World Bee Day: आज विश्व मधुमक्खी दिवस है। आधुनिक मधुमक्खी पालन के प्रणेता एंटोन जानसा के जन्मदिन के मौके पर अंतरराष्ट्रीय मधुमक्खी दिवस मनाया जाता है। मधुमक्खियों को 'धरती के मौन रक्षक' कहा जाता है। मधुमक्खियां पर्यावरण के 'बायो-इंडिकेटर' के बतौर जानी जाती हैं। इनकी मानवीय सभ्यता को बचाने में कितनी अहम भूमिका है, आइए जानते हैं।
World Bee Day: प्रकृति का अस्तित्व बनाए और बचाए रखने के लिए सह-अस्तित्व का होना जरूरी है। धरती पर जीवन का संतुलन सिर्फ बड़े, भयंकर, जहरील जीवों के बल पर नहीं बनता है, बल्कि इसमें छोटे और सूक्ष्म जीव भी बड़ी भूमिका निभाते हैं। ऐसे ही छोटे जीवों में एक होती हैं- मधुमक्खियां। यह देखने में बेहद छोटी, पिद्दी और साधारण लग सकती है, लेकिन यह पृथ्वी के पारिस्थितिक तंत्र, कृषि उत्पादन और मानव जीवन के लिए अत्यधिक आवश्यक हैं। क्या आप इस बात की कल्पना कर सकते हैं कि अगर धरती से मधुमक्खियां समाप्त हो जाएं तो कृषि उत्पादन काफी कमजोर पड़ सकता है? क्या जैव विविधता गंभीर खतरे में पड़ सकती है? आइए शहद की रानी मधुमक्खी के बारे में जानते हैं सबकुछ।
Why Bees are important to us? दरअसल, मधुमक्खियों के बारे में किसी से पूछिए तो छूटते ही जवाब होता है कि वह हमें शहद देती है। हालांकि मधुमक्खी फल और सब्जियों के उत्पादन में भी बहुत मदद करती है। वे परागण (Bee Pollination) की प्रक्रिया में सबसे बड़ी भूमिका निभाती हैं। परागण के बिना अधिकांश पौधे फल और बीज नहीं बना सकते। यही वजह है कि मधुमक्खियों को 'धरती के मौन रक्षक' कहा जाता है। लेकिन, दुखद बात यह है कि ग्लोबल वार्मिंग के चलते हो रह जलवायु परिवर्तन, खेती में रासायनिक कीटनाशकों और पर्यावरण प्रदूषण के कारण मधुमक्खियों की संख्या लगातार घट रही है। यह पूरी मानव सभ्यता के लिए चिंता का विषय है।
मधुमक्खियों के बारे में जंगल कथा सीरीज पुस्तक के लेखक कबीर संजय कहते हैं कि हमें हर तीसरे निवाले के लिए मधुमक्खियों का शुक्रगुजार होना चाहिए। अगर मधुमक्खियां नहीं होंगी, तो हमारी हरी-भरी धरती का रंग धूसर और पीला हो जाएगा। वे 75 फीसदी पेड़-पौधों का जीवन संभव बनाती हैं। मधुमक्खियों के चलते ही फल, सब्जी और बीज पैदा होते हैं। कृषि में कीटनाशकों के अत्यधिक इस्तेमाल, कारखानों से निकले वाले रसायिनक कचरे और प्रदूषित वायु उनकी पूरी आबादी को नष्ट करने में लगी हुई है। कीटनाशकों के रसायन नीओनिकोटिनॉयड (Neonicotinoid) मधुमक्खियों के तंत्रिका तंत्र को प्रभावित करते हैं। इसके चलते इनकी मौत तक हो जाती है। इसे मधुमक्खियों के अस्तित्व पर संकट समझने की बजाय, पूरी मानव सभ्यता का संकट मानना चाहिए।
मधुमक्खियां घर, बागानों में लगे फूलों से रस (Nectar) और परागकण (Pollen) इकट्ठा करती हैं। इसी प्रक्रिया के दौरान वे एक फूल से दूसरे फूल तक पराग पहुंचाती हैं। मधुमक्खियों के इस काम को वनस्पति विज्ञान की भाषा में 'परागण' कहा जाता है। परागण की प्रकिया से गुजरकर ही पौधों में फल, सब्जियां, बीज और नई फसलें पैदा होती हैं। यदि परागण की प्रक्रिया रुक जाए तो खेती और प्राकृतिक वनस्पति दोनों ही प्रभावित होंगे। मधुमक्खियों ने प्रकृति के इस चक्र को लाखों, करोड़ों वर्षों से बनाए रखा है।
दुनिया में परागन की प्रक्रिया रूक जाए तो 75 फीसदी खाद्य फसलें कम उत्पादित होंगी। इस परागन में मधुमक्खियों की भूमिका सबसे ज्यादा होती है। मधुमक्खियों के परागन के बगैर सेब, आम, बादाम, सूरजमुखी, सरसों, टमाटर, कद्दू, स्ट्रॉबेरी और कॉफी जैसी फसलें पर्याप्त मात्रा में उत्पादित नहीं हो सकती हैं।
भारत जैसे कृषि प्रधान देश में तो मधुमक्खियों का महत्व और भी बढ़ जाता है। इनके द्वारा परागन की मदद से तिलहन, फल और सब्जियों की पैदावर भी बढ़ाई जा सकती है। एक अनुमान के मुताबिक मधुमक्खियों की उपस्थिति खाद्य फसलों के उत्पादन को 20 से 70 प्रतिशत तक बढ़ा सकती है। जाहिर है कि इससे किसानों की आमदनी में बढ़ोतरी होगी और देश की खाद्य सुरक्षा मजबूत होती है। ये ना रहें तो उत्पादन में कमी का सामना करना पड़ेगा। खाद्य फसलों की कीमतें बढ़ेंगी और इसके चलते आम लोगों को पोषण की कमी का सामना करना पड़ेगा। कुल मिलाकर, मधुमक्खियां मनुष्यों के लिए भोजन के साथ उनके लिए पर्याप्त पोषण भी मुहैया कराने में मदद करती है।
इस धरती पर करोड़ों किस्म के पौधे और लाखों किस्म के पौधे पाए जाते हैं और वे सभी में आपस में एक-दूसरे से परस्पर जुड़े हुए होते हैं। मधुमक्खियां जैव विविधता की रक्षा में जबरदस्त भूमिका निभाती हैं। अगर वे ना हों तो जंगली पौधों और जंगली जीवों के सामने भोजन की समस्या उठ खड़ी हो। मधुमक्खियां जंगली पौधों के परागण में मदद करती हैं, जिसके चलते जंगलों और घास के मैदानों में नए पौधे उगते हैं। इन हरे-भरे पौधों और घास के मैदानों पर निर्भर पशु, पक्षी, और कीड़े-मकोड़ों को भी भरपूर भोजन मिल पाता है और वे जीवित रहते हैं।
मधुमक्खियां पूरे खाद्य श्रृंखला (Food Chain) को स्थिर बनाए रखती हैं। यही वजह है कि मधुमक्खियों के अस्तित्व को बचाने के लिए सरकारें इनके पालन को बढ़ावा देने के लिए राष्ट्रीय मधुमक्खी एवं शहद मिशन और 'मीठी क्रांति' जैसी योजनाएं चलाती हैं, क्योंकि उन्हें पता है कि यदि इनकी संख्या कम हो जाए, तो कई पौधों की प्रजातियां धीरे-धीरे समाप्त होने लगेंगी। देश में पारंपरिक रूप से मधुमक्खी पालन किया जाता रहा है। अच्छी बात है कि मधुमक्खियों की आबादी पंजाब, हरियाणा, उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश और बिहार जैसे राज्यों में तेजी से बढ़ रही है।
मधुमक्खियों से पर्याप्त मात्रा में शहद तो मिलता ही है। इसके साथ मोम, रॉयल जेली, प्रोपोलिस (Propolis) और मधुमक्खी विष (Apitoxin) जैसे कई महत्वपूर्ण उत्पाद भी प्राप्त होते हैं। प्रोपोलिस को 'मधुमक्खी का गोंद' भी कहा जाता है। यह एक प्राकृतिक रालयुक्त पदार्थ होता है। मधुमक्खी इसका निर्माण फूलों की कलियों, पेड़ के रसों और छाल से इकट्ठा किए गए पदार्थों में अपने शरीर के पाचक स्राव और मोम को मिलाकर करती है। वह इससे अपने छत्ते को सील करने, छत्तों में आई दरारों को भरने और कीटाणुओं (Antibacterial) से बचाने में करती हैं। अपने छत्तों को खराब मौसम से बचाने में भी इसका उपयोग होता है। इसका औषधि, सौंदर्य प्रसाधन और खाद्य उद्योगों में इस्तेमाल किया जाता है।