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Vintage Radio Collection: बीकानेर में एक घर ऐसा भी, जहां वक्त की सुइयां रेडियो पर ठहरी हुई हैं

Radio Collection : पुरानी आवाजों का पता: दिनेश के संग्रह में दर्ज है रेडियो का बदलता इतिहास। मोबाइल और तेजी से बदलते तकनीक के दौर में भी दिनेश माथुर ने सहेज रखी हैं 1200 से ज्यादा रेडियो की यादें। उनके संग्रह में आजादी के आसपास के मॉडल से लेकर विदेशी रेडियो तक संग्रह में शामिल हैं। पढ़िए बृजेश सिंह की खास रिपोर्ट।
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Oct 13, 2026
Vintage Radio Collection
बीकानेर में दिनेश माथुर के घर पुराने रेडियो का संग्रह (Photo: Rajasthan Patrika, Designed: ChatGpt)

Vintage Radio Collection : आज आवाजें मोबाइल की स्क्रीन से आती हैं। गाने सुनने हों, समाचार जानने हों या दुनिया की हलचल से जुड़ना हो, सब कुछ उंगलियों की एक हरकत पर मौजूद है। लेकिन एक दौर ऐसा भी था, जब घर के किसी कोने में रखा रेडियो पूरे परिवार को अपने आसपास बैठा लेता था। समाचार बुलेटिन हो या गीतों का कार्यक्रम, उसकी आवाज के साथ समय भी जैसे कुछ देर ठहर जाता था। बीकानेर के दिनेश माथुर ने इसी बीते दौर को अपने घर में सहेज रखा है। उनके पास 1200 से ज्यादा रेडियो हैं, जिनमें से हर एक अपने समय की तकनीक और यादों की अलग कहानी कहता है।

शौक से आगे बढ़ा सफर, अब विरासत सहेजने की कोशिश

सरकारी सेवा से सेवानिवृत्त दिनेश माथुर का रेडियो संग्रह करने का सिलसिला करीब 12-13 साल पहले शुरू हुआ। एक रेडियो की कीमत पूछने पर मिली व्यंग्यात्मक टिप्पणी उनके मन में ऐसी बैठी कि रेडियो के प्रति लगाव धीरे-धीरे संग्रह के जुनून में बदल गया। शुरुआत में शायद उन्हें भी अंदाजा नहीं था कि यह सिलसिला एक दिन 1200 से ज्यादा रेडियो तक पहुंच जाएगा। समय के साथ वे अलग-अलग जगहों से पुराने रेडियो जुटाते गए।

संग्रह में मौजूद हैं जापान, ऑस्ट्रेलिया और अमरीकी रेडियो भी

बीकानेर के दिनेश माथुर के संग्रह में आजादी के आसपास के दौर के रेडियो भी हैं और जापान, ऑस्ट्रेलिया तथा अमरीका जैसे देशों में बने मॉडल भी। कुछ रेडियो की कीमत करीब 500 रुपए है, तो कुछ की कीमत 15 हजार रुपए या इससे अधिक। माथुर के लिए ये अनमोल हैं। उनके मुताबिक, उनके संग्रह के लगभग सभी रेडियो चालू हालत में हैं। दरअसल, यह संग्रह केवल पुराने उपकरणों का ढेर नहीं है। इसमें रेडियो तकनीक के बदलते रूप, डिजाइन और अलग-अलग दौर की झलक मिलती है। जिन उपकरणों की जगह अब घरों में मोबाइल फोन और डिजिटल डिवाइस ने ले ली है, वे यहां अब भी अपनी पहचान के साथ मौजूद हैं।

जिसने कभी ताना दिया, वह भी देखने पहुंचा

इस कहानी का एक दिलचस्प पहलू यह भी है कि जिस व्यक्ति की टिप्पणी से माथुर के मन में रेडियो संग्रह करने का विचार मजबूत हुआ था, वह अब उनका संग्रह देखने आता है। वक्त के साथ उस प्रसंग का अर्थ भी बदल गया। कभी जिस बात ने मन को छुआ था, वही आज एक बड़े संग्रह की शुरुआत से जुड़ी याद बन गई है। माथुर ने इस संग्रह को पहली बार पिछले साल बीकानेर स्थापना दिवस पर आयोजित प्रदर्शनी में सार्वजनिक रूप से प्रदर्शित किया। हालांकि, 1200 से ज्यादा रेडियो में से कुछ ही वहां रखे जा सके। इतने बड़े संग्रह को एक साथ लोगों के सामने लाना आसान नहीं था, लेकिन प्रदर्शनी में पहुंचे लोगों के लिए पुराने रेडियो को इतने करीब से देखना अपने आप में अलग अनुभव रहा।

पुरानी तकनीक देखकर अचरज में रह गए लोग

प्रदर्शनी के मुख्य किरदारों में शामिल फोटोग्राफर अजीज भुट्टा बताते हैं कि प्रदर्शनी में आए लोगों ने रेडियो के अलग-अलग मॉडल देखकर उत्सुकता जताई। अब तक उन्होंने इस तरह के संग्रह के बारे में पहले केवल सुना था। यहां ऐसे रेडियो भी देखने को मिले, जो उनके जन्म से पहले के दौर के हैं। लोगों ने सुझाव दिया कि इस संग्रह को ज्यादा बड़े स्तर पर प्रदर्शित किया जाना चाहिए, ताकि नई पीढ़ी भी रेडियो के इतिहास और उसके बदलते स्वरूप को समझ सके। स्कूल के विद्यार्थियों को यह संग्रह दिखाने की बात भी सामने आई। माथुर बताते हैं कि लखनऊ में भी एक व्यक्ति के पास इससे बड़ा रेडियो संग्रह होने की जानकारी मिल रही है। अपने संग्रह के आधार पर वे खुद को देश में दूसरे स्थान पर मानने की संभावना जताते हैं, हालांकि इस दावे की स्वतंत्र पुष्टि नहीं है।

रेडियो से आगे, एक दौर को बचाए रखने की कोशिश

रेडियो का इस्तेमाल भले ही अब पहले जैसा नहीं रहा, लेकिन उसकी ऐतिहासिक और सांस्कृतिक अहमियत खत्म नहीं हुई है। कभी सूचना और मनोरंजन का प्रमुख माध्यम रहे रेडियो ने घरों, समाज और सार्वजनिक जीवन में खास जगह बनाई थी। पुराने रेडियो को सहेजना इस बदलाव को करीब से देखने का अवसर देता है।दिनेश माथुर का संग्रह इसी लिहाज से खास है। यह बताता है कि तकनीक बदलने के साथ पुराने उपकरण भले ही रोजमर्रा की जिंदगी से बाहर हो जाएं, लेकिन उनका महत्व पूरी तरह समाप्त नहीं होता। जरूरत है तो उन्हें केवल पुरानी वस्तु समझने के बजाय इतिहास और विरासत के हिस्से के रूप में देखने की। बीकानेर में माथुर के पास रखे ये 1200 से ज्यादा रेडियो बीते जमाने की आवाजों को आज तक पहुंचाने वाली कड़ियां हैं। सवाल यह है कि क्या इस निजी संग्रह को ऐसी जगह और स्वरूप मिल पाएगा, जहां शहर के लोग और खासकर नई पीढ़ी इसे देख सके और उस दौर को समझ सके, जब रेडियो सिर्फ एक उपकरण नहीं, बल्कि घर की धड़कन हुआ करता था।

लाइफ टाइम वर्ल्ड अचिवर्स प्राइड आफॅ इंडिया अवार्ड-2026 से भी सम्मानित

रानी बाजार निवासी दिनेश माथुर को लाइफ टाइम वर्ल्ड अचिवर्स प्राइड आफॅ इंडिया अवार्ड-2026 से भी सम्मानित किया जा चुका है । सम्मान स्वरूप प्रशस्ति पत्र में उल्लेखित किया गया है कि भारतीय धरोहर संरक्षण, रेडियो संग्रह एवं प्रसारण इतिहास के संरक्षण के क्षेत्र में दिनेश माथुर के उल्लेखनीय योगदान के लिये यह सम्मान पत्र आदर एवं गौरव के साथ रेडियो किंग आफॅ राजस्थान को प्रदान किया जाता है।

Updated on:
13 Oct 2026 10:51 am
Published on:
13 Oct 2026 10:51 am