Obesity Problem in India: भारत में आज भी मोटापे को अक्सर गलत खानपान और कम मेहनत का नतीजा मान लिया जाता है। आम धारणा है कि अगर व्यक्ति थोड़ा कम खाए और रोज व्यायाम करे, तो मोटापा अपने आप खत्म हो जाएगा। लेकिन आधुनिक चिकित्सा विज्ञान इस सोच से आगे बढ़ चुका है।
Obesity Problem in India: आज की दौड़ती-भागती जिंदगी में इंसान के पास खुद पर ही ध्यान देने का समय नहीं है, उसपर पिछले कुछ सालों से लोगों की लाइफस्टाइल भी काफी बदल चुकी है, जिसके चलते पूरी दुनिया में मोटापा और वजन बढ़ने की समस्या से अधिकतर लोग परेशान हैं। भारतीय भी इससे अछूते नहीं हैं। ज्यादातर भारतीय वजन तो कम करना चाहते हैं, लेकिन बहुत कम लोग इसमें सफल हो पाते हैं या इसे लंबे समय तक बनाए रख पाते हैं।
हाल ही में Clinical Obesity Journal में प्रकाशित हुए एक श्वेत पत्र (White Paper) में भारत में बढ़ती मोटापे की गंभीर समस्या के संकट के बारे में बताया गया है। इसमें एक सर्वे किया गया, जिसमें शामिल 84% भारतीयों ने वजन घटाने की कोशिश की, लेकिन सिर्फ 4.7% लोग ही एक साल तक मोटापे को थोड़ा बहुत कम करने में सफल हो पाए। वहीं, इस सर्वे से ये बात भी सामने आई कि इसमें हिस्सा लेने वालों में से एक-तिहाई से अधिक लोगों ने पिछले पांच सालों मे अपने वजन को लेकर किसी एक्सपर्ट या डाइटीशियन से बात नहीं की थी, और लगभग उतने ही लोगों को कभी मोटापे का कोई औपचारिक निदान ही नहीं मिला।
चौंकाने वाली बात ये है कि व्यक्तिगत रूप से मिली ये असफलताएं राष्ट्रीय स्तर पर आपात स्थिति की ओर इशारा करती हैं। रिपोर्ट्स के मुताबिक, लगभग 25.4 करोड़ भारतीय सामान्य मोटापे से और 35.1 करोड़ पेट के मोटापे से जूझ रहे हैं। केवल 2019 में ही, अधिक वजन और मोटापे से जुड़ी गैर-संक्रामक बीमारियों (NCD) के कारण 5.79 लाख वयस्कों की मौत हो चुकी है।
आपकी जानकारी के लिए बता दें कि 2019 में इसका आर्थिक बोझ लगभग 2,50,000 करोड़ रुपये आंका गया था, जो 2060 तक बढ़कर 72 लाख करोड़ तक पहुंचने का अनुमान है। ये White Paper एंडोक्राइनोलॉजिस्ट, डॉ. संजय कालरा के नेतृत्व में तैयार किया गया है, जिसके सह-लेखकों में डॉ. विश्वनाथन मोहन (मद्रास डायबिटीज रिसर्च फाउंडेशन) और डॉ. राजेश खडगावत (एम्स, नई दिल्ली) जैसे प्रमुख विशेषज्ञ शामिल हैं। White Paper के अनुसार, भारत की सबसे बड़ी भूल मोटापे को हेल्दी लाइफस्टाइल की कमी मानना है, जबकि यह एक दीर्घकालिक (Chronic) बीमारी है।
इसमें ये भी बताया गया है कि मोटापा इंसुलिन प्रतिरोध, टाइप-2 डायबिटीज, हाइपरटेंशन, डिस्लिपिडीमिया, ऑस्टियोआर्थराइटिस, कोरोनरी आर्टरी डिजीज और कैंसर का एक प्रमुख कारण है। इसके साथ ही यह मानसिक स्वास्थ्य पर भी भारी असर डालता है, जैसे डिप्रेशन, चिंता और वातावरणीय कारक (Environmental Factors)।
इस पेपर के अनुसार, सर्वे यह बताने के लिए तैयार किया गया कि मोटापा सिर्फ ‘कैलोरी कम या कैलोरी ज्यादा’ का आसान मुद्दा नहीं है। यह एक जटिल बीमारी है, जिस पर जेनेटिक, हार्मोनल और पर्यावरणीय कारकों का असर पड़ता है, जिनमें से कई व्यक्ति के नियंत्रण से बाहर होते हैं। इसके अलावा इसमें ये भी चेताया गया है कि नीतिगत विफलताएं इस संकट को और गंभीर बना रही हैं।
अब सवाल ये उठता है कि क्या भारत में मोटापे को अब भी ‘लाइफस्टाइल प्रॉब्लम’ माना जाता है, जबकि एक्सपर्ट्स इसे क्रॉनिक डिजीज कह रहे हैं? क्या सरकार और हेल्थ सिस्टम इस सोच को बदलने में चूक रहे हैं? क्या मौजूदा डाइट-एक्सरसाइज़ मॉडल असफल हो चुका है? इसके बेहतर और वैज्ञानिक विकल्प क्या हो सकते हैं?
हमने इस पर जब न्यूट्रीपल्स की डायरेक्टर और वरिष्ठ क्लिनिकल न्यूट्रिशनिस्ट/डाइटीशियन, डॉ. अंजलि फाटक से बात की तो उन्होंने बताया,
'आज World Health Organization जैसी वैश्विक संस्थाएं मोटापे को एक क्रॉनिक (दीर्घकालिक) बीमारी मानती हैं, ठीक वैसे ही जैसे डायबिटीज या ब्लड प्रेशर। इसके बावजूद भारत में सरकार और स्वास्थ्य व्यवस्था अभी भी इसे पूरी गंभीरता से नहीं ले पा रही है।'
'एक न्यूट्रिशनिस्ट के रूप में मेरा अनुभव कहता है कि यही सोच हमारी सबसे बड़ी कमजोरी है।' इसके आगे उन्होंने कहा, 'मोटापा सिर्फ इच्छाशक्ति की कमी नहीं।'
मेरे पास आने वाले ज्यादातर लोग पहले ही कई डाइट और एक्सरसाइज प्रोग्राम आजमा चुके होते हैं। कोई कीटो डाइट करता है, कोई इंटरमिटेंट फास्टिंग, कोई जिम में घंटों पसीना बहाता है। शुरुआत में वजन कम होता है, लेकिन कुछ महीनों बाद फिर बढ़ जाता है।
आंकड़े बताते हैं कि लगभग 84% लोग वजन घटाने की कोशिश करते हैं, लेकिन सिर्फ़ 4.7% ही उसे लंबे समय तक बनाए रख पाते हैं।
इसका मतलब यह नहीं कि लोग आलसी हैं। असलियत यह है कि वजन कम होने पर शरीर अपने आप 'सर्वाइवल मोड' में चला जाता है। भूख बढ़ जाती है, मेटाबॉलिज्म धीमा हो जाता है और शरीर फिर से फैट जमा करने लगता है। यह जैविक प्रक्रिया है, कमजोरी नहीं।
इस सवाल के जवाब में उनका कहना है कि सच कहें तो मौजूदा मॉडल अधूरा है। जैसे,
एक जैसी डाइट सबके लिए नहीं (One Size Fits All Diet Myth)
आज भी अधिकतर लोगों को वही पुरानी सलाह मिलती है, “चावल मत खाओ, रोटी कम करो, 1200 कैलोरी लो।” लेकिन हर व्यक्ति की उम्र, काम, तनाव, हार्मोन, बीमारी और जीवनशैली अलग होती है। एक फैक्ट्री वर्कर और एक ऑफिस कर्मचारी के लिए एक ही डाइट काम नहीं कर सकती।
मानसिक स्वास्थ्य की अनदेखी
कई लोग तनाव, अकेलेपन और चिंता की वजह से ज्यादा खाते हैं। इसे “इमोशनल ईटिंग” कहते हैं। जब तक मनोवैज्ञानिक और व्यवहारिक सपोर्ट नहीं मिलता, तब तक डाइट टिक नहीं पाती।
अस्वस्थ खाद्य माहौल
आज हर जगह सस्ता जंक फूड, मीठे ड्रिंक्स और प्रोसेस्ड स्नैक्स आसानी से मिल जाते हैं। बच्चों से लेकर बड़ों तक सब पर विज्ञापनों का असर है। ऐसे माहौल में सिर्फ व्यक्ति से अनुशासन की उम्मीद करना गलत है।
हाल के सालों में GLP-1 आधारित नई दवाओं ने मोटापे के इलाज में नई उम्मीद जगाई है। ये दवाएं भूख कम करती हैं और मेटाबॉलिज्म सुधारने में मदद करती हैं। कुछ मरीजों के लिए ये बेहद फायदेमंद साबित हुई हैं।
भारत में GLP-1 आधारित नई दवाओं जुड़ी बड़ी समस्याएं भी हैं। जैसे,
इन दवाइयों की कीमत इतनी ज्यादा है कि ये आज भी आम आदमी की पहुंच से बाहर हैं। इसके अलावा इन दवाइयों को देकर सरकारी कवरेज की कमी भी है। ज्यादातर मामलों में ये दवाएं Ayushman Bharat - Pradhan Mantri Jan Arogya Yojana जैसी योजनाओं में शामिल नहीं हैं।
गलत इस्तेमाल का खतरा
कई लोग डॉक्टर और न्यूट्रिशनिस्ट की सलाह के बिना इन्हें लेने लगते हैं, जिससे साइड इफेक्ट और पोषण की कमी हो सकती है। दवाएं मददगार साबित हो सकती हैं, लेकिन वो सही खानपान और जीवनशैली का विकल्प नहीं हैं।
मोटापे का इलाज “डाइट” नहीं, बल्कि “लॉन्ग-टर्म मैनेजमेंट” होना चाहिए।
व्यक्तिगत पोषण योजना: हर व्यक्ति के लिए अलग डाइट होनी चाहिए, जो उसकी बीमारी, बजट, संस्कृति और समय के अनुसार हो।
टीम आधारित इलाज: डॉक्टर, न्यूट्रिशनिस्ट, साइकोलॉजिस्ट और फिटनेस एक्सपर्ट मिलकर इलाज करें।
वजन नहीं, सेहत पर फोकस: सिर्फ किलो घटाने के बजाय फैट, मसल, शुगर और कोलेस्ट्रॉल पर ध्यान।
पोषण शिक्षा: स्कूल और दफ्तरों में लोगों को सिखाया जाए कि संतुलित खाना कैसे चुनें और पकाएं।
अगर मोटापे को सच में बीमारी मानना है, तो सरकार को ठोस कदम उठाने होंगे:
मोटापे से जूझ रहे लोगों को सबसे ज्यादा जिस चीज की कमी होती है, और वो है सम्मान। उन्हें अक्सर ताने, मजाक और उपेक्षा झेलनी पड़ती है। इससे आत्मविश्वास टूटता है और वे इलाज से दूर हो जाते हैं।