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C-Section Delivery में क्यों ‘लाइफ-सेविंग ड्रग’ माना जाता है ऑक्सीटोसिन? गायनेकोलॉजिस्ट से समझिए

Oxytocin in C-Section: सी-सेक्शन (C-Section) डिलीवरी के दौरान ऑक्सीटोसिन (Oxytocin) हार्मोन क्यों दिया जाता है? जानिए कैसे यह छोटा सा इंजेक्शन सिजेरियन के वक्त मां की जान बचाने में सबसे बड़ी भूमिका निभाता है।
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Jul 03, 2026
C-Section Delivery Oxytocin Hypotension Low Dose Failure
कैसे जान बचाता है ऑक्सीटोसिन? (Photo:AI Generated)

C- Section Delivery: चिकित्सा विज्ञान की दुनिया में कुछ हार्मोन ऐसे हैं जो भावनाओं से लेकर जीवन और मृत्यु के बीच की कड़ी तक का सफर तय करते हैं। ऐसा ही एक जादुई और बेहद महत्वपूर्ण हार्मोन है ऑक्सीटोसिन (Oxytocin)। आम बोलचाल में लोग इसे 'लव हार्मोन', 'कडल हार्मोन' या 'बॉन्डिंग हार्मोन' के नाम से जानते हैं, क्योंकि यह आपसी प्यार, भरोसे और मातृत्व की भावना को जगाता है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि जब बात सिजेरियन डिलीवरी (C-Section) की आती है, तो यही ऑक्सीटोसिन एक 'लाइफ-सेविंग ड्रग' यानी जीवन रक्षक दवा का रूप ले लेता है?

आजकल के बदलते लाइफस्टाइल और मेडिकल जरूरतों के कारण सी-सेक्शन डिलीवरी के मामले तेजी से बढ़े हैं। ऐसे में यह समझना बेहद जरूरी है कि ऑपरेशन थियेटर के भीतर डॉक्टरों के लिए ऑक्सीटोसिन का एक छोटा सा इंजेक्शन कितना मायने रखता है और क्यों इसके बिना सिजेरियन डिलीवरी की कल्पना करना भी मुश्किल है।

पत्रिका के सवाल-जवाब डॉ. मेघा.एस. शास्त्री के साथ

आम तौर पर लोग ऑक्सीटोसिन को 'लव हार्मोन' के नाम से जानते हैं। ऑपरेशन थियेटर में सी-सेक्शन के दौरान यह एक 'लाइफ-सेविंग ड्रग' कैसे बन जाता है?

ऑक्सीटोसिन को 'लव हार्मोन' इसलिए कहते हैं क्योंकि यह बॉन्डिंग और भावनाएं बढ़ाता है, लेकिन ऑपरेशन थियेटर में सी-सेक्शन के दौरान यह एक अनिवार्य 'लाइफ-सेविंग ड्रग' (जीवन रक्षक दवा) बन जाता है। इसकी मुख्य वजहें हैं ।

  • जानलेवा ब्लीडिंग रोकना (PPH से बचाव): सी-सेक्शन में बच्चे और प्लेसेंटा (नाल) के बाहर आते ही गर्भाशय की खून की नसें खुली रह जाती हैं। ऑक्सीटोसिन तुरंत गर्भाशय की मांसपेशियों में तेज संकुचन (Contraction) पैदा करता है। इस खिंचाव से वे खुली नसें प्राकृतिक रूप से दब जाती हैं और डिलीवरी के बाद होने वाला अत्यधिक रक्तस्राव (Postpartum Hemorrhage) तुरंत रुक जाता है।
  • अटॉनिक यूटरस से सुरक्षा: सिजेरियन में शरीर को नॉर्मल लेबर पेन वाले प्राकृतिक सिग्नल्स नहीं मिलते। ऐसे में गर्भाशय ढीला पड़ सकता है। ऑक्सीटोसिन उसे वापस सही आकार में लाता है। यदि सही समय पर ऑक्सीटोसिन न दिया जाए, तो अत्यधिक खून बहने से कुछ ही मिनटों में मां की जान जा सकती है। इसीलिए यह डिलीवरी रूम का असली रक्षक है।

अगर सिजेरियन डिलीवरी के तुरंत बाद मां को ऑक्सीटोसिन न दिया जाए, तो क्या-क्या कॉम्प्लिकेशंस (जटिलताएं) आ सकती हैं?

अगर सिजेरियन डिलीवरी के तुरंत बाद मां को ऑक्सीटोसिन न दिया जाए, तो गंभीर जटिलताएं (Complications) आ सकती हैं।

  • पोस्टपार्टम हेमरेज (PPH): यह सबसे बड़ा खतरा है। गर्भाशय न सिकुड़ने के कारण खुली हुई खून की नसों से अत्यधिक ब्लीडिंग होने लगती है, जो कुछ ही मिनटों में जानलेवा बन सकती है।
  • अटॉनिक यूटरस (Atonic Uterus): गर्भाशय अपनी टोन (लचीलापन) खो देता है और बिल्कुल ढीला या स्पंज जैसा रह जाता है, जिससे आंतरिक रक्तस्राव रुकता नहीं है।
  • हाइपोवोलेमिक शॉक (Hypovolemic Shock): अचानक बहुत ज्यादा खून बह जाने के कारण शरीर में ब्लड वॉल्यूम कम हो जाता है, जिससे मां के मल्टीपल ऑर्गन फेलियर (अंगों का काम बंद करना) का खतरा बढ़ जाता है।
  • इमरजेंसी हिस्टेरेक्टॉमी (Uterus Removal): अगर दवा न मिलने से ब्लीडिंग किसी भी तरह न रुके, तो आखिरी रास्ते के तौर पर डॉक्टरों को मां की जान बचाने के लिए गर्भाशय को ऑपरेशन करके बाहर निकालना पड़ता है।
  • मिल्क इजेक्शन में देरी: ऑक्सीटोसिन की कमी से ब्रेस्ट मिल्क का फ्लो तुरंत शुरू होने में दिक्कत आती है।

डॉक्टर 'लो-डोज ऑक्सीटोसिन प्रोटोकॉल' की बात करते हैं। डिलीवरी के वक्त इसकी सही डोज तय करना एनेस्थेटिस्ट और गायनेकोलॉजिस्ट के लिए कितनी बड़ी चुनौती होती है?

डिलीवरी के वक्त ऑक्सीटोसिन की सही डोज तय करना डॉक्टरों के लिए एक 'डबल-एज्ड स्वॉर्ड' (दुधारी तलवार) जैसी चुनौती है। लो-डोज ऑक्सीटोसिन प्रोटोकॉल का मकसद मां को साइड इफेक्ट्स से बचाते हुए ब्लीडिंग रोकना होता है।यह डॉक्टरों के लिए दो बड़ी वजहों से चुनौतीपूर्ण है।

  • ओवरडोज का खतरा (High Dose Side Effects): अगर ऑक्सीटोसिन को तेजी से या ज्यादा मात्रा में दिया जाए, तो मां का ब्लड प्रेशर अचानक खतरनाक स्तर तक गिर सकता है (Hypotension)। इससे दिल की धड़कन अनियंत्रित हो सकती है और छाती में जकड़न हो सकती है।
  • अंडरडोज का खतरा (Low Dose Failure): अगर खुराक बहुत कम रह गई, तो गर्भाशय ढीला (Atonic) रह जाएगा, जिससे जानलेवा ब्लीडिंग (PPH) शुरू हो जाएगी। इसलिए, एनेस्थेटिस्ट और गायनेकोलॉजिस्ट मरीज के हार्ट रेट, ब्लड प्रेशर और गर्भाशय के कड़ेपन को पल-पल मॉनिटर करके हर एक बूंद को बेहद सटीकता से तय करते हैं।

क्या कुछ महिलाओं में ऑक्सीटोसिन दिए जाने के बाद कोई साइड इफेक्ट्स या एलर्जिक रिएक्शन भी देखने को मिलते हैं? उनसे कैसे निपटा जाता है?

क्या हाई ब्लड प्रेशर (Pre-eclampsia) या डायबिटीज से पीड़ित गर्भवती महिलाओं को ऑक्सीटोसिन देते वक्त कोई विशेष सावधानी रखनी पड़ती है?

Pre-eclampsia (हाई बीपी) या डायबिटीज से पीड़ित महिलाओं को ऑक्सीटोसिन देते वक्त डॉक्टरों को बहुत ज्यादा सतर्क रहना पड़ता है।

  • Pre-eclampsia में चुनौती: ऑक्सीटोसिन को अगर तेजी से दिया जाए तो यह ब्लड प्रेशर में अचानक उतार-चढ़ाव (पहले भारी गिरावट और फिर तेजी से उछाल) ला सकता है। हाइपरटेंशन की मरीजों में इससे स्ट्रोक या हार्ट पर गंभीर दबाव का खतरा बढ़ जाता है। इसलिए डॉक्टरों को इसकी डोज बहुत धीमी गति से (Micro-titration) देनी पड़ती है।
  • डायबिटीज में सावधानी: डायबिटिक महिलाओं में अक्सर बच्चे का वजन ज्यादा (Fetal macrosomia) होता है, जिससे गर्भाशय बहुत ज्यादा खिंच जाता है। ऐसी स्थिति में ब्लीडिंग (PPH) का रिस्क दोगुना होता है, इसलिए डॉक्टरों को ऑक्सीटोसिन के साथ-साथ अन्य बैकअप दवाएं भी तैयार रखनी पड़ती हैं।

इंटरनेट पर अक्सर यह भ्रम फैलाया जाता है कि लेबर पेन बढ़ाने या सी-सेक्शन में दिए जाने वाले सिंथेटिक हार्मोन से बच्चे पर बुरा असर पड़ता है। एक डॉक्टर के तौर पर आप इस पर क्या कहेंगी?

इंटरनेट पर फैला यह भ्रम पूरी तरह वैज्ञानिक तथ्यों से परे है। सी-सेक्शन या लेबर पेन बढ़ाने के लिए दिया जाने वाला सिंथेटिक ऑक्सीटोसिन (पिटोसिन) बिल्कुल सुरक्षित है और इसका नवजात शिशु पर कोई बुरा या परमानेंट असर नहीं पड़ता।

  • सटीक मॉनिटरिंग: जब भी मां को ऑक्सीटोसिन दिया जाता है, तो डॉक्टरों की टीम सीटीजी (CTG) मशीन के जरिए लगातार बच्चे के दिल की धड़कन (Fetal Heart Rate) को मॉनिटर करती है।
  • शॉर्ट हाफ-लाइफ: इस हार्मोन की हाफ-लाइफ शरीर में मात्र 3 से 5 मिनट की होती है। यानी यह बहुत कम समय में शरीर से बाहर निकल जाता है। यह दवा बच्चे को नुकसान पहुंचाने के लिए नहीं, बल्कि प्रसव को सुरक्षित बनाने और अत्यधिक ब्लीडिंग से मां की जान बचाने के लिए दी जाती है। आधुनिक चिकित्सा में यह पूरी तरह जांची-परखी प्रक्रिया है।
Updated on:
02 Jul 2026 06:31 pm
Published on:
03 Jul 2026 10:30 am