CG News: अबूझमाड़ अंचल से एक उत्साहवर्धक और आशा भरा दृश्य सामने आया। नारायणपुर-ओरछा मार्ग पर टेकानार के पास सड़क किनारे एक मादा गौर अपने बछड़े के साथ दिखाई दी।
CG News: छत्तीसगढ़ के नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में बीते दिनों लगातार मुठभेड़ों के बीच सुरक्षाबल निर्णायक बढ़त की ओर बढ़ते नजर आ रहे हैं। सरकार द्वारा तय समयसीमा में अब महज करीब दो महीने शेष हैं, और इसी को ध्यान में रखते हुए सुरक्षाबल नक्सलियों के खिलाफ अंतिम प्रहार की रणनीति के तहत आक्रामक कार्रवाई कर रहे हैं।
इसी बीच अबूझमाड़ अंचल से एक उत्साहवर्धक और आशा भरा दृश्य सामने आया। नारायणपुर-ओरछा मार्ग पर टेकानार के पास सड़क किनारे एक मादा गौर अपने बछड़े के साथ दिखाई दी। इस दुर्लभ क्षण को एक राहगीर ने कैमरे में कैद किया, जो अब सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहा है। वन्य जीव विशेषज्ञ इसे अबूझमाड़ की जैव विविधता के पुनर्जीवन, जंगलों की सुरक्षा और प्रकृति की वापसी का संकेत मान रहे हैं।
गौर, जिसे भारतीय वन भैंसा भी कहा जाता है, देश के सबसे बड़े और शक्तिशाली वन्य जीवों में शामिल है। यह अंतरराष्ट्रीय स्तर पर संवेदनशील प्रजाति के रूप में मानी जाती है और कई इलाकों में इसके अस्तित्व पर खतरा मंडराता रहा है। अबूझमाड़ जैसे घने जंगलों में गौर का दिखाई देना इसलिए खास है, क्योंकि पिछले दशकों में नक्सल हिंसा, मानवीय हस्तक्षेप तथा प्राकृतिक संसाधनों के दोहन ने यहां की वन संपदा और वन्य जीवों को गंभीर नुकसान पहुंचाया था।
हाल के वर्षों में सुरक्षाबलों की मजबूत मौजूदगी, प्रशासनिक पहुंच और बेहतर कानून व्यवस्था के चलते अबूझमाड़ क्षेत्र में मानवीय दबाव कम हुआ है। इसका सकारात्मक असर जंगलों में साफ़ दिखाई दे रहा है। वन्य जीव विशेषज्ञों के अनुसार, किसी क्षेत्र में गौर का दिखाई देना वहां की वनस्पति, जलस्रोत और पारिस्थितिकी तंत्र के स्वस्थ होने का संकेत होता है। टेकानार के प्रवेश द्वार पर मादा गौर और उसके बछड़े का यह दृश्य मानो प्रकृति का संदेश है- “जहां शांति होती है, वहां जीवन लौट आता है।”
अवैध शिकार, जंगलों की कटाई और मानवीय दखल के कारण गौर लंबे समय से संकट में रहा है। ऐसे में बछड़े के साथ मादा गौर का दिखना न सिर्फ सुरक्षित वातावरण, बल्कि प्रजनन और संरक्षण की सफलता का भी संकेत देता है। यह दृश्य वन्य जीव संरक्षण से जुड़े प्रयासों को नई ऊर्जा प्रदान करता है।
हालांकि यह दृश्य गर्व और खुशी का विषय है, लेकिन सड़क किनारे वन्य जीवों की मौजूदगी दुर्घटनाओं का कारण भी बन सकती है। विशेषज्ञों ने वाहन चालकों से गति नियंत्रित रखने और वन्य जीवों से सुरक्षित दूरी बनाए रखने की अपील की है। प्रशासन की ओर से चेतावनी संकेतक और जागरूकता अभियान चलाने की भी आवश्यकता जताई गई है, ताकि मानव-वन्य जीव संघर्ष को रोका जा सके।
यह घटना वन विभाग और प्रशासन के लिए अवसर है कि गौर जैसी दुर्लभ प्रजातियों के संरक्षण के लिए दीर्घकालिक और ठोस योजनाएं बनाई जाएं। जंगलों की निगरानी, अवैध शिकार पर सख्ती, स्थानीय समुदाय की भागीदारी और पर्यावरणीय जागरूकता इस सकारात्मक बदलाव को स्थायी बना सकती है।
अबूझमाड़ और बस्तर क्षेत्र में गौर केवल वन्य जीव नहीं, बल्कि जनजातीय संस्कृति और परंपराओं का अभिन्न हिस्सा है। ‘गौर नृत्य’ से लेकर पारंपरिक स्वागत समारोहों तक, गौर सम्मान, शक्ति और प्रकृति के साथ सहअस्तित्व का प्रतीक माना जाता है। ऐसे में अबूझमाड़ में गौर की वापसी को स्थानीय समुदाय अपनी सांस्कृतिक जड़ों की मजबूती के रूप में भी देख रहा है।