
Rupai Hill: जामुन और बेर के पेड़ों पर चहचहाते पक्षी, चट्टानों की दरारों से झांकते पीपल-बरगद और जंगलों में लौटते भालू, यह सुखद दृश्य महासमुंद जिले के रूपई पहाड़ी का है। चार साल पहले तक वीरान और बेकार समझी जाने वाली यह पहाड़ी आज हरियाली की चादर ओढ़ ली है। पहाड़ी में चटाई अभियान की बदौलत यहां न सिर्फ भूजल स्तर सुधरा है, बल्कि वन्यजीवों का बसेरा भी लौट आया है।
चार साल पहले तक यह वही पहाड़ी थी, जिसे गांव के लोग बंजर, तपती और लगभग बेकार मानते थे। गर्मियों में चट्टानें तवे की तरह तपती थीं। बरसात का पानी कुछ घंटों में बह जाता था। न हरियाली थी, न पक्षियों की चहचहाहट और न ही वन्यजीवों की कोई खास मौजूदगी। लेकिन आज यह पहाड़ी केवल हरी नहीं हुई है, बल्कि उसने पर्यावरण संरक्षण की एक ऐसी कहानी लिखी है, जो मिसाल बन सकती है। मई 2026 में किए गए स्थानीय विश्लेषण के अनुसार इस क्षेत्र का औसत तापमान आसपास के क्षेत्रों की तुलना में लगभग 2.8 डिग्री सेल्सियस कम दर्ज किया गया।
इस बदलाव की शुरुआत वर्ष 2022 में हुई, जब उच्च प्राथमिक शाला कसेकेरा के प्रधान पाठक डॉ. विजय कुमार शर्मा ने कोविड काल के दौरान गांवों में शिक्षा पहुंचाने के क्रम में पहाड़ी क्षेत्र की बिगड़ती पर्यावरणीय स्थिति को करीब से महसूस किया। उन्होंने देखा कि बढ़ती गर्मी, घटती हरियाली और तेजी से सूखती धरती आने वाले समय में गंभीर संकट का रूप ले सकती है। इसी चिंता से जन्म हुआ ‘पहाड़ी में चटाई’ अभियान का। मिट्टी, बीज, बारदाना, स्थानीय संसाधनों और सामुदायिक श्रमदान के सहारे शुरू हुआ यह अभियान धीरे-धीरे पूरे क्षेत्र का जनआंदोलन बन गया। चट्टानों की दरारों में पौधे लगाए गए, वर्षाजल को रोकने के प्रयास हुए, सोख्ता गड्ढे बनाए गए, फलदार और देशी प्रजातियों का संरक्षण किया गया।
विद्यार्थियों ने इसे अपनी जिम्मेदारी माना और ग्रामीणों ने इसे अपना अभियान। आज परिणाम सामने हैं। पहाड़ी पर हरित आवरण विकसित हो चुका है। भूजल स्तर में सुधार हुआ है। पक्षियों की संख्या बढ़ी है। स्थानीय लोगों के अनुसार भालुओं की गतिविधियां पहले की तुलना में अधिक दिखाई देने लगी हैं। प्रधानपाठक डॉ. विजय कुमार शर्मा ने कहा कि पहले लोग इस पहाड़ी को बंजर चट्टानों का ढेर समझते थे। आज जब यहां पक्षियों की आवाज सुनाई देती है, पेड़ों की छांव दिखती है और वन्यजीव लौटते नजर आते हैं, तो लगता है कि प्रकृति ने हमारे प्रयासों को स्वीकार कर लिया है। तापमान में भी कमी आई।
किसी भी जंगल की असली पहचान सिर्फ पेड़ों और हरियाली से नहीं होती, बल्कि वहां मौजूद जीव-जंतुओं और पक्षियों की चहचहाहट से होती है। जब किसी उजड़े या वीरान क्षेत्र में पक्षी दोबारा लौटने लगें, तितलियां मंडराने लगें और छोटे-बड़े वन्यजीव फिर से अपना बसेरा बनाने लगें, तो यह प्रकृति के स्वस्थ होने का संकेत माना जाता है। रूपई की पहाड़ी पर भी पिछले कुछ वर्षों में ऐसा ही बदलाव दिखाई दे रहा है। पहाड़ी पर उगे बेर, जामुन और अन्य देशी प्रजातियों के पेड़ों ने पक्षियों और छोटे जीवों के लिए भोजन के साथ सुरक्षित आश्रय भी उपलब्ध कराया है। पेड़ों पर फल आने लगे तो पक्षियों की आवाजाही बढ़ी और कीट-पतंगों की मौजूदगी भी दिखाई दे रही है।
चार साल पहले यह सिर्फ एक सवाल था, क्या यह पहाड़ी फिर से हरी हो सकती है। गांव के बाहर खड़ी पथरीली ढलान पर गर्मी हर साल बढ़ रही थी और हरियाली घट रही थी। अधिकांश लोग इसे प्राकृतिक स्थिति मान चुके थे। तब डॉ. विजय कुमार शर्मा ने विद्यार्थियों के साथ पहाड़ी का अध्ययन शुरू किया, ग्रामीणों से बातचीत की और प्रकृति को पुनर्जीवित करने के छोटे-छोटे उपाय खोजने शुरू किए। यही सोच आगे चलकर पहाड़ी में चटाई अभियान बनी। गांव ने तय किया कि वह अपनी पहाड़ी को मरने नहीं देगा।
रूपई की पहाड़ी की असली सफलता जमीन के नीचे छिपी है। वर्षाजल संरक्षण और 175 से अधिक सोख्ता गड्ढों ने उस पानी को रोकना शुरू किया, जो पहले बहकर निकल जाता था। धीरे-धीरे मिट्टी में नमी बढ़ी, पौधों की जीवित रहने की क्षमता बढ़ी और भूजल पुनर्भरण का चक्र सक्रिय हुआ। जिन कुओं में पहले गर्मी के दौरान पानी की चिंता रहती थी, वहां अब स्थिति बेहतर हुई है। जल संरक्षण -पौधरोपण का यह संयोजन ही स्थानीय जलवायु सुधार की असली नींव बना।