
Muscle Breakdown Disease: भागदौड़ की जिंदगी है, लेकिन कुछ वक्त निकालिए और सोचिए… एक व्यक्ति रोज की तरह जिम गया। कुछ घंटे बाद शरीर में असहनीय दर्द शुरू हुआ, हाथ-पैरों ने जवाब देना शुरू कर दिया और पेशाब का रंग चाय या कोला जैसा गहरा हो गया। अस्पताल पहुंचे जांच हुई तो पता चला कि उसकी मसल्स तेजी से टूट रही हैं और उनसे निकलने वाला प्रोटीन खून में घुलकर किडनियों तक पहुंच चुका है। डॉक्टर्स कह दें, अगर इलाज में जरा भी देर करते, तो मरीज की जान भी जा सकती थी।
यह कोई फिल्मी कहानी नहीं है, बल्कि रैब्डोमायोलिसिस (Rhabdomyolysis) नामक गंभीर मेडिकल इमरजेंसी है। कभी युद्ध और भूकंप में दबे लोगों की समस्या मानी जाने वाली यह बीमारी दुनिया भर में आम हो चली है और भारत भी इससे अछूता नहीं रहा है। आज रैब्डोमायोलिसिस जिम, हीट स्ट्रोक, वायरल संक्रमण, दवाओं और यहां तक कि अत्यधिक व्यायाम करने वाले युवाओं में भी सामने आ रही है। एमडी मेडिसिन डॉ. विनोद कोठारी से patrika.com ने की बात...
Rhabdomyolysis ग्रीक भाषा का शब्द है। जो तीन शब्दों से मिलकर बना है। 'Rhabdo' का अर्थ है धारीदार, 'Myo' यानी मांसपेशी, जबकि Lysis' का मतलब टूटना या नष्ट होना। जब शरीर की मांसपेशियां किसी कारण से तेजी से टूटने लगती हैं, तो उनमें मौजूद मायोग्लोबिन, क्रिएटिन किनसे (Creatine Kinase), पोटैशियम और अन्य रसायन खून में मिल जाते हैं। मायोग्लोबिन अधिक मात्रा में किडनी तक पहुंच जाता है और उसे नुकसान पहुंचा सकता है। वहीं गंभीर मामलों में एक्यूट किडनी इंजरी (Acute Kidney Injury) का कारण बन सकता है। यही स्थिति Rhabdomyolysis कहलाती है।
मांसपेशियों के टूटने की समस्या को डॉक्टर लगभग 100 साल पहले ही समझ पाए थे। 1923 में पहली बार इसे वैज्ञानिक पहचान मिली। जापान के डॉ. सीगो मिनामी ने पहली बार गंभीर मांसपेशी क्षति और उसके बाद किडनी फेल होने के बीच संबंध का वैज्ञानिक वर्णन किया। यह इस बीमारी को समझने की शुरुआती कड़ी थी।
द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान जर्मनी की बमबारी लंदन ब्लिट्ज में हजारों लोग इमारतों के मलबे में दब गए। चौंकाने वाली बात यह थी कि कई लोग बच तो गए, लेकिन कुछ दिनों बाद उनकी किडनी ने काम करना बंद कर दिया।
उस समय ब्रिटेन के मशहूर डॉक्टर सर एरिक ब्यावर और डेसमंड बील ने इन मरीजों का अध्ययन किया और पाया कि लंबे समय तक दबे रहने से मांसपेशियां टूट जाती हैं। इन टूटी मसल्स से निकलने वाला मायोग्लोबीन किडनी को नुकसान पहुंचाता है। इसी शोध के बाद क्रश सिंड्रोम और रैब्डोमायोलिसिस को आधुनिक चिकित्सा में अलग पहचान मिली। यही शोध आज भी इस बीमारी को समझने की नींव माना जाता है।
एमडी मेडिसिन डॉ. विनोद कोठारी बताते हैं कि मान लीजिए आपकी मांसपेशियां एक मजबूत दीवार हैं। जब किसी कारण से यह दीवार टूटती है, तो उसके अंदर मौजूद पदार्थ सीधे खून में फैल जाते हैं। इनमें सबसे महत्वपूर्ण है मायोग्लोबिन। यह सामान्य मात्रा में नुकसान नहीं पहुंचाता, लेकिन जब बहुत ज्यादा मात्रा में निकलता है, तो किडनी की महीन नलिकाओं में जमा होकर उन्हें बंद कर सकता है।
100 साल पहले सामने आई इस बीमारी से पहले आम लोग नहीं, बल्कि, युद्ध में घायल सैनिकों को, भूकंप में दबे लोगों को, सड़क दुर्घटना के शिकार लोगों को अपना शिकार बनाती थी। लेकिन पिछले दो दशकों में यह तस्वीर बदली है। आज डॉक्टरों के सामने ऐसे मरीज भी आ रहे हैं, जिन्हें पहली बार बहुत भारी जिम वर्कआउट कराया गया, जिन्हें भीषण गर्मी में लंबे समय तक काम करना पड़ा, जिन्होंने मैराथन या अल्ट्रा रनिंग की, किसी को वायरल संक्रमण हुआ या कुछ दवाओं का दुष्प्रभाव हुआ हो, वह भी इस बीमारी का सामना कर रहे हैं। डॉ. कोठारी कहते हैं कि अब यह बीमारी केवल दुर्घटना से जुड़ी बीमारी नहीं रह गई।
डॉ. कोठारी बताते हैं कि मसल्स टूटने के पीछे एक नहीं कई कारण हो सकते हैं-
जब शरीर का तापमान 40 डिग्री सेंटीग्रेट या उससे अधिक हो जाता है, तो मांसपेशियों की कोशिकाएं गर्मी की वजह से क्षतिग्रस्त होने लगती हैं। कोशिकाओं की दीवार टूटने पर उनमें मौजूद मायोग्लोबिन और अन्य पदार्थ खून में निकल जाते हैं, इससे Rhabdomyolysis रोग हो सकता है।
बिना तैयारी या वॉर्म किए ही भारी जिम, मैराथन या फिर हाई-इंटेंसिटी वर्कआउट करने से भी मांसपेशियों पर उनकी क्षमता से ज्यादा प्रेशर पड़ता है। इससे मांसपेशियों के सूक्ष्म रेशे फटने लगते हैं और गंभीर मामलों में उनका टूटना तेजी से बढ़ सकता है। सामान्य व्यायाम के बाद होने वाली हल्की मांसपेशी टूट-फूट शरीर की प्राकृतिक प्रक्रिया है और उसी से मांसपेशियां मजबूत बनती हैं। Rhabdomyolysis तब होता है जब यह क्षति असामान्य रूप से बहुत अधिक हो जाती है और टूटे हुए मांसपेशी प्रोटीन खून में बड़ी मात्रा में पहुंचने लगते हैं। यही स्थिति जानलेवा भी बन सकती है।
किसी भारी वस्तु के नीचे लंबे समय तक दबे रहने से खून और ऑक्सीजन की आपूर्ति मांसपेशियों तक पहुंचने में रुकावट आ जाती है। इसके बाद जब अचानक दबाव हटता है, तो क्षतिग्रस्त कोशिकाएं एक साथ टूटती हैं और बड़ी मात्रा में मायोग्लोबिन खून में छोड़ देती हैं।
इन्फ्लुएंजा, कोविड- 19 (COVID-19) और कुछ अन्य वायरस सीधे मांसपेशियों में सूजन पैदा कर सकते हैं। शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता और वायरस का असर मिलकर मांसपेशियों की कोशिकाओं को नुकसान पहुंचा सकता है।
कुछ दवाएं भी इसका कारण हो सकती हैं। जैसे कोलेस्ट्रॉल कम करने वाली स्टैटिन (Statin) दवाओं से बहुत कम मामलों में मांसपेशियों की कोशिकाओं में ऊर्जा बनने की प्रक्रिया प्रभावित हो सकती है। इससे कोशिकाएं कमजोर होकर टूटने लगती हैं, खासकर यदि अन्य जोखिम कारक भी मौजूद हों।
अत्यधिक शराब या कुछ नशीले पदार्थ लंबे समय तक बेहोशी, निर्जलीकरण और मांसपेशियों पर लगातार दबाव का कारण बन सकते हैं। इससे मांसपेशियां क्षतिग्रस्त होकर टूटने लगती हैं।
कुछ जहरीले सांप या किसी जीव के जहर में ऐसे विष (Myotoxins) होते हैं जो, सीधे मांसपेशियों की कोशिकाओं को नष्ट करते हैं। यही कारण है कि कुछ सर्पदंश के मामलों में Rhabdomyolysis विकसित हो सकता है।
तेज बिजली का झटका लगने से मसल्स अचानक और बहुत तेजी से सिकुड़ती हैं। इससे मांसपेशियों के रेशे फट सकते हैं और उनमें गंभीर क्षति हो सकती है।
यदि कोई व्यक्ति कई घंटों तक बेहोशी की हालत में और एक ही स्थिति में पड़ा रहे, तो शरीर के किसी हिस्से की मांसपेशियों पर लगातार दबाव बना रहता है। इससे वहां रक्त प्रवाह कम हो जाता है और मांसपेशियां क्षतिग्रस्त होकर टूट सकती हैं।
अमेरिकन अकेडमी ऑफ फैमिली फिजिशियन (AAFP), एनसीबीआ और StatePearls के मुताबिक अमेरिका में हर साल करीब 26000 से ज्यादा मामले Rhabdomyolysis के दर्ज किए जाते हैं। एक्सपर्ट्स का मानना है कि असल संख्या इससे भी कहीं ज्यादा हो सकती है। क्योंकि कई सामान्य मामले तो सामने ही नहीं आ पाते। रिपोर्ट बताती है कि अमेरिका, यूरोप और जापान में इस बीमारी पर सबसे ज्यादा शोध हुए हैं।
एक्सपर्ट्स बताते हैं कि पुरुषों में Rhabdomyolysis के मामले ज्यादा देखे जाते हैं, क्योंकि महिलाओं की अपेक्षा ज्यादा भारी शारीरिक श्रम, हाई-इंटेंसिटी एक्सरसाइज और जोखिम वाले कार्य करते हैं। हालांकि यह बीमारी किसी भी उम्र और किसी भी लिंग के व्यक्ति को हो सकती है।
डॉ. कोठारी कहते हैं इसके लिए Creatime Kiase (CK) सबसे जरूरी जांच है। मायोग्लोबिन टेस्ट यह ब्लड या यूरिन दोनों के टेस्ट से पता लगाया जाता है। इसके साथ ही इलेक्ट्रोलाइट्स जैसे पोटैशियम, कैल्शियम और फॉस्फेट का टेस्ट करवाया जाता है। वहीं यूरीन टेस्ट के माध्यम से भी इसका पता लगाया जाता है कि यह कितना गंभीर स्तर पर है।
इसके इलाज के लिए डॉक्टर्स तुरंत IV Fluids देते हैं। इलेक्ट्रोलाइट असंतुलन को कंट्रोल करना होता है। इसके बाद किस कारण से यह बीमारी हुई है, उसका ट्रीटमेंट शुरू किया जाता है। गंभीर मामलों में किडनी खराब होने पर डायलिसिस की जरूरत भी पड़ सकती है।
यदि बीमारी की पहचान शुरुआत में ही हो जाए और समय पर इलाज शुरू कर दिया जाए, तो ज्यादातर मरीज पूरी तरह से रिकवर हो सकते हैं। लेकिन इलाज में देरी से किडनी फेल, दिल कमजोर होना और कई अंगों के प्रबावित होने का खतरा बढ़ता है। जिससे मरीज की जान भी जा सकती है।