Rare Earth Elements: दुनिया के हाई- टेक बाजार में चीन की 'घेराबंदी', जानिए कैसे चीन ने रेयर अर्थ एलिमेंट्स के जरिए अमेरिका से लेकर भारत तक की रफ्तार पर लगाम लगा रखी है ,अरबों डॉलर का असली खेल
Rare Earth Elements: दुनिया अब तीसरे विश्व युद्ध की ओर झुकती चली जा रही है। यह जंग जमीन के लिए नहीं, बल्कि उस कीमती मिट्टी के लिए है जिसके बिना आधुनिक जीवन शैली थम सकती है। मंगल ग्रह पर जाने वाला रॉकेट हों, सरहद पर तैनात मिसाइल या फिर स्मार्टफोन- इन सबके पीछे रेयर अर्थ एलिमेंट्स की जादुई ताकत छिपी है। इसका खजाना सब से ज्यादा चीन के पास है। अगर यह खजाना बंद हो गया तो दुनिया के बड़े देशों की फैक्ट्रियों में ताले लग सकते हैं।
चीन के पास सबसे बड़ा कीमती खनिज पदार्थ 44.0 मिलियन टन का भंडार है और इसी वजह से वह इस क्षेत्र में दुनिया की सबसे बड़ी ताकत बन गया है। पिछले 30 सालों में चीन ने ऐसी मजबूत सप्लाई चेन तैयार की है, जिसे तोड़ना दूसरे देशों के लिए बहुत मुश्किल है। दुनिया का करीब 70% कच्चा माल चीन से आता है, लेकिन इसे तैयार करना बहुत कठिन होता है, और इसमें चीन सबसे आगे है। चीन के पास लगभग 85 -90% रिफाइनिंग सिस्टम है । चीन दूसरे देशों से सस्ता कच्चा माल खरीदकर अपनी तकनीक और सस्ती मजदूरी से उसे महंगे तैयार सामान जैसे चुंबक, इलेक्ट्रिक गाड़ियों के पार्ट्स और रक्षा उपकरण में बदल देता है। इसी कारण आज पूरी दुनिया नई तकनीक और ग्रीन एनर्जी के लिए चीन पर निर्भर है, जो उसे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर एक बड़ी ताकत बनाता है।
ब्राजील के पास 21.0 मिलियन टन भंडार (Rare earth Deposits) के साथ दूसरे नंबर पर है। यहां सोना, लोहा और कई कीमती खनिज भारी मात्रा में पाए जाते हैं। लेकिन इसके बावजूद वह इन खनिजों का सही उपयोग करने में पीछे रह गया है। भूगर्भीय सर्वेक्षणों के अनुसार, ब्राजील के पास दुनिया के सबसे बड़े दुर्लभ खनिज भंडार में से एक है। दुनिया में इसकी हिस्सेदारी सिर्फ 1-2% तक ही है। ब्राजील की सबसे बड़ी कमजोरी उसकी औद्योगिक बुनियादी संरचना और रिफाइनिंग क्षमता का अभाव है। कच्चे अयस्क को शुद्ध करने और उसे ज्यादा कीमती उत्पादों में बदलने के लिए जरूरी तकनीक और रिफाइनरी बहुत कम है, जिसके चलते ब्राजील आयात-निर्यात बहुत कम कर पता है और घरेलू हाई-टेक जरूरतों, जैसे कि स्मार्टफोन, कंप्यूटर और औद्योगिक मशीनरी के लिए, पूरी तरह चीन से आने वाले तैयार सामान पर निर्भर रहता है।
Rare earth Deposits in India: भारत के पास करीब 7.2 मिलियन टन का भंडार है, जो ज्यादातर समुद्र किनारे मिलने वाली मोनाजाइट रेत में पाया जाता है। जिसमें थोरियम ज्यादा मात्रा में होता है। भारत वैश्विक कच्चे माल के उत्पादन में लगभग 1-2% का योगदान देता है। भारत में रिफाइनिंग का कार्य 'इंडियन रेयर अर्थ्स लिमिटेड' (IREL) की तरह सरकारी कम्पनिया कर रही हैं । लेकिन यह उत्पादन वैश्विक मांग की तुलना बहुत कम है। भारत की रिफाइनिंग तकनीक अभी भी उतनी विकसित नहीं हुई है कि वह वैश्विक मानकों पर चीन के बराबर हो सके । व्यापारिक नजरिए से देखें तो भारत कच्चे माल का बहुत कम निर्यात करता है। भारत अपनी इलेक्ट्रॉनिक और नवीकरणीय ऊर्जा आवश्यकताओं के लिए 90% से अधिक तैयार माल का आयात करता है। सरकार 'मेक इन इंडिया' (Make in India) और 'आत्मनिर्भर भारत' (Atmanirbhar Bharat) के तहत इस क्षेत्र में निजी निवेश को प्रोत्साहित करने की कोशिश कर रही है, ताकि भविष्य में निर्भरता को कम किया जा सके।
ऑस्ट्रेलिया आज चीन को चुनौती देने वाले देशों में उभर रहा है। उसके पास करीब 6.3 मिलियन टन का भंडार है। यह दुर्लभ खनिजों का काफी बड़ा उत्पादक है और वैश्विक बाजार में कच्चे माल की इसकी हिस्सेदारी करीब 10-14% है। ऑस्ट्रेलिया के पास बेहतरीन खनन तकनीक और उच्च गुणवत्ता वाले खनिज भंडार हैं, 'माउंट वेल्ड' जैसी खदानें जो दुनिया में मशहूर हैं। ऑस्ट्रेलिया के पास भी रिफाइनिंग क्षमता कम रही है। लेकिन मुश्किल कामों के लिए वह अभी भी चीन और मलेशिया पर निर्भर है। ऑस्ट्रेलिया अब तेजी से अपनी घरेलू रिफाइनिंग और डाउनस्ट्रीम क्षमताओं को बढ़ाने में निवेश कर रहा है। वह अमेरिका, जापान और भारत के साथ मिलकर एक वैकल्पिक 'सप्लाई चेन' बनाने में लगा हुआ है। ताकि वैश्विक निर्भरता दूसरे देशों से हटाया जा सके। ऑस्ट्रेलिया का मकसद सिर्फ कच्चा माल बेचना नहीं, बल्कि पूरी उत्पादन प्रक्रिया बनाना है।
रूस के पास दुर्लभ तत्वों का बड़ा भंडार है, फिर भी वह वैश्विक बाजार में पीछे है। उसके पास करीब 3.8 मिलियन टन का भंडार है, लेकिन उसका वैश्विक उत्पादन योगदान सिर्फ 1- 2% के आसपास ही रहता है। रूस की रिफाइनिंग तकनीक काफी पुरानी है, जो सोवियत काल के बुनियादी ढांचे पर आधारित है। रूस ज्यादातर उत्पादन और रिफाइनिंग अपने रक्षा और हवाई- अंतरिक्ष उद्योग के लिए ही कर रहा है। यूक्रेन युद्ध के बाद लगे अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों ने रूस के इस क्षेत्र का व्यापार को मुश्किल कर दिया है। इस समय में रूस का निर्यात केवल उसके चुनिंदा मित्र देशों तक ही सीमित है। रूस अपनी तकनीक को आधुनिक बनाने और उत्पादन बढ़ाने की योजना तो बनाता है, लेकिन जरूरी पैसे और विदेशी निवेश कम होने की वजह से योजना पूरी नहीं हो पा रही है।
वियतनाम तेजी से उभरता हुआ देश है। उसका खनिज उत्पादन अभी दुनिया में 1% से भी कम है, लेकिन उसके पास करीब 3.5 मिलियन टन का भंडार है, जो उसे भविष्य में एक ताकतवर देश बना सकता है। वियतनाम की सबसे बड़ी ताकत उसकी सही जगह पर होना और दोस्तों का सहयोग है। अभी वियतनाम की रिफाइनिंग क्षमता बढ़ रही है, लेकिन दक्षिण कोरिया और जापान जैसे देश चीन पर अपनी निर्भरता कम करने के लिए वियतनाम में भारी निवेश कर रहे हैं। ये देश वियतनाम में अत्याधुनिक रिफाइनिंग प्लांट लगा रहे हैं, ताकि आने वाले समय में वियतनाम एक बड़ा निर्माण केंद्र बन सके। वियतनाम अभी अपना कच्चा माल को रिफाइनिंग के लिए चीन भेजता है और बदले में तैयार माल वहां से खरीदता है। अंतरराष्ट्रीय निवेश की रफ्तार को देखकर लगता है कि अगले दस साल में वियतनाम चीन का एक मजबूत विकल्प बन सकता है।
अमेरिका अपनी खदानों से दुनिया का लगभग 12-14% कच्चा माल निकालता है ,उसके पास लगभग 1.9 मिलियन टन का भंडार है। लेकिन अमेरिका के पास इन कच्चे खनिजों को शुद्ध करने के लिए पर्याप्त रिफाइनिंग क्षमता नहीं है। इस तकनीकी कमी के कारण, अमेरिका अपनी खदानों से निकला हुआ 99 % से ज्यादा कच्चा माल चीन को जहाज से भेजता है। इसके बाद, वही चीन उस माल को शुद्ध करता है और अमेरिका अपनी जरूरत का 80% रिफाइंड माल वापस चीन से आयात करता है। यह स्थिति अमेरिका के लिए एक बड़ी सुरक्षा चुनौती बन गए हैं। अमेरिकी सरकार अब अरबों डॉलर के निवेश के साथ घरेलू रिफाइनरी बनाने और इस सप्लाई चेन को सुरक्षित करने के लिए युद्ध स्तर पर काम कर रही है ताकि चीन के साथ बढ़ते तनाव के बीच उसकी रक्षा और तकनीक उद्योग सुरक्षित रह सकें।
खनिज पदार्थों का उपयोग आज लगभग हर आधुनिक क्षेत्र में किया जाता है, इलेक्ट्रॉनिक्स में मोबाइल, लैपटॉप और टीवी बनाने में, इलेक्ट्रिक गाड़ियों की बैटरी और मोटर में, तथा ग्रीन एनर्जी के लिए सोलर पैनल और पवन चक्कियों में। इसके अलावा ये रक्षा क्षेत्र में मिसाइल, रडार और लड़ाकू विमानों में, अंतरिक्ष तकनीक में सैटेलाइट और रॉकेट में, तथा चिकित्सा क्षेत्र में MRI और एक्स-रे मशीनों में उपयोग किया जाता है । औद्योगिक मशीनरी, रोबोटिक्स, ऊर्जा स्टोरेज बैटरी , 5G जैसी संचार तकनीकों में भी इनका महत्वपूर्ण योगदान होता है। खनिज आधुनिक तकनीक, ऊर्जा और सुरक्षा प्रणाली की रीढ़ की हड्डी है, जो इनके बिना आज का विकास संभव नहीं है।