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Brain Stroke: युवाओं में क्यों बढ़ रहा है ब्रेन स्ट्रोक का रिस्क? न्यूरोसर्जन से जानिए वॉर्निंग साइन्स

Brain stroke: युवाओं में ब्रेन स्ट्रोक के बढ़ते मामलों की वजह क्या है? डॉक्टर से समझिए ब्रेन स्ट्रोक के बड़े वॉर्निंग साइन्स, स्लीपिंग डिसऑर्डर से दिल का कनेक्शन और इमरजेंसी में जान बचाने वाला 'FAST' फॉर्मूला।
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Jul 16, 2026
Brain stroke Headache Stress Thrombolysis Emergency Kit
क्यों आ रहा युवाओं को ब्रेन स्ट्रोक? (Photo: AI)

Brain Stroke in 30's : आज की दुनिया में यह एक आम सी बात हो गयी जहां ऑफिस की डेडलाइन का तनाव, देर रात तक जागना और अनहेल्दी खानपान- ये सब मिलकर हमारी सेहत को उस मोड़ पर ले जा रहे हैं, जहां पहले कभी युवा जाने की सोच भी नहीं सकते थे। कुछ साल पहले तक 'ब्रेन स्ट्रोक' (Brain Stroke) को बुढ़ापे की बीमारी माना जाता था, लेकिन अब आंकड़े हैरान करने वाले हैं। 30 से 35 साल के युवाओं में भी स्ट्रोक के मामले तेजी से बढ़ रहे हैं।

मेडिकल रिर्पोट्स के मुताबिक, आजकल की युवा वर्कफोर्स (Stroke in Youth Workforce) में स्ट्रोक का खतरा बढ़ने की सबसे बड़ी वजह खराब मेटाबॉलिक हेल्थ (Metabolic Health) और साइलेंट रिस्क फैक्टर्स हैं। सबसे हैरानी की बात यह है कि इसके शुरुआती लक्षण इतने आम होते हैं कि युवा इन्हें सिर्फ थकान या वर्क-स्ट्रेस समझकर नजरअंदाज कर देते हैं। आइए जानते हैं न्यूरोलॉजिस्ट द्वारा बताए गए वो 6 छुपे हुए वॉर्निंग साइन्स और रिस्क फैक्टर्स, जिन्हें 35 की उम्र वाले युवाओं को कभी हल्के में नहीं लेना चाहिए।

डॉ. कृष्णा हरि शर्मा के साथ पत्रिका के सवाल-जवाब

युवाओं में स्ट्रोक का शिकार होने वाले लोगों में क्या कोई खास पैटर्न दिखता है? जैसे क्या वे ज्यादातर आईटी/कॉर्पोरेट सेक्टर के हैं, या शिफ्ट में काम करने वाले लोग हैं?

कोरोना महामारी के बाद से युवाओं में ब्रेन स्ट्रोक (Brain Stroke) के मामले तेजी से बढ़े हैं। आजकल की भागदौड़ भरी जिंदगी और खराब लाइफस्टाइल के कारण युवा इस गंभीर बीमारी की चपेट में आ रहे हैं।

  • पोस्ट-कोरोना लाइफस्टाइल और अवसाद (Depression) : कोरोना काल के बाद से युवाओं की जीवनशैली में काफी बदलाव आया है। वर्क फ्रॉम होम के कारण लंबे समय तक घर में बैठे रहना, शारीरिक सक्रियता (Regular Physical Activities) की कमी और पर्याप्त नींद न लेना इसके बड़े कारण हैं। इसके अलावा, लंबे समय तक घर में बंद रहने के कारण कई युवा अवसाद (Depression) और अत्यधिक मानसिक तनाव (Chronic Stress) का शिकार हुए हैं, जिसने सीधे तौर पर उनकी नसों को प्रभावित किया है।
  • अनहेल्दी आदतें और जंक फूड : आजकल के वर्किंग प्रोफेशनल्स में धूम्रपान (Smoking), शराब का सेवन और जंक फूड पर निर्भरता बहुत ज्यादा बढ़ गई है। डॉ. शर्मा के मुताबिक, आईटी और कॉर्पोरेट सेक्टर में काम करने वाले अमूमन हर तीसरे से चौथे व्यक्ति में यह अस्वस्थ आदतें देखने को मिलती हैं, जो नसों में ब्लॉकेज का कारण बनती हैं।
  • शिफ्ट ड्यूटी और बायोलॉजिकल क्लॉक का बिगड़ना : जो लोग नाइट शिफ्ट या रोटेशनल शिफ्ट में काम करते हैं, उनकी बॉडी क्लॉक (Biological Rhythm) पूरी तरह अव्यवस्थित हो जाती है। इसका सीधा असर शरीर के हार्मोंस पर पड़ता है। नींद और स्ट्रेस को कंट्रोल करने वाले मुख्य हार्मोन कोर्टिसोल (Cortisol) और मेलाटोनिन (Melatonin) का संतुलन बिगड़ जाता है।
  • हार्मोनल असंतुलन से पनपती बीमारियां : जब शरीर में कोर्टिसोल और मेलाटोनिन हार्मोन का बैलेंस बिगड़ता है, तो यह शरीर में तीन गंभीर बीमारियों को ट्रिगर करता है: हाई ब्लड प्रेशर , हाई कोलेस्ट्रॉल, और मोटापा ।

युवाओं में 'बर्नआउट' और 'क्रोनिक स्ट्रेस' बहुत ज्यादा है। मानसिक तनाव सीधे तौर पर नसों को कैसे ब्लॉक या डैमेज करता है? इसका बायोलॉजिकल कनेक्शन क्या है?

  • उन्होंने बताया, शरीर में सूजन (Inflammation) बढ़ना : अत्यधिक मानसिक तनाव के कारण शरीर में 'इन्फ्लेमेटरी मार्कर्स' (जैसे HS-CRP) का स्तर तेजी से बढ़ता है। इसके साथ ही तनाव बढ़ाने वाले हार्मोन्स, कोर्टिसोल (Cortisol) और एड्रिनलिन (Adrenalin) की मात्रा भी खून में बढ़ जाती है।
  • धमनियों का सिकुड़ना (Atherosclerosis) : हार्मोन का यह बढ़ा हुआ स्तर हमारी रक्त वाहिकाओं (Blood Vessels) में 'एथिरोस्क्लेरोसिस' (Atherosclerosis) नाम की बीमारी की प्रक्रिया को बहुत तेज कर देता है। इस स्थिति में नसों की अंदरूनी परत (Inner Lining) को गंभीर नुकसान पहुंचता है और वे अंदर से सख्त व संकरी होने लगती हैं।
  • खून के थक्के बनना (Blood Clots) : मानसिक तनाव के कारण खून में मौजूद प्लेटलेट्स (Platelets) जरूरत से ज्यादा सक्रिय हो जाते हैं। प्लेटलेट्स के इस तरह हाइपरएक्टिव होने से नसों के अंदर खून का थक्का (Blood Clot) जमने की संभावना कई गुना बढ़ जाती है, जो आगे चलकर ब्लॉकेज और स्ट्रोक का मुख्य कारण बनता है।
  • दिल की धड़कन का बिगड़ना : बढ़ा हुआ एड्रिनलिन हार्मोन दिल की धड़कन में अनियमितता (Arrhythmia) पैदा करता है। जब दिल की धड़कन का यह तालमेल बिगड़ता है, तो हृदय के अंदर खून के थक्के बनने लगते हैं। ये थक्के दिल से पंप होकर सीधे सिर (दिमाग) की नसों में चले जाते हैं और वहां अचानक ब्लॉकेज कर देते हैं।

अक्सर लोग गंभीर सिरदर्द, माइग्रेन या सर्वाइकल के दर्द को स्ट्रोक का शुरुआती लक्षण नहीं समझ पाते। इन दोनों के अंतर को कैसे पहचाने?

अक्सर लोग गंभीर सिरदर्द, माइग्रेन या सर्वाइकल के दर्द को सामान्य समझकर बैठ जाते हैं, जबकि वह ब्रेन स्ट्रोक का संकेत हो सकता है। इन दोनों के बीच के अंतर को समझना बेहद आसान है।

  • स्ट्रोक की सटीक और तुरंत पहचान के लिए मेडिकल साइंस में 'BE-FAST' फॉर्मूला अपनाया जाता है, जिसके 5 मुख्य लक्षण इस प्रकार हैं।
  • B (Balance - संतुलन बिगड़ना ): मरीज को अचानक खड़े होने या चलने-फिरने में दिक्कत आने लगती है और शरीर का संतुलन बिगड़ जाता है।
  • E (Eyes - आंखों की रोशनी ): अचानक किसी एक आंख से दिखाई देना बंद हो जाता है या हर चीज धुंधली (Double Vision) नजर आने लगती है।
  • F (Face - चेहरे का टेढ़ापन ): पीड़ित व्यक्ति का चेहरा या मुस्कान एक तरफ लटक जाती है।
  • A (Arms - अंगों में कमजोरी ): हाथ या पैर में अचानक लकवा (Paralysis) जैसी स्थिति बन जाती है, झनझनाहट होती है या भारी कमजोरी महसूस होती है।
  • S (Speech - आवाज में बदलाव): मरीज की जुबान अचानक लड़खड़ाने लगती है, बोलने में तोतलाहट आ जाती है या वह साफ नहीं बोल पाता।
  • T (Time - समय का महत्व): स्ट्रोक के इलाज में समय सबसे महत्वपूर्ण है। अगर मरीज को शुरुआती 3 से 4.5 घंटे के भीतर किसी भी न्यूरो-अस्पताल पहुंचा दिया जाए, तो थक्के को पिघलाने वाली दवा (Thrombolysis) देकर दिमाग में खून का प्रवाह दोबारा चालू किया जा सकता है और मरीज की जान व अपंगता दोनों को बचाया जा सकता है।

अगर किसी के सामने दफ्तर या घर पर किसी को स्ट्रोक आ जाए, तो लोग घबरा जाते हैं। एम्बुलेंस आने तक या अस्पताल ले जाते समय शुरुआती 15-20 मिनट में क्या 'फर्स्ट एड' करना चाहिए?

यदि आपके सामने घर, ऑफिस या किसी भी जगह पर किसी व्यक्ति को ब्रेन स्ट्रोक (Brain Stroke) आ जाता है, तो एम्बुलेंस आने तक के शुरुआती 15 से 20 मिनट मरीज की जान बचाने के लिए सबसे महत्वपूर्ण होते हैं।

  • मरीज को सुरक्षित जगह पर लेटाएं (Safe Position) : मरीज को तुरंत किसी सुरक्षित और समतल जगह पर बाईं करवट (Left Lateral Position) दिलाकर लेटा दें।
  • सिर को थोड़ा ऊपर रखें : लेटाते समय ध्यान रखें कि मरीज का सिर बिस्तर या जमीन से लगभग 30 डिग्री (30°) ऊंचा होना चाहिए। इससे दिमाग पर खून का दबाव संतुलित रहता है।
  • कपड़े ढीले करें (Loosen Clothes): मरीज को सांस लेने में कोई तकलीफ न हो, इसलिए उनके पैंट, शर्ट, बेल्ट या टाई को तुरंत ढीला कर दें ताकि शरीर में ऑक्सीजन का प्रवाह बेहतर बना रहे।
  • 'स्ट्रोक-रेडी' अस्पताल के लिए एम्बुलेंस बुलाएं: बिना कोई समय गंवाए तुरंत एम्बुलेंस को कॉल करें। डॉक्टर के मुताबिक, मरीज को किसी भी सामान्य अस्पताल में ले जाने के बजाय सीधे 'स्ट्रोक-रेडी' (Stroke-Ready) अस्पताल ही ले जाएं, जहां न्यूरोलॉजी से जुड़ी सभी जांचें (जैसे CT स्कैन/MRI) और तुरंत इलाज की पूरी सुविधा उपलब्ध हो।

युवाओं के लिए आपका क्या संदेश है जो 'वर्कहोलिक' हैं और सोचते हैं कि उन्हें कुछ नहीं होगा? उन्हें अपनी लाइफस्टाइल में कौन से बदलाव तुरंत करने चाहिए?

Updated on:
16 Jul 2026 05:39 pm
Published on:
16 Jul 2026 05:38 pm