Teejan Bai in NCERT Syllabus: छत्तीसगढ़ के नए सिलेबस में अब तीजनबाई, बस्तर दशहरा और लोक संस्कृति से जुड़े विषय शामिल किए गए हैं। इसका उद्देश्य बच्चों को अपनी माटी, परंपरा और लोक पहचान से जोड़ना है।
Teejan Bai in NCERT Syllabus: छत्तीसगढ़ के स्कूली शिक्षा पाठ्यक्रम में अब प्रदेश की माटी, लोक संस्कृति और पारंपरिक विरासत की खुशबू महसूस होगी। नए शैक्षणिक सत्र से कक्षा चौथी और सातवीं के विद्यार्थियों को सिर्फ किताबों का ज्ञान ही नहीं, बल्कि अपनी जड़ों और लोक पहचान से जुड़ने का अवसर भी मिलेगा। राज्य शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद ने एनसीईआरटी की नई शिक्षा नीति के अनुरूप पाठ्यक्रम में बड़े बदलाव किए हैं। नए सिलेबस में छत्तीसगढ़ की लोककला, लोक परंपराएं, बस्तर दशहरा, सड़क सुरक्षा, प्राथमिक उपचार और सामाजिक जागरूकता जैसे विषयों को शामिल किया गया है। सबसे खास बात यह है कि अब बच्चे पद्म विभूषण से सम्मानित प्रसिद्ध पंडवानी गायिका Teejan Bai के जीवन और संघर्ष के बारे में भी पढ़ेंगे।
शिक्षा विभाग का मानना है कि केवल किताबों तक सीमित शिक्षा बच्चों के समग्र विकास के लिए पर्याप्त नहीं है। इसलिए नए पाठ्यक्रम में स्थानीय संस्कृति और व्यावहारिक जीवन से जुड़े विषयों को शामिल किया गया है, ताकि बच्चे अपनी परंपराओं, लोककला और सामाजिक जिम्मेदारियों को बेहतर तरीके से समझ सकें। चौथी कक्षा की हिंदी पुस्तक में लगभग 30 प्रतिशत बदलाव किए गए हैं, जबकि सातवीं कक्षा के हिंदी विषय में करीब 25 प्रतिशत नए विषय जोड़े गए हैं।
नए पाठ्यक्रम में सबसे अधिक चर्चा का विषय बनी हैं पंडवानी गायिका तीजनबाई। छत्तीसगढ़ की लोकगायन परंपरा को दुनिया भर में पहचान दिलाने वाली तीजनबाई का जीवन अब स्कूली बच्चों के लिए प्रेरणा बनेगा।
Teejan Bai छत्तीसगढ़ की प्रसिद्ध पंडवानी लोकगायिका हैं, जिन्होंने महाभारत की कहानियों को लोक शैली में प्रस्तुत कर अंतरराष्ट्रीय पहचान बनाई। उनका जन्म दुर्ग जिले के एक साधारण परिवार में हुआ था। बेहद कठिन परिस्थितियों में पली-बढ़ीं तीजनबाई ने सामाजिक विरोध और आर्थिक संघर्षों के बावजूद अपनी कला को नहीं छोड़ा। उन्होंने पारंपरिक पंडवानी गायन को नया स्वरूप दिया और पुरुष प्रधान मानी जाने वाली इस कला में महिलाओं की मजबूत पहचान स्थापित की।
तीजनबाई की कला और योगदान को देश-विदेश में सम्मान मिला। उन्हें भारत सरकार द्वारा पद्मश्री, पद्मभूषण और बाद में देश के दूसरे सबसे बड़े नागरिक सम्मान पद्म विभूषण से सम्मानित किया गया। उनकी आवाज और प्रस्तुति शैली ने छत्तीसगढ़ की लोकसंस्कृति को अंतरराष्ट्रीय मंच तक पहुंचाया। आज वे प्रदेश की सांस्कृतिक पहचान का सबसे बड़ा चेहरा मानी जाती हैं।
शिक्षाविदों का मानना है कि तीजनबाई का जीवन बच्चों के लिए संघर्ष, आत्मविश्वास और प्रतिभा का प्रेरणादायक उदाहरण है। उनकी कहानी से विद्यार्थी यह समझ सकेंगे कि सीमित संसाधनों के बावजूद मेहनत और लगन से वैश्विक पहचान बनाई जा सकती है। इसके साथ ही बच्चों को छत्तीसगढ़ की लोककला और पंडवानी जैसी पारंपरिक कला विधाओं के बारे में भी जानकारी मिलेगी।
नए पाठ्यक्रम में केवल पंडवानी गायिका Teejan Bai की जीवनी ही नहीं, बल्कि छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक पहचान से जुड़े कई महत्वपूर्ण विषयों को भी शामिल किया गया है। विद्यार्थियों को अब बस्तर दशहरा, मितानी लोककला और करिया बादर जैसी पारंपरिक लोक विरासत के बारे में पढ़ाया जाएगा। इन विषयों के जरिए बच्चों को प्रदेश की लोक परंपराओं, आदिवासी संस्कृति और सामाजिक मूल्यों से जोड़ने की कोशिश की गई है, ताकि नई पीढ़ी अपनी माटी और सांस्
बस्तर दशहरा देश के सबसे लंबे समय तक चलने वाले त्योहारों में गिना जाता है। यह केवल धार्मिक आयोजन नहीं बल्कि आदिवासी संस्कृति, परंपरा और सामाजिक एकता का प्रतीक माना जाता है।
मितानी छत्तीसगढ़ की पारंपरिक लोककला है, जो ग्रामीण जीवन और लोक संस्कृति की झलक दिखाती है। इसे सिलेबस में शामिल करने का उद्देश्य बच्चों को अपनी सांस्कृतिक विरासत से जोड़ना है।
नए पाठ्यक्रम में केवल सांस्कृतिक और लोक परंपराओं से जुड़े विषयों को ही नहीं, बल्कि बच्चों के व्यावहारिक और सामाजिक विकास को ध्यान में रखते हुए कई उपयोगी अध्याय भी जोड़े गए हैं। इसमें सड़क चिन्ह और सड़क संकेत, प्राथमिक उपचार, नशे के दुष्प्रभाव से बचपन बचाएं और ‘खरीदारी के मजे’ जैसे अध्याय शामिल हैं। खासतौर पर गणित को रोजमर्रा की जिंदगी से जोड़ने के लिए व्यावहारिक उदाहरणों पर जोर दिया गया है। इन विषयों का उद्देश्य विद्यार्थियों को किताबों के साथ-साथ दैनिक जीवन में जरूरी समझ और जागरूकता प्रदान करना है।
गणित विषय को अधिक रोचक और व्यवहारिक बनाने के लिए “खरीदारी के मजे” नामक अध्याय जोड़ा गया है। इसके जरिए बच्चों को दैनिक जीवन में गणित के उपयोग को समझाया जाएगा। आर्ट एजुकेशन में “नृत्य मेरे आस-पास” अध्याय को बदलकर “आस-पास के नृत्य” किया गया है, जिससे स्थानीय लोकनृत्यों और सांस्कृतिक गतिविधियों की जानकारी दी जा सके।
सातवीं कक्षा के संस्कृत विषय में “सिहावा शैलजा” नामक नया अध्याय जोड़ा गया है। वहीं अंग्रेजी विषय में “ट्रेवल” की जगह “फ्रॉम अ रेलवे कैरेज” को शामिल किया गया है।
शिक्षा विशेषज्ञों के अनुसार यह बदलाव राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) की उस सोच को आगे बढ़ाते हैं, जिसमें स्थानीय भाषा, संस्कृति और व्यावहारिक शिक्षा पर जोर दिया गया है। विशेषज्ञ मानते हैं कि इससे बच्चों में अपनी संस्कृति के प्रति गर्व की भावना विकसित होगी और पढ़ाई को ज्यादा रोचक बनाया जा सकेगा।
नया पाठ्यक्रम केवल किताबों तक सीमित बदलाव नहीं बल्कि बच्चों को अपनी जड़ों से जोड़ने की कोशिश माना जा रहा है। शिक्षा विभाग का उद्देश्य है कि विद्यार्थी आधुनिक ज्ञान के साथ अपनी लोक परंपराओं और सांस्कृतिक विरासत को भी समझें। तीजनबाई जैसी लोक कलाकारों की कहानियां अब केवल मंचों तक सीमित नहीं रहेंगी, बल्कि स्कूलों की किताबों के जरिए नई पीढ़ी तक पहुंचेंगी।