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15 करोड़ का इंजेक्शन क्यों? क्या है ये SMA बीमारी और क्यों महंगा है इसका इलाज?

SMA Disease Injection: एक खराब जीन आपके मासूम बच्चे की मांसपेशियों को धीरे-धीरे निष्क्रिय कर देता है। और जब तक आपको पता चलता है कि आपके बच्चे को गंभीर SMA बीमारी है, तब तक पहले ही देर हो चुकी होती है, अब आपको करनी होती इलाज के लिए करोड़ों रुपए की व्यस्था वो भी क्राउड फंडिग के जरिए, आखिर क्यों इतना महंगा है SMA जैसी गंभीर और दुर्लभ बीमारी का इलाज, क्या है ये जीन थेरेपी और कैसे करती है काम?
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Jun 24, 2026
SMA Disease Expensive treatment
SMA Disease Expensive treatment: SMA बीमारी का नाम नहीं इलाज की लागत उड़ा देती है होश, क्यों 15 करोड़ तक पहुंच जाती है जीन थेरेपी की कीमत? (AI Generated Image)

SMA Disease: भोपाल एम्स के डॉक्टर की भतीजी काशी को 'स्पाइनल मस्कुलर एट्रोफी' (एसएमए टाइप-1) नामक जेनेटिक बीमारी है, इसके उपचार के लिए लगने वाले 'जोलजेन्समा' (Zolgensma) इंजेक्शन की कीमत करीब 15 करोड़ रुपए है। इतनी बड़ी रकम सुनकर परिवार के होश उड़ गए थे। लेकिन उनकी मदद के लिए समाज जन के साथ ही खुद एम्स के डॉक्टर्स और प्रशासन के लोग आगे आए हैं। जल्द ही काशी को यह महंगा इंजेक्शन लगा दिया जाएगा। और उसकी जिंदगी बचा ली जाएगी।

काशी में दिखे थे ये लक्षण

  • काशी के जन्म के बाद माता-पिता ने गौर किया कि उसकी गर्दन में असामान्य लचीलापन है
  • उसके हाथ-पैरों की एक्टिविटीज भी बहुत कम है।
  • धीरे-धीरे काशी को दूध पीने में भी कठिनाई होने लगी
  • और फिर सांस लेने में भी।
  • जब एम्स भोपाल में जांच कराई गई, तो रिपोर्ट ने परिवार के पैरों तले जमीन खिसका दी।

इंदौर की अनिका को SMA Type- 2

इंदौर में रहने वाली एक दंपति की 3 साल की बेटी अनिका की जांच के बाद डॉक्टर्स ने एसएमए टाइप-2 (SMA Disease Type 2) बीमारी डायग्नोस की। डॉक्टर्स का कहना है कि उसे भी महंगा इंजेक्शन Zolgensma लगेगा, इसकी कीमत 9.50 करोड़ है। इलाज के लिए इतनी कीमत सुनकर ही दंपति के आंसू निकल पड़े, उनका दिल तड़प उठा कि वो कैसे बच्ची की जिंदगी बचा पाएंगे। लेकिन जनसहभागिता और सोशल मीडिया इंफ्लूएंसर्स और बॉलीवुड एक्टर्स के ऐसे वीडियो सामने आए जिसमें उन्हें समाज जन के सामने बेटी के इलाज के लिए मदद देने की अपील की। अनिका का मामला फिलहाल एमपी हाईकोर्ट में है, इस पर 30 जून को सुनवाई होनी है। बता दें की मामले को लेकर हाईकोर्ट ने सरकारों से पूछा है कि वे इस बच्ची की आर्थिक मदद के लिए क्या कदम उठा सकती है? SMA पर संजना कुमार की खास रिपोर्ट...

फैक्ट

SMA दुनिया की सबसे आम घातक आनुवंशिक बीमारियों में से एक है। हर 10 हजार जीवित जन्मे बच्चों में लगभग 1 बच्चा SMA से प्रभावित होता है।

पहले ये जानना जरूरी

अमेरिकी राष्ट्रीय स्वास्थ्य संस्थान (NIH) के डेटाबेस PubMed Central में प्रकाशित एक शोध के मुताबिक SMA केवल मांसपेशियों (SMA Disease is a neoro)की बीमारी नहीं है। क्योंकि इसमें मांसपेशियों को नुकसान नहीं पहुंचता। बल्कि स्पाइनल कॉर्ड के मोटर न्यूरॉन्स को नुकसान पहुंचता है। जब ये न्यूरॉन्स मर जाते हैं, तब उसके असर से मांसपेशियां कमजोर होकर सिकुड़ने लगती हैं।

एक बार मोटर न्यूरॉन्स मर गए तो वे वापस नहीं आते

इस बीमारी को खतरनाक इसीलिए माना जाता है कि बॉडी में जो नुकसान हो चुके होते हैं, उनकी भरपाई नहीं की जा सकती या उन्हें फिर से नहीं बनाया जा सकता। यह बड़ा कारण है कि डॉक्टर्स बार-बार कहते हैं कि इलाज जितना जल्दी हो जाए, उतना ही अच्छा। जीन थेरेपी समय पर मिल जाने से लगातार हो रहे नुकसान समय पर रोक देती है।

हर 40-60 लोगों में से करीब 1 व्यक्ति है SMA जीन का वाहक

शोध में यह भी सामने आया है कि ऐसे दो-चार नहीं बल्कि, हजारों परिवार हैं, जिन्हें पता ही नहीं होता कि वे इस बीमारी के साथ जी रहे हैं। रिपोर्ट्स बताती हैं कि दुनिया भर में हर 40-60 लोगों में से कम से कम एक शख्स ऐसा होता है जो, SMA का वाहक होता है।

माता-पिता स्वस्थ तो भी उनके बच्चे में जा सकता है ये रोग

चूंकि यह बीमारी Autosomal Recessive Disease है। दोनों माता-पिता के खराब जीन होने के कारण यह बीमारी बच्चों में आ सकती है, फिर भले ही वे खुद स्वस्थ जीवन जी रहे हों।

फैक्ट

मडी मेडिसिन डॉ. विनोद कोठारी बताते हैं, ''SMA एक ऑटोसोमल रिसेसिव आनुवंशिक बीमारी है। इस बीमारी में बच्चे को दोषपूर्ण जीन की एक कॉपी मां से और एक कॉपी पिता से यानी कुल दो कॉपी मिलती है। ऐसे में बच्चे में यह आनुवंशिक विकार विकसित हो जाता है। यहां ध्यान देना होगा कि माता-पिता दोनों स्वस्थ हैं, इसका अर्थ है कि उनके शरीर में एक जीन खराब है और दूसरा नॉर्मल, यानी वे वाहक थे। इसलिए ये बीमारी उनके बच्चों में होने की संभावना बढ़ गई। क्योंकि जो वाहक होता है वो बीमार नहीं होता। दोनों जीन खराब हों या दोषपूर्ण हों तो व्यक्ति को यह बीमारी हो जाती है। बीमारियों का ऐसा ही पैटर्न Autosomal Recessive Inheritance कहलाती है।''

What is SMA Disease (AI Generated Infographic)

अगर मां भी वाहक है और पिता भी, तो हर प्रेग्नेंसी में

25% चांस हैं कि होने वाला शिशु SMA से प्रभावित हो
50% चांस हैं कि बच्चा वाहक हो
25% चांस हैं कि बच्चा पूरी तरह से सामान्य जीन वाला हो

SMA के कुल मामलों में 60 फीसदी Type 1 के

स्पाइनल मस्कुलर एट्रोफी टाइप-1 को SMA का सबसे गंभीर रूप माना गया है। वहीं SMA Type 2 के मामले ही सबसे ज्यादा सामने आते हैं। शोध के मुताबिक यह सिस्टिक फाइब्रोसिस के बाद सबसे सामान्य घातक ऑटोसोमल रिसेसिव बीमारियों में गिनी जाती है। SMA 1 जीन के exon 7 deletion की जांच से करीब 95 फीसदी मामलों में इसकी पुष्टि हो जाती है।

जितनी ज्यादा SMN2 कॉपी होंगी, बीमारी अपेक्षाकृत कम गंभीर हो सकती है। यही कारण है कि एक ही बीमारी अलग-अलग बच्चों में अलग-अलग रूप में दिखती है।

अब सबसे बड़ा सवाल ये कि ये इंजेक्शन क्यों इतना महंगा होता है?

अमेरिकी न्यूज वेब पोर्टल Axious और अमेरिका की Cure SMA Foundation संस्था के मुताबिक Zolgensma एक सामान्य दवा नहीं है, यह Gene Replacement थेरेपी है। यह शरीर में SMN1 जीन की नई कार्यशील कॉपी को शरीर में पहुंचाती है। विभिन्न दवाओं की जानकारी देने वाली सबसे बड़ी वेबसाइट Drugs.com से मिली जानकारी के मुताबिक यह इंजेक्शन या इलाज या फिर थेरेपी बार-बार देने की जरूरत नहीं पड़ती। यह केवल एक ही बार दी जाती है। इसे बनाने वाली कंपनी का भी दावा है कि एक बार की थेरेपी से लंबे समय के लिए फायदा मिल जाता है।

SMA Disease Zolgensma Injection why Expesive (Grphic Poster AI Generated)

इसकी कीमत पर होती रहती है बहस

अमेरिका की Food And Drugs Administration (FDA) से मंजूरी के समय इसकी कीमत करीब 2.1 मिलियन डॉलर रखी गई थी। हालांकि इसकी कीमत पर वैज्ञानिक और अर्थशास्त्री भी एकमत नहीं थे। अमेरिकी समाचार वेबसाइट Axios के मुताबिक अमेरिका की संस्था ICER ने कहा था कि दवा की कीमत कंपनी की मांग से कम हो सकती है। कुछ आकलनों में कीमत 3 लाख डॉलर से 19 लाख डॉलर के बीच उचित बताई गई है।

Drugs.com की समीक्षा रिपोर्ट के मुताबिक शुरुआती रिसर्च का पैसा पूरी तरह से कंपनी ने नहीं लगाया। शुरुआती शोध में अमेरिकी NIH कई चैरिटी संस्थाओं का भी योगदान था। इसलिए आज भी इस दवा की कीमत को लेकर बहस होती रही है।

ये बड़े कारण

  • डॉ. विनोद कोठारी का कहना है कि SMA दुर्लभ बीमारियों में से एक है। दुनियाभर में इन मरीजों की संख्या कम है।
  • चूंकि यह एक सामान्य दवा नहीं है, बल्कि जीन थेरेपी है। इसमें जीवित कोशिकाओं का उपयोग किया जाता है। इसे वायरस इंजीनियरिंग कहा जा सकता है। उच्च स्तरीय और खास तरह की जैव सुरक्षा औऱ महीनों की गुणवत्ता जांच के बाद यह तैयार की जाती है।
  • जीन थेरेपी को विकसित करने में कई साल लग जाते हैं। जब तक यह विकसित हो पाती है इन पर अरबों डॉलर का खर्च हो चुका होता है।
  • कंपनी भी अपना तर्क देती है कि पूरी जिंदगी में केवल एक ही बार इसका यूज किया जाता है। इसलिए यह वन टाइम ट्रीटमेंट महंगा पड़ता है।

क्या केवल अमेरिका ही बनाता है ये इंजेक्शन

दरअसल Zolgensma बनाने वाली कंपनी Novarits है, जिसका मुख्यालय Switzerland में है। जबकि इसकी रिसर्च और शुरुआती विकास America में हुआ है। इसका उत्पादन कई बायोटेक सुविधाओं (अत्याधुनिक लैब) में किया जाता है। यह थेरेपी कई देशों में उपलब्ध भी है। गिनती की कंपनियां है जो इसे बनाने में सक्षम हैं। इसके अलावा इसकी कई दवाएं और भी हैं लेकिन ये दवाएं केवल लक्षणों पर काम करती हैं, बीमारी को नियंत्रित करने में ये उतनी प्रभावी नहीं हैं, जितनी कि ये जीन थेरेपी का Zolgensma इंजेक्शन है।

भारत भी बना सकता है, लेकिन हैं कई चुनौतियां

व्यावहारिक रूप से भारत में इस थेरेपी को विकसित करने के लिए कई चुनौतियां हैं। इसे विकसित करने के लिए जीन थेरेपी इंफ्रास्ट्रक्चर की जरूरत है। क्लीनिकल ट्रायल बहुत महंगे हैं। वहीं नियामकीय मंजूरियों की प्रक्रिया बेहद जटिल है। इसके साथ ही इसकी उत्पादन तकनीक पेटेंट और विशेषज्ञता से जुड़ी है। हालांकि देशभर में कई संस्थान, कंपनियां इस जीन थेरेपी को लेकर काम कर रही हैं, लेकिन घरेलू स्तर पर अभी यह उपलब्ध नहीं है।

SMA बीमारी को ऐसे समझें और जानें क्यों होता है ये गंभीर रोग

दरअसल दिमाग और नसें यानी न्यूरोन्स और मांसपेशियां एक चेन की तरह होते हैं। मोटर न्यूरॉन्स यानी विशेष तंत्रिका कोशिकाएं (Nerve Cells) जो दिमाग से आदेश लेती हैं और मांसपेशियों तक पहुंचाती हैं। उदाहरण के लिए कोई व्यक्ति पानी पीना चाहता है। इसके लिए उसे पानी का गिलास उठाकर पानी पीना होगा।

SMO Disease Impact (infographic AI? Generated)

-1- दिमाग आदेश देता है।
-2- यह आदेश मोटरन्यूरॉन्स तक पहुंचता है।
-3- मोटरन्यूरॉन्स इसे मांसपेशियों तक पहुंचाती हैं।
-4- मांसपेशियां इसे आदेश समझकर हाथ उठाने के लिए प्रेरित करती हैं और व्यक्ति पानी का गिलास उठाकर पानी पी लेता है।

इसके विपरीत यदि मोटर न्यूरॉन्स खराब हो जाएं, तो दिमाग का आदेश मांसपेशियों तक नहीं पहुंचता है। ये मोटर न्यूरॉन्स दिमाग और रीढ़ की हड्डी यानी Spinal Cord में होते हैं। यहीं से ये पूरे शरीर को कंट्रोल करते हैं। हालांकि यह कोई दिमागी बीमारी नहीं है।

SMA में होता क्या है?

SMA (Spinal Muscular Atrophy) बीमारी में जिस प्रोटीन की कमी होती है, उसे SMN Protein कहते हैं। SMA जानलेवा रोग में शरीर में SMN1 जीन या तो दोषपूर्ण यानी ऐसा हो जाता है कि पर्याप्त प्रोटीन नहीं बना पाता या फिर गायब रहता है।

जब यह प्रोटीन नहीं बनता तब क्या होता है?

  • मोटर न्यूरॉन्स कमजोर होने लगते हैं।
  • धीरे-धीरे मरने लगते हैं।
  • इससे दिमाग के आदेश मांसपेशियों तक नहीं पहुंच पाते।
  • मांसपेशियां यदि एक्टिव नहीं रहतीं तो वे कमजोर होकर सिकुड़ने लगती हैं।

SMA के शुरुआती लक्षण (SMA Disease Symptoms)

  • बच्चा गर्दन नहीं संभाल पाता है
  • बच्चा पलट नहीं पाता है
  • उसके हाथ पैरों में अजीब लचीलापन और ढीले लगते हैं

बाद में दिखने वाले लक्षण

  • बच्चे को बैठने में दिक्कत आना
  • खड़े न हो पाना
  • चल नहीं पाना

गंभीर स्थिति के लक्षण (SMA Disease Serious Symptoms)

  • निगलने में परेशानी
  • सांस लेने वाली मांसपेशियां कमजोर हो जाना
  • वेंटिलेटर की जरूरत

कैसे होती है SMA की जांच (SMA Disease Test)

1- जेनेटिक टेस्ट
SMA की पहचान के लिए यह टेस्ट सबसे महत्वपूर्ण माना जाता है। इसमें देखा जाता है कि बच्चे के SMN1 जीन में कोई खराबी या डिलिशन तो नहीं है। ब्लड सैंपल लेकर डीएनए की जांच की जाती है। इस टेस्ट के माध्यम से ही 95 फीसदी मामलों में बीमारी है या नहीं का पता आसानी से चल जाता है।

2- SMN1 और SMN2 कॉपी नंबर टेस्ट
इस टेस्ट के माध्यम से यह पता लगाया जाता है कि SMN1 है नहीं और SMN2 जीन की कितनी कॉपी हैं। इस टेस्ट से बीमारी की गंभीरता के बारे में भी पता लगाया जाता है।

3- माता-पिता की जांच
शादी या प्रेग्नेंसी से पहले इस टेस्ट को करवाया जा सकता है। इससे यह पता लगाया जा सकता है कि माता-पिता SMA के वाहक हैं या नहीं।

4- गर्भावस्था में सीवीएस टेस्ट
यदि परिवार में पहले से ही SMA हिस्ट्री है, तो Chorionic Villus Sampling (CVS) करवाया जाता है। यह प्रेग्नेंसी के 10-13 महीने के बीच होता है। इसके अलावा Amniocentesis टेस्ट 15-20 सप्ताह की प्रेग्नेंसी में करवाया जाता है। ये दोनों ही टेस्ट यह पता लगाने के लिए करवाए जाते हैं कि बच्चे के जीन की स्थिति क्या है?

5- बच्चे के जन्म के बाद स्क्रीनिंग
बच्चे के जन्म के बाद भी यह पता लगा पाना आसान है कि SMA है या नहीं। इसके लिए नवजात शिशु की एड़ी से ब्लड सैंपल लिया जाता है। इस सैंपल के माध्यम से SMA की जांच की जाती है। अमेरिका समेत कई देशों में यह स्क्रीनिंग नियमित तौर पर की जाती है।

ये टेस्ट और स्क्रीनिंग क्यों है महत्वपूर्ण (SMA Disease Screening)

SMA को लेकर कहा जाता है कि इससे होने वाले नुकसान बच्चे के जन्म के बाद बहुत तेज गति से होना शुरू हो जाते हैं। रिसर्च बताती हैं कि कई बच्चों में काफी नुकसान होने के बाद इसके लक्षण दिखने शुरू होते हैं। जबकि एक्सपर्ट्स कहते हैं कि सही समय पर इलाज ही इस बीमारी से बचाता है। जरा भी देरी जानलेवा साबित होती है।

SMA को लेकर भारत की स्थिति कैसी है? (SMA Disease in India)

भारत में अभी SMA को लेकर इतनी अवेयरनेस नहीं है कि हर नवजात की स्क्रीनिंग की जाती हो। कुछ निजी चिकित्सक जरूर आजकल इसकी जांच करवाने लगे हैं।

जयपुर की कॉस्मेटिक गायनो अनुपमा गंगवाल बताती हैं कि वे इस बीमारी के खतरे जानती हैं और गर्भवतियों को भी इसके खतरे समझाती हैं। प्रेग्नेंसी के दौरान ही इसकी जांच जरूर करवाती हैं। खासतौर पर जिनके परिवार में ऐसी कोई हिस्ट्री रही है। वे महिलाओं को प्रेग्नेंसी के दौरान CVS और Amniocentesis जैसी जांचों की सलाह जरूर देती हैं, फिर ये उनके परिवार पर निर्भर है कि वो इसे करवाते हैं या नहीं। उनका कहना है कि ऐसा करने से परिवार अवेयर होते हैं और यदि कभी किसी को यह बीमारी निकले भी तो आगे का इलाज और चिकित्सा योजना की प्लानिंग की जा सकती है और बच्चों का भविष्य सुरक्षित किया जा सकता है।

भारतीय नीति के बादजूद क्राउड फंडिंग की जरूरत!

बता दें कि भारत सरकार ने 2021 में एक दुर्लभ रोग नीति राष्ट्रीय दुर्लभ रोग नीति, 2021 लागू की। कुछ गंभीर दुर्लभ बीमारियों के लिए आर्थिक सहायता का प्रावधान किया गया है। इसका उद्देश्य दुर्लभ रोगों की जल्द पहचान करना, उचित और बेहतर इलाज उपलब्ध कराना, महंगे इलाज की लागत कम करना। ऐसी बीमारियों पर शोध और डेटा संग्रह को बढ़ावा देना।

लेकिन अफसोस कि SMA जैसी जीन थेरेपी की कीमत इतनी ज्यादा है कि सहायता के बावजूद अधिकांश परिवारों को क्राउडफंडिंग का सहारा लेना ही पड़ता है। क्या वाकई जिंदगी बचाने की कीमत इतनी होनी चाहिए कि करोड़ों रुपए जमा करने के लिए समाज से गुहार लगानी पड़े। कब बदलेंगे हालात, कब स्वास्थ्य सुविधाओं से धन्य होगा हमारा देश।

Updated on:
24 Jun 2026 05:01 pm
Published on:
24 Jun 2026 04:55 pm