West Bengal Election 2026: पश्चिम बंगाल में गोरखा आबादी यूं तो संख्या के लिहाज से बहुत छोटी है, लेकिन कुछ सीटों पर निर्णायक भूमिका में है। गोरखा आबादी की क्या समस्या रही है? चुनाव में गोरखा आबादी की क्या भूमिका रहेगी, इन सब सवालों का जवाब जानने की कोशिश करते हैं।
West Bengal Election 2026: केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने बुधवार को कहा कि जैसे ही भारतीय जनता पार्टी (BJP) की सत्ता पश्चिम बंगाल में आएगी, वह दार्जिलिंग में गोरखा मुद्दे को हल करने को प्राथमिकता देगी और अतीत में हुए हिंसक आंदोलनों के दौरान गोरखा समुदाय के नेताओं और कार्यकर्ताओं पर दर्ज सभी मामलों को वापस ले लेगी। अमित शाह ने वीडियो के जरिए यह संदेश राज्य की सिर्फ 1-1.25 फीसदी आबादी को क्यों दिया? आइए जानते हैं कि गोरखा आबादी की समस्या क्या है और पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के लिहाज से ये कितना महत्व रखते हैं?
Amit Shah in Darjeeling: अमित शाह को 15 अप्रैल यानी आज दार्जिलिंग पहाड़ियों के लेबोंग के ऊपरी इलाके में पहुंचना था लेकिन वह खराब मौसम के कारण वहां नहीं पहुंच पाए। उन्होंने वीडियो संदेश में कहा, “आज आप तक नहीं पहुंच पाने का मुझे गहरा खेद है। लेकिन मैं आपसे वादा करता हूं कि 21 अप्रैल को कर्सियांग के सुकना में निर्धारित जनसभा में मैं आपसे व्यक्तिगत रूप से मिलूंगा, जहां मैं दार्जिलिंग के लोगों के लिए हमारी विकास योजनाओं पर विस्तार से चर्चा करूंगा। फिलहाल मैं इतना ही कहूंगा कि जैसे ही हम पश्चिम बंगाल में सरकार बनाएंगे, हमारी प्राथमिकता गोरखा मुद्दे को जल्द से जल्द हल करना होगी।”
Gorkha Population Problems in West Bengal: दरअसल, पश्चिम बंगाल के दार्जिलिंग पर्वतीय क्षेत्र में गोरखा समुदाय का प्रश्न भारत की क्षेत्रीय राजनीति, पहचान और विकास से जुड़ा एक जटिल तथा दीर्घकालिक मुद्दा है। राज्य की गोरखा आबादी की मांग सिर्फ गोरखालैंड राज्य की मांग तक सीमित नहीं है। गोरखा अपनी सांस्कृतिक अस्मिता, राजनीतिक प्रतिनिधित्व, आर्थिक विकास और प्रशासनिक अधिकारों जैसे कई पहलुओं को लेकर दशकों से आंदोलन करते आ रहे हैं। इस आंदोलन में चुनाव के समय थोड़ी तेजी आ जाती है। आइए जानते हैं कि विधानसभा चुनाव के दृष्टिकोण से गोरखा आबादी का महत्व इतना अधिक क्यों है?
दार्जिलिंग लोकसभा क्षेत्र में कुल 5 विधानसभा सीट है। इनमें से पहाड़ी क्षेत्र में मुख्य रूप से 3 विधानसभा सीटें आती हैं- दार्जिलिंग, कर्सियांग और कालिम्पोंग। इन सीटों पर गोरखा मतदाता निर्णायक भूमिका में हैं। वर्ष 2011 की जनगणना के मुताबिक दार्जिलिंग जिले की कुल आबादी लगभग 18.4 लाख थी, जबकि वर्ष 2025 के आंकड़ों के अनुसार दार्जिलिंग जिले में लगभग 11.4 लाख मतदाता हैं। इनमें तीनों पहाड़ी विधानसभा क्षेत्रों में करीब 8-9 लाख लोग रहते हैं। दार्जिलिंग में नेपाली भाषी आबादी 60% से अधिक रही है। दार्जिलिंग में बीजेपी ने अपनी पकड़ बना रखी है। दार्जिलिंग लोकसभा सीट अभी बीजेपी के पास है।
गोरखा समुदाय मुख्य रूप से नेपाली भाषी भारतीय नागरिकों का समूह है। इनकी अपनी भाषा, संस्कृति और परंपराएं हैं। गोरखा पश्चिम बंगाल के पहाड़ी इलाके में पीढ़ियों से रहती है, लेकिन सबसे बड़ी विडंबना यह रही है कि इन्हें 'विदेशी या नेपाली कहकर बुलाया जाता है। यही पहचान का संकट उनके आंदोलन की प्रमुख वजहों में से एक है। गोरखा आंदोलन के केंद्र में अस्मिता का मुद्दा अहम रहा है। नेपाली भाषा को भारतीय संविधान की 8वीं अनुसूची में शामिल किए जाने के बावजूद, अपने ही देश में गोरखा समुदाय को खुद को भारतीय होने का प्रमाण बार-बार देना पड़ता है। दार्जिलिंग में 1.4 लाख से अधिक वोटरों के नाम हटाए जाने पर यह सवाल लोगों के मन में फिर से उठने लगा। इस सामाजिक असुरक्षा के चलते असंतोष और गहराने लग जाता है।
गोरखा आंदोलन की सबसे प्रमुख मांग 'गोरखालैंड' नामक एक अलग राज्य बनाने की रही है। इस मांग को सबसे पहले गोरखा के नेता सुभाष घीसिंग ने 1980 के दशक में उठाई थी। उन्होंने गोरखा नेशनल लिबरेशन फ्रंट (GNLF) का नेतृत्व जोरशोर किया और गोरखालैंड राज्य के गठन के मुद्दे को तीव्रता प्रदान की। इस आंदोलन ने उस समय हिंसक रूप भी धारण कर लिया था। आंदोलन के दौरान सैकड़ों लोगों की जान तक चली गई थी। इस क्षेत्र में लंबे समय तक अशांति बनी रही। अंततः 1988 में एक समझौते के तहत दार्जिलिंग गोरखा हिल काउंसिल (DGHC) का गठन किया गया, जिसे सीमित प्रशासनिक स्वायत्तता दी गई।
दरअसल, गोरखा समुदाय का मानना है कि कोलकाता से संचालित शासन उनकी स्थानीय जरूरतों और समस्याओं को ठीक से नहीं समझ पाते। यही वजह है कि वे या तो अलग राज्य की मांग करते हैं या फिर अधिक स्वायत्तता की। उनका तर्क है कि स्थानीय स्तर पर निर्णय लेने से विकास कार्य अधिक प्रभावी तरीके से हो सकते हैं।
हालांकि, गोरखा समुदाय की अपेक्षाओं पर डीजीएचसी पूरी तरह खरा नहीं उतरा। परिणामस्वरूप 2007 में बिमल गुरुंग के नेतृत्व में गोरखा जनमुक्ति मोर्चा (GJM) ने आंदोलन को नए सिरे से जीवित किया। इसके बाद 2011 में एक और समझौते के तहत गोरखालैंड टेरिटोरियल एडमिनिस्ट्रेशन (GTA) का गठन हुआ, लेकिन यह भी स्थायी समाधान साबित नहीं हो सका।
वर्ष 2017 में गोरखा आबादी ने अलग राज्य बनाने का मुद्दा एक बार फिर से उठाया। दरअसल, पश्चिम बंगाल राज्य सरकार ने 2017 में स्कूलों में बंगाली भाषा को अनिवार्य करने का प्रस्ताव लाया। इसके विरोध में व्यापक आंदोलन हुए। दार्जिलिंग में लंबे समय तक बंद और हिंसा देखने को मिली। इस घटना ने यह स्पष्ट कर दिया कि गोरखा अस्मिता और भाषा का प्रश्न आज भी बेहद संवेदनशील है।
दार्जिलिंग क्षेत्र में रहने वाली गोरखा आबादी आर्थिक दृष्टि से भी कई समस्याओं से जूझ रहा है। यह इलाका चाय बागानों और पर्यटन के लिए विश्व प्रसिद्ध है, लेकिन यहां रोजगार के अवसर सीमित हैं। चाय बागानों में गोरखा मजदूरों खासकर महिला गोरखा श्रमिकों का बहुत ज्यादा शोषण होता है। उनके बीच से काम करने वाले मजदूरों को कम मजदूरी, अस्थिर रोजगार और खराब जीवन स्थितियों के सामना करने की खबर अक्सर आती रहती है। इसके अलावा, बुनियादी सुविधाओं जैसे स्वास्थ्य, शिक्षा और बुनियादी ढांचे की कमी भी एक बड़ी चुनौती है।