Mulberry Cultivation: छोटे किसान सालाना 1.5 लाख तक कमा रहे हैं, जबकि शासकीय टसर विकास केंद्र बिरेझर में महिलाएं धागाकरण से हर महीने 12 हजार रुपए तक की आय अर्जित कर रही हैं।
Rural employment: ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार और आय के नए अवसर पैदा करने के लिए धमतरी जिले में सिल्क समग्र-2 योजना उम्मीद की नई किरण बनकर उभरी है। केंद्र सरकार की इस महत्वाकांक्षी योजना के तहत किसानों को शहतूत की खेती और कृमिपालन से जोड़कर आत्मनिर्भर बनाने का प्रयास किया जा रहा है। जिले में अब तक 37 किसानों का चयन कर शहतूत पौधरोपण कराया जा चुका है, जिससे रेशम उत्पादन के क्षेत्र में नई संभावनाएं तैयार हो रही हैं।
यह योजना खासतौर पर लघु और सीमांत किसानों को ध्यान में रखकर बनाई गई है। जिन किसानों के पास 5 एकड़ से कम जमीन है, वे अपनी सिर्फ एक एकड़ भूमि में शहतूत की खेती कर कृमिपालन से अतिरिक्त आय अर्जित कर रहे हैं। विभागीय आंकड़ों के अनुसार किसान साल में 5 से 6 बार कृमिपालन कर सकते हैं और हर चक्र में 30 से 40 हजार रुपए तक कमा रहे हैं। खर्च निकालने के बाद उनकी सालाना शुद्ध आय 1 से 1.5 लाख रुपए तक पहुंच रही है।
सिल्क समग्र-2 योजना के तहत किसानों को चरणबद्ध तरीके से आर्थिक सहायता दी जा रही है। इसमें पौधरोपण और सिंचाई के लिए 60-60 हजार रुपए, कृमिपालन गृह निर्माण के लिए 3.25 लाख रुपए और उपकरण व सामग्री के लिए 55 हजार रुपए तक की मदद शामिल है। यानी एक हितग्राही को लगभग 5 लाख रुपए तक का लाभ मिल रहा है, जिसमें 80% राशि केंद्र और 20% राज्य सरकार वहन कर रही है।
रेशम विभाग सिर्फ आर्थिक मदद ही नहीं, बल्कि किसानों को तकनीकी प्रशिक्षण और वैज्ञानिक पद्धति से कृमिपालन का मार्गदर्शन भी दे रहा है। इससे ग्रामीण युवाओं में स्वरोजगार की नई संभावनाएं पैदा हो रही हैं। धमतरी के शासकीय टसर विकास केंद्र, बिरेझर में टसर कृमिपालन योजना भी ग्रामीणों की आय का मजबूत माध्यम बन चुकी है। यहां 20 से अधिक हितग्राही हर साल करीब 50 हजार रुपए की अतिरिक्त आय अर्जित कर रहे हैं।
टसर कोसा घीचा धागाकरण कार्य में गांव की करीब 15 महिलाएं जुड़ी हुई हैं। महिलाएं घर के काम के साथ अतिरिक्त समय में धागाकरण कर हर महीने करीब 12 हजार रुपए तक कमा रही हैं। इससे न केवल उनकी आय बढ़ रही है, बल्कि महिला सशक्तिकरण को भी मजबूती मिल रही है।
कलेक्टर अबिनाश मिश्रा के अनुसार, सिल्क समग्र-2 योजना जिले की ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत करने वाली महत्वपूर्ण पहल है। लक्ष्य है कि अधिक से अधिक किसान और महिला समूह इस योजना से जुड़ें, ताकि गांवों में रोजगार और आय के अवसर लगातार बढ़ते रहें।
रेशम विभाग न केवल संसाधन जुटा रहा है, बल्कि किसानों को तकनीकी प्रशिक्षण भी दे रहा है। वैज्ञानिक पद्धति से कीटपालन सुनिश्चित करने के लिए समय-समय पर मार्गदर्शन उपलब्ध कराया जाता है, जिससे उत्पादन की गुणवत्ता और मात्रा दोनों में सुधार हुआ है। धमतरी जिले में सिल्क समग्र-2 के ये सकारात्मक परिणाम स्पष्ट करते हैं कि यदि सही योजना और सरकारी सहायता का मेल हो, तो ग्रामीण भारत आत्मनिर्भरता की ओर तेजी से कदम बढ़ा सकता है।
शहतूत की खेती मुख्य रूप से रेशम उत्पादन (सेरिकल्चर) के लिए की जाती है, क्योंकि इसके पत्ते रेशम के कीड़ों का मुख्य भोजन हैं।
जमीन का चयन: अच्छी जल निकासी वाली दोमट या हल्की चिकनी मिट्टी सबसे उपयुक्त होती है। मिट्टी का pH 6.2 से 7.8 बेहतर माना जाता है।
खेत की तैयारी: खेत की गहरी जुताई कर मिट्टी भुरभुरी बनाई जाती है। गोबर खाद या जैविक खाद मिलाई जाती है ताकि मिट्टी उपजाऊ बने।
पौधरोपण: शहतूत के पौधे कटिंग (कलम) या नर्सरी पौधों से लगाए जाते हैं। पौधों के बीच आमतौर पर 3x3 फीट या 6x6 फीट दूरी रखी जाती है। बारिश के मौसम या सिंचाई सुविधा होने पर सालभर रोपण संभव है।
सिंचाई: शुरुआती 2-3 महीने नियमित पानी जरूरी है। गर्मियों में 7–10 दिन में और सर्दियों में 15–20 दिन में सिंचाई की जाती है।
खाद और देखभाल: समय-समय पर नाइट्रोजन, फॉस्फोरस और पोटाश दी जाती है। खरपतवार हटाना और पौधों की छंटाई जरूरी है ताकि पत्तियां ज्यादा निकलें।
पत्तियों की कटाई: 6–8 महीने बाद पत्तियां उपयोग योग्य हो जाती हैं। साल में 4 से 6 बार पत्तियों की कटाई की जा सकती है।
रेशम उत्पादन में उपयोग: इन पत्तियों को रेशम के कीड़ों (Silkworms) को खिलाया जाता है। कीड़े कोकून (Cocoon) बनाते हैं, जिससे रेशम धागा तैयार होता है।