Pending Cases in India: एनसीईआरटी (NCERT) की कक्षा 8 की पुस्तक में एक अध्याय में भारत की न्यायपालिका में भ्रष्टाचार और लंबित मामलों के बारे में बताया गया है। आइए जानते हैं कि देश के जिला अदालत, फास्ट ट्रैक से लेकर सुप्रीम कोर्ट में लंबित मामलों में क्या हालात हैं?
Pending Cases in Courts of India: एनसीईआरटी द्वारा जारी कक्षा 8 (NCERT’s new Class 8 book) की नई सामाजिक विज्ञान की पाठ्यपुस्तक में भारत की न्यायिक प्रणाली के सामने मौजूद प्रमुख चुनौतियों के रूप में भ्रष्टाचार, मामलों का भारी बैकलॉग (Pending Cases in Courts of India) और जजों की कमी को रेखांकित किया गया है। इससे एक कोर्टों में लंबित मामलों और जजों के खाली पदों को लेकर बहस शुरू हो गई है। इसके साथ ही इस पर यह भी चर्चा होने की लगी कि न्यायपालिका के आधुनिकीकरण के लिए क्या किया जा रहा है?
सामाजिक विज्ञान की संशोधित अध्याय जिसका शीर्षक “The Role of the Judiciary in Our Society” है, अब केवल अदालतों की संरचना और पदानुक्रम समझाने तक सीमित नहीं है, बल्कि न्याय वितरण प्रणाली को प्रभावित करने वाले तंत्रगत (सिस्टमिक) मुद्दों की भी चर्चा करता है। पहले के संस्करण मुख्य रूप से अदालतों के संगठन और कार्यों पर केंद्रित थे।
“न्यायपालिका में भ्रष्टाचार” पर एक अलग खंड में उल्लेख किया गया है कि न्यायाधीश आचार संहिता से बंधे होते हैं, जो अदालत के भीतर ही नहीं बल्कि उसके बाहर भी उनके व्यवहार को नियंत्रित करती है।
अध्याय में यह कहा गया है, 'लोग न्यायपालिका के विभिन्न स्तरों पर भ्रष्टाचार का अनुभव करते हैं। गरीब और वंचित वर्गों के लिए यह न्याय तक पहुंच की समस्या को और गंभीर बना सकता है। इसलिए राज्य और केंद्र स्तर पर न्यायिक प्रणाली में विश्वास कायम करने और पारदर्शिता बढ़ाने के लिए लगातार प्रयास किए जा रहे हैं, जिनमें तकनीक का उपयोग भी शामिल है, और जहां कहीं भी भ्रष्टाचार के मामले सामने आते हैं, वहां त्वरित और निर्णायक कार्रवाई की जाती है।”
इस पुस्तक में विभिन्न अदालतों में लंबित मामलों के पैमाने को भी रेखांकित किया गया है। किताब में बताया गया है कि सुप्रीम कोर्ट में लगभग 81,000 मामले लंबित हैं, सभी हाईकोर्ट में लगभग 62.40 लाख मामले लंबित हैं। वहीं जिला और अधीनस्थ अदालतों में लगभग 4.70 करोड़ मामले लंबित हैं।
देश के 25 हाईकोर्टों में कुल 1,122 जजों के पद स्वीकृत हैं, जिसमें से लगभग 309 पद रिक्त हैं, यानी करीब 27.5% पद खाली हैं। सबसे अधिक स्वीकृत पद इलाहाबाद हाई कोर्ट (Allahabad High Court) में (160) हैं, जहां रिक्तियों की संख्या भी सबसे ज्यादा है। इसके बाद बॉम्बे हाई कोर्ट (Bombay High Court), दिल्ली हाई कोर्ट (Delhi High Court), और मद्रास हाई कोर्ट (Madras High Court) जैसे बड़े हाईकोर्टों में भी कई पद खाली हैं।
हालांकि, ये आंकड़े 2017 से 2021 के बीच के हैं। वहीं सरकारी आंकड़ों के अनुसार, सुप्रीम कोर्ट में लंबित मामलों की संख्या 2023 में 82,674 से बढ़कर 31 दिसंबर 2025 तक 92,101 हो गई, जो लगभग 11.4 प्रतिशत की वृद्धि दर्शाती है। इसी अवधि में देश की सभी अदालतों में कुल लंबित मामलों की संख्या 5,11,88,805 से बढ़कर 5,41,15,452 करोड़ हो गई।
वर्तमान में सुप्रीम कोर्ट में स्वीकृत 34 जज के पदों के मुकाबले एक पद रिक्त है। देश के 25 हाईकोर्टों में कुल 1,122 स्वीकृत जज के पदों में से 309 पद खाली हैं और यह कुल संख्या का लगभग 27.5 प्रतिशत है। जिला अदालतों में 25,894 स्वीकृत पदों के मुकाबले 4,848 पद रिक्त हैं, यानी लगभग 18.7 प्रतिशत पद खाली हैं।
| हाईकोर्ट | कुल स्वीकृत जजों की संख्या | रिक्त पद (लगभग) |
|---|---|---|
| इलाहाबाद हाईकोर्ट | 160 | 76 |
| बॉम्बे हाईकोर्ट | 94 | 26 |
| पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट | 85 | 25 |
| कोलकाता हाईकोर्ट | 72 | 24 |
| मद्रास हाईकोर्ट | 75 | 19 |
| पटना हाईकोर्ट | 53 | 18 |
| दिल्ली हाईकोर्ट | 60 | 16 |
| राजस्थान हाईकोर्ट | 50 | 7 |
| उत्तराखंड हाईकोर्ट | 11 | 2 |
| त्रिपुरा हाईकोर्ट | 5 | 1 |
| सिक्किम और मेघालय हाईकोर्ट | — | कोई रिक्त पद नहीं |
पुस्तक में जवाबदेही तंत्र का उल्लेख करते हुए केंद्रीकृत लोक शिकायत निवारण और निगरानी प्रणाली (CPGRAMS) को शिकायत दर्ज कराने के एक स्थापित माध्यम के रूप में बताया गया है। इसमें कहा गया है कि 2017 से 2021 के बीच इस प्रणाली के माध्यम से 1,600 से अधिक शिकायतें प्राप्त हुईं। केंद्रीकृत लोक शिकायत निवारण और निगरानी प्रणाली (CPGRAMS) पर 1 नवंबर 2022 से 28 फ़रवरी 2025 तक कुल 52,36,844 शिकायतें दर्ज की गईं। इसी दौरान विभागों/राज्यों/संघ-शासित प्रदेशों द्वारा 56,63,849 शिकायतें निस्तारित (disposed of) की गईं।
भारत अपनी अदालतों को आधुनिक बनाने पर अरबों रुपये खर्च कर रहा है। नए कोर्ट हॉल बन रहे हैं। दस्तावेजों को पीडीएफ फाइलों में बदला जा रहा है और वीडियो लिंक के माध्यम से अदालतों को देशभर की जेलों से जोड़ा जा रहा है।
फास्ट ट्रैक स्पेशल कोर्ट (FTSCs) को 2019 में विशेष रूप से न्याय प्रक्रिया को तेज करने के उद्देश्य से स्थापित किया गया था। इन कोर्टों में दिसंबर 2025 तक 2.45 लाख मामले लंबित थे। इनमें से 91 प्रतिशत मामले POCSO से संबंधित अपराधों के होने को और अधिक चिंताजनक बताया गया है।
कानून मंत्रालय के अनुसार, फास्ट ट्रैक अदालतों में एक मुकदमे की औसत अवधि दिल्ली में 1,639 दिन, त्रिपुरा में 1,484 दिन, और मणिपुर में 1,350 दिन तक पहुंच गई। हालांकि, इस मानक पर आंध्र प्रदेश, मध्य प्रदेश और तमिलनाडु का प्रदर्शन कहीं बेहतर रहा।
सरकार ने बताया कि 774 फास्ट ट्रैक स्पेशल कोर्ट (FTSCs) स्थापित किए हैं, जिनमें 398 विशेष पॉक्सो (POCSO) अदालतें शामिल हैं। इन अदालतों को आंशिक रूप से निर्भया फंड से प्राप्त 1,207.24 करोड़ रुपये की राशि से वित्तपोषित किया गया है।
देशभर की जिला अदालतों को डिजिटल बनाने के लिए शुरू की गई eCourts Mission Mode Project अब अपने तीसरे चरण (2023–2027) में है। इस चरण के लिए 7,210 करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया है, जो दूसरे चरण (2015–2023) में खर्च किए गए 1,670 करोड़ रुपये से चार गुना से भी अधिक है।