सिस्टम लागू होगा। उल्लंघन पर भारी जुर्माना और कानूनी कार्रवाई का प्रावधान भी...
MP News Waste Management Rule supreme court order 1 April: अब तक शहरों में कचरा घर के बाहर रख देना ही जिम्मेदारी खत्म करने जैसा मान लिया जाता है। लेकिन केंद्र सरकार के वेस्ट मैनेजमेंट के नये नियमों और सुप्रीम कोर्ट के एक आदेश के बाद 1 अप्रैल से आपको अपनी ये आदत और सोच दोनों बदलनी होगी। आज हम यहां बात कर रहे हैं सुप्रीम कोर्ट के हालिया आदेश की। जिसके बाद अब भारी मात्रा में कचरा पैदा करने वाली संस्थाओं यानी BWG (Bulk Waste Generators) को खुद ही उसे अलग करना होगा। प्रोसेस करना होगा और उसका पूरा हिसाब-किताब यानी रिकॉर्ड भी रखना होगा।
1 अप्रैल 2026 से यह बदलाव भोपाल नगर निगम vs सुभाष सी पांडे एंड अदर्स मामले में आए एक आदेश के बाद देशभर में लागू हो रहा है। जिसने कचरा प्रबंधन को सिर्फ सफाई नहीं, बल्कि जवाबदेही का अहम मुद्दा बना दिया है। अब सवाल सिर्फ यह नहीं होगा कि कचरा उठाया गया या नहीं बल्कि यह भी होगा कि उसे संभाला कैसे गया, इसकी जिम्मेदारी किसकी है? कितना कचरा था, कैसे प्रोसेस्ड किया गया? आपको जानकर हैरानी होगी कि कचरा प्रबंधन पर लागू किए जा रहे नए नियम पर दुनिया भर के उन देशों की झलक भी नजर आ रही है जो दुनिया के लिए कचरा प्रबंधन को लेकर मिसाल बने हुए हैं। यानी भारत में कचरा प्रबंधन पर सख्ती अब शुरू हो चुकी है। पढ़ें संजना कुमार की रिपोर्ट…
दरअसल यह बदलाव भोपाल नगर निगम VS पर्यावरणविद् सुभाष सी पांडे एंड अदर्स मामले में 19 फरवरी 2026 को अहम फैसला आया। 17 पन्नों के इस आदेश में सुप्रीम कोर्ट ने कचरा प्रबंधन को देश की सबसे गंभीर पर्यावरणीय समस्याओं में से एक बताया। शीर्ष कोर्ट ने राज्यों और सभी स्थानीय निकायों को निर्देश दिए कि वे सॉलिड वेस्ट मैनेजमेंट नियमों को सख्ती से लागू करें। कोर्ट ने साफ किया कि नियम बनाना ही काफी नहीं है बल्कि उसे सख्ती से लागू करना ही सही मायनों में जिम्मेदारी है।
नए नियमों का सबसे बड़ा असर BWG (Bulk Waste Generators) पर पड़ेगा। BWG के अंतर्गत बड़े अपार्टमेंट, होटल, अस्पताल, स्कूल, मॉल और बड़े ऑफिस शामिल हैं। जहां से हर दिन भारी मात्रा में कचरा निकालता है। अब तक ये संस्थाएं अपना कचरा नगर निगम के भरोसे छोड़ देती थीं। लेकिन अब उन्हें खुद से अपने कचरे का प्रबंधन करने की पूरी जिम्मेदारी उठानी होगी।
नये नियमों के मुताबिक BWG को अपने कचरे को चार हिस्सों में अलग-अलग करना होगा। गीला, सूखा, सैनेटरी वेस्ट और ई वेस्ट का अलग-अलग प्रबंधन करना होगा। सुप्रीम कोर्ट के आदेश का पालन करना औपचारिकता पूर्ण नहीं रहेगा। बल्कि यदि कचरा मिक्स या मिला-जुला पाया गया, तो सीधे जुर्माना लगाया जाएगा। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि कचरे को प्रोसेस करना आसाना हो और रीसाइक्लिंग की प्रक्रिया प्रभावी तरीके से की जा सके।
1 अप्रैल से जो सबसे बड़ा बदलाव देखने को मिलेगा वो होगा कि अब कचरा केवल उठवाना काफी नहीं होगा, बल्कि गीले कचरे को उसी परिसर में कम्पोस्टिंग या बायोमिथेनेशन के जरिए प्रोसेस करना होगा। ताकि उससे खाद या ऊर्जा तैयार की जा सके। वहीं सूखे कचरे को रीसाइक्लिंग के लिए भेजना होगा। अगर कोई संस्थान इस व्यवस्था स्वयं नहीं कर पा रहा है, तो उसे किसी सर्टिफाइड एजेंसी से यह काम करवाना होगा। यहां तक कि कचरा प्रोसेस्ड करवाने के बाद एजेंसी से इसका सर्टिफिकेट भी लेना होगा।
नए नियमों के तहत BWG को अपने कचरे का पूरा रिकॉर्ड तैयार करके रखना होगा। कितना कचरा पैदा हुआ, उसे कैसे अलग-अलग किया गया। किस तरीके से प्रोसेस किया गया, इन सभी जानकारियों को नियमित रूप से नगर निगम के साथ ही सेंट्रल पॉल्यूशन कंट्रोल बोर्ड की वेबसाइट पर भी सारा डाया अपलोड करना होगा। यह प्रक्रिया अनिवार्य रूप से की जाएगी। यानी अब कचरा प्रबंधन पूरी तरह से मॉनिटरिंग के दायरे में आ जाएगा।
अगर कोई संस्थान नियमों की अनदेखी करता है, तो फिर उसे सख्त कार्रवाई के लिए भी तैयार रहना होगा। नए आदेश के मुताबिक अब न केवल भारी जुर्माना बल्कि क्रिमिनल केस भी दर्ज किया जा सकेगा। यानी कानूनी कार्रवाई भी की जा सकेगी। लाइसेंस रद्द होने से लेकर क्रिमिनल प्रोसिक्यूशन तक का प्रावधान किया गया है। यह पहली बार है कि जब कचरा प्रबंधन को लेकर इतनी सख्ती की गई है।
कचरा प्रबंधन के नये नियमों के लागू होने के बाद शहरों की तस्वीर बदल सकती है। बड़े अपार्टमेंट्स और संस्थानों में कम्पोस्ट प्लांट लगे नजर आ सकते हैं। होटल और मॉल अपने स्तर पर कचरे को प्रोसेस करेंगे और नगर निगम का बोझ कम हो जाएगा। सबसे बड़ा असर डंपिंग ग्राउंड्स पर होगा, जहां कचरे का दबाव कम होने की उम्मीद है।
हालांकि नए नियम सीधे तौर पर BWG पर लागू होते हैं, लेकिन इसका असर आम लोगों तक भी नजर आएगा। अपार्टमेंट्स में रहने वालों को कचरा अलग-अलग करके रखना अनिवार्य होगा। मेंटनेंस चार्ज बढ़ने की संभावना है। इससे रेजिडेंट वेलफेयर एसोसिएशनों की जिम्मेदारी भी बढ़ेगी। क्योंकि अब उन्हें अपने परिसर के कचरे का पूरा हिसाब-किताब रखना होगा।
भारत में हर साल करोड़ों टन कचरा पैदा होता है। इसका बड़ा हिस्सा बिना प्रोसेस किए खुले में डंप कर दिया जाता है। इसका असर यह होता है कि जमीन, पानी और हवा तीनों प्रभावित होते हैं। यही वजह है कि सुप्रीम कोर्ट को सीधे हस्तक्षेप करना पड़ा और कचरा प्रबंधन को एक सख्त जिम्मेदारी के रूप में लागू करना पड़ा।
इससे साफ है कि एक अप्रैल से शुरू हो रहा कचरा प्रबंधन का यह नया सिस्टम सिर्फ नियमों में बदलाव नहीं है, बल्कि शहरों की जीवन शैली और जिम्मेदारी की नई परिभाषा गणना है। जहां कचरा अब बोझ नहीं बल्कि हर आम की जवाबदेही बन जाएगा।
भारत में लागू होने वाला कचरा प्रबंधन का यह सिस्टम दुनिया के उन देशों की तर्ज पर बना है जहां कचरा सिर्फ सरकार की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि हर व्यक्ति और संस्थान की जिम्मेदारी और जवाबदेही दोनों माना जाता है। जापान का अनुशासन, जर्मनी का कानून, स्वीडन की टेक्नोलॉजी और सिंगापुर की सख्ती, इन सभी मॉडलों की झलक अब भारतीय शहरों में देखने को मिलेगी।
दुनिया भर में जब कचरे के प्रबंधन की बात की जाती है, तो नाम आता है जापान। जहां कचरा प्रबंधन के नियम इतने डिटेल में है कि कई जगह 10-15 कैटेगरी तक होदी हैं। लोग तय दिन और समय पर ही कचरा अपने घरों के बाहर रख देते हैं। अगर किसी ने भी कचरे का गलत तरीके से बाहर रखा तो, उसे वापस उसी घर के बाहर रख दिया जाता है। यानी यहां सार्वजनिक शर्मिंदगी भी एक सजा है।
-जबकि हमारे देश में चार कैटेगरी वाला ही नियम है, वह जापान के मॉडल का एक सरल रूप माना जा सकता है।
जर्मनी में कचरा प्रबंधन पूरी तरह कानून से ही चलता है। यहां Extended Producer Responsibility लागू है, यानी जो प्रोडक्ट बनाता है, उसकी पैकेजिंग का कचरा भी वही संभालेगा। यहां प्लास्टिक बोतल खरीदते समय लोग Pfand (डिपॉजिट) देते हैं। जो खाली बोतल लौटाने पर वापस मिल जाता है।
-भारत में BWG के लिए आया नियम- 'जनरेट करो तो मैनेज करो' जर्मनी के इसी सिद्धांत से मेल खाता है।
स्वीडन ने कचरे को एक समस्या नहीं बल्कि एक संसाधन बना दिया है। यहां 50 प्रतिशत से ज्याद कचरे को ऊर्जा यानी बिजली और हिटिंग में बदला जाता है। स्थिति यह है कि स्वीडन को अपने प्लांट चलाने के लिए दूसरे देशों से कचरा आयात करना पड़ता है।
-जबकि भारत में बायोमिथेनेशन और कम्पोस्टिंग पर जोर दिया गया है, वह इसी सोच की शुरुआती दिशा है।
सिंगापुर अपने सख्त नियमों के लिए जाना जाता है। यहां सड़क पर कचरा फेंकने पर भारी जुर्माना और कई मामलों में सामुदायिक सजा भी मिलती है। देश का ज्यादातर कचरा इंसीनिरेशन प्लांट में जलाकर ऊर्जा में बदला जाता है। वहीं बचा हुआ कचरा समुद्र के बीच बने लैंडफिल में जाता है।
-वहीं भारत में जो क्रिमिनल प्रोसिक्यूशन का प्रावधान आया है, वह सिंगापुर जैसे मॉडलों की झलक देता है।

Q. आपको यह मामला सुप्रीम कोर्ट ऑफ इंडिया तक ले जाने की जरूरत क्यों पड़ी? जमीनी स्तर पर ऐसी काय बड़ी कमी थी?
Q. कोर्ट ने 'जो कचरा पैदा करे, वही मैनेज करे' का सिद्धांत लागू करने की बात कही है, क्या आपको लगता है कि भारत में यह व्यवहार में सच में लागू हो पाएगा?'
Q. Waste Generators पर जो जिम्मेदारी डाली गई है, क्या हमारे शहरों के पास उतना इंफ्रास्ट्रक्चर और तैयारी है?'
Q. अब तक कचरा प्रबंधन के नियम लागू नहीं हो पाए, आपकी नजर में सबसे बड़ी विफलता किसकी रही?
Q. अगर ये नए नियम सही से लागू हो गए तो, 5 साल बाद भारतीय शहरों की तस्वीर कैसी होगी? और अगर लागू नहीं हुए तो सबसे बड़ा खतरा क्या है?