
Weekend Warrior Syndrome affects Joints: कॉर्पोरेट कल्चर की कुर्सी पर बैठकर काम करने (Desk Bound Job) की आदत ने हमारी शारीरिक गतिविधियों (Physical Exercise) को वीकेंड तक सीमित कर दिया है। सोमवार से शुक्रवार या शनिवार तक ऑफिस के काम में व्यस्त रहने वाले लोग अक्सर अपनी फिटनेस की कमी को पूरा करने के लिए अपने वीक ऑफ के दिन जी-तोड़ मेहनत करते हैं। कोई संडे को अचानक 10 किलोमीटर की रनिंग पर निकल जाता है, तो कोई जिम में जाकर भारी वजन उठाने लगता है। इस आदत को 'वीकेंड वॉरियर सिंड्रोम' (Weekend Warrior Syndrome) कहा जाता है।
भले ही सुनने में यह फिटनेस के प्रति एक अच्छी कोशिश लगे, लेकिन ऑर्थोपेडिक (हड्डी और जोड़ रोग विशेषज्ञ) चेतावनी देते हैं कि 30-35 की उम्र पार करने के बाद यह आदत फायदे से ज्यादा आपके जोड़ों को गंभीर नुकसान पहुंचा सकती है। आइए विस्तार से समझते हैं कि यह 'शॉर्टकट फिटनेस' कैसे हमारे एजिंग जॉइंट्स को बीमार कर रही है।
क्या लोग वाकई वीकेंड पर की गई एक्सरसाइज को 'फिटनेस' मान लेते हैं? एक ऑर्थोपेडिक सर्जन के तौर पर आप इस सोच को कैसे देखते हैं?
हां, बहुत से लोग यह मान बैठते हैं कि पूरे सप्ताह निष्क्रिय रहने के बाद वीकेंड पर 2–3 घंटे की भारी एक्सरसाइज फिटनेस के लिए पर्याप्त है। लेकिन एक ऑर्थोपेडिक सर्जन के तौर पर मैं इस सोच को सही नहीं मानता। हमारा शरीर, खासकर हमारे जोड़, मांसपेशियां और लिगामेंट्स, नियमित गतिशीलता (Consistency) की मांग करते हैं, न कि हफ्ते में एक-दो दिन का अत्यधिक वर्कआउट। पूरे सप्ताह शांत बैठी मांसपेशियों पर अचानक अधिक भार डालने से गंभीर चोट और लिगामेंट टियर का जोखिम कई गुना बढ़ जाता है। मेडिकल साइंस में इन्हें 'वीकेंड वॉरियर्स' कहा जाता है, जो अनजाने में अपने शरीर को नुकसान पहुंचाते हैं। फिटनेस एक निरंतर प्रक्रिया है, जिसे सप्ताहभर बनाए रखना चाहिए। मेरी सलाह है कि सप्ताह में कम से कम 150 मिनट की नियमित शारीरिक गतिविधि (रोज 30 मिनट) करें। वीकेंड को पूरे हफ्ते की 'भरपाई' के रूप में नहीं, बल्कि केवल एक अतिरिक्त एक्टिविटी के रूप में देखें।
आजकल 'वीकेंड वॉरियर सिंड्रोम' के मामले कितने बढ़ गए हैं? आपके पास आने वाले मरीजों में कॉर्पोरेट प्रोफेशनल्स का प्रतिशत कितना होता है?
पिछले कुछ वर्षों में ‘वीकेंड वॉरियर’ से जुड़ी चोटों के मामलों में वृद्धि देखने को मिली है। सप्ताह भर लंबे समय तक लगातार बैठकर काम करना और फिर अचानक वीकेंड पर हाई-इंटेंसिटी स्पोर्ट्स या जिम करना प्रमुख कारण हैं। मेरे पास आने वाले ऐसे मरीजों में एक बहुत बड़ी संख्या कॉर्पोरेट और आईटी प्रोफेशनल्स की होती है। यद्यपि इसका कोई एक निश्चित वैश्विक प्रतिशत बताना उचित नहीं होगा, लेकिन क्लिनिकल अनुभवों के आधार पर यह ग्राफ तेजी से ऊपर जा रहा है। इन मरीजों में घुटने का लिगामेंट टियर, टखने की मोच (Sprain), कंधे की जकड़न और लोअर बैक इंजरी (पीठ की चोटें) सबसे अधिक देखने को मिलती हैं।
इस सिंड्रोम से बचने का सबसे प्रभावी तरीका यही है कि आप रोज़ाना थोड़ा वक्त निकालकर नियमित व्यायाम करें, किसी भी खेल से पहले सही वार्म-अप को अपनी आदत बनाएं और धीरे-धीरे ही अपने शरीर की फिटनेस क्षमता को बढ़ाएं।
30 या 35 की उम्र के बाद हमारे जोड़ों (Joints) और मांसपेशियों में ऐसा क्या बदलाव आता है कि वे अचानक आने वाले भारी दबाव को नहीं झेल पाते?
30-35 वर्ष की उम्र के बाद हमारे शरीर की प्राकृतिक रिकवरी क्षमता धीरे-धीरे कम होने लगती है। इस उम्र में मांसपेशियों की ताकत, लचीलापन और विशेष रूप से लिगामेंट्स व टेंडन्स की इलास्टिसिटी (लचक) पहले जैसी नहीं रहती। यही कारण है कि वे अचानक पड़ने वाले अत्यधिक दबाव को आसानी से सहन नहीं कर पाते। यदि आप पूरे सप्ताह पूरी तरह निष्क्रिय (Sedentary) रहते हैं और वीकेंड पर अचानक तेज़ दौड़ना या भारी वजन उठाना शुरू कर देते हैं, तो जोड़ों और टिश्यूज में गंभीर चोट का जोखिम कई गुना बढ़ जाता है। इसका मतलब यह बिल्कुल नहीं है कि इस उम्र के बाद आपको व्यायाम छोड़ देना चाहिए, बल्कि अब आपको अधिक समझदारी और नियमितता (Consistency) की जरूरत है। अचानक भारी वर्कआउट करने के बजाय, अपने रूटीन में सही स्ट्रेंथ ट्रेनिंग, डेली स्ट्रेचिंग और पर्याप्त आराम (Recovery) को शामिल करें। यही आपके जोड़ों को लंबे समय तक स्वस्थ रखने का सही फॉर्मूला है।
वर्कआउट के बाद होने वाला दर्द सामान्य 'मसल सोरनेस' (मांसपेशियों की थकान) है या किसी गंभीर लिगामेंट इंजरी का शुरुआती लक्षण के बीच क्या अंतर है ?
सामान्य मसल सोरनेस आमतौर पर वर्कआउट के 12 से 24 घंटे बाद शुरू होती है। यह शरीर के दोनों तरफ समान महसूस होती है और दो-तीन दिनों में आराम करने पर धीरे-धीरे अपने आप ठीक हो जाती है। इसके विपरीत, लिगामेंट टियर या किसी अन्य गंभीर चोट का दर्द अक्सर किसी एक ही जोड़ पर केंद्रित होता है और यह चोट लगते ही तुरंत शुरू हो जाता है। यदि आपको वर्कआउट के बाद प्रभावित हिस्से में अत्यधिक सूजन, जोड़ का अस्थिर (Unstable) महसूस होना, चलने-फिरने में कठिनाई या बहुत तेज दर्द हो, तो इसे सामान्य थकान मानकर नजरअंदाज करने की भूल बिल्कुल न करें। यदि दर्द लगातार बढ़ रहा हो या कुछ दिनों में कम न हो, तो तुरंत एक ऑर्थोपेडिक विशेषज्ञ से जांच करानी चाहिए। याद रखें, गंभीर इंजरी के मामलों में समय पर कराया गया सही निदान ही आपको भविष्य की बड़ी और जटिल समस्याओं से बचा सकता है।
जो लोग नौ से पांच की डेस्क जॉब में हैं और पूरे हफ्ते जिम नहीं जा पाते, उनके लिए जोड़ों को सुरक्षित रखने का 'गोल्डन रूल' क्या होना चाहिए?
एक ऑर्थोपेडिक सर्जन के तौर पर मेरा हमेशा से एक ही गोल्डन रूल रहा है हर दिन थोड़ा चलें, वीकेंड पर अचानक बहुत ज्यादा न करें। हफ्ते भर एक्टिव रहने के लिए ऑफिस या घर पर हर 45 से 60 मिनट में 2-3 मिनट के लिए उठकर टहलें, लिफ्ट के बजाय सीढ़ियों का इस्तेमाल करें और दिनभर में कम से कम 30 मिनट तेज चाल (Brisk Walk) से पैदल चलने की आदत डालें। इसके साथ ही, सप्ताह में 2-3 दिन हल्की स्ट्रेंथ ट्रेनिंग और नियमित स्ट्रेचिंग करने से आपके जोड़ और मांसपेशियां अंदर से मजबूत बनती हैं। यदि आप वीकेंड पर कोई नई या हाई-इंटेंसिटी स्पोर्ट्स एक्टिविटी कर भी रहे हैं, तो उससे पहले प्रॉपर वार्म-अप जरूर करें और धीरे-धीरे ही उसकी तीव्रता (Intensity) को बढ़ाएं। हमेशा याद रखें कि फिटनेस में कोई शॉर्टकट नहीं होता, नियमितता (Consistency) ही अच्छी सेहत और स्वस्थ जोड़ों का सबसे बड़ा रहस्य है।