
Delimitation and Lok sabha Seat: लोकसभा में सीटों की संख्या बढ़ाने और परिसीमन की चर्चा एक बार फिर तेज हो गई है। संसद के मानसून सत्र में सरकार और विपक्ष के बीच इसे लेकर बातचीत हुई, लेकिन कोई स्पष्ट सहमति नहीं बन सकी। सवाल सिर्फ इतना नहीं है कि सीटें बढ़ेंगी या नहीं, बल्कि यह भी है कि यदि ऐसा हुआ तो भारत की राजनीति, राज्यों के प्रतिनिधित्व और संसद की कार्यप्रणाली पर इसका क्या असर पड़ेगा?
संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू ने विपक्ष नेता राहुल गांधी से मुलाकात कर आगामी विधायी एजेंडे और परिसीमन से जुड़े मुद्दों पर चर्चा की। हालांकि बैठक के बाद कांग्रेस की ओर से कोई स्पष्ट आश्वासन नहीं दिया गया। सरकार संविधान (131वां संशोधन) विधेयक सहित अन्य प्रस्तावों को आगे बढ़ाने की कोशिश कर रही है, जबकि विपक्ष परिसीमन के प्रभाव और राज्यों के हितों को लेकर सवाल उठा रहा है।
परिसीमन के मायने हैं जनसंख्या के आधार पर संसदीय और विधानसभा क्षेत्रों की सीमाओं का दोबारा निर्धारण करना। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि प्रत्येक सांसद लगभग समान संख्या की आबादी का प्रतिनिधित्व करे।
यदि किसी क्षेत्र की आबादी बहुत बढ़ गई है और दूसरे क्षेत्र की कम है, तो परिसीमन के जरिए सीटों और सीमाओं में बदलाव किया जाता है।
1976 में 42वें संविधान संशोधन के जरिए लोकसभा सीटों की संख्या पर रोक लगा दी गई थी, ताकि परिवार नियोजन अपनाने वाले राज्यों को नुकसान न हो। बाद में 84वें संविधान संशोधन (2001) से यह रोक 2026 तक बढ़ा दी गई।
यही कारण है कि अब परिसीमन की चर्चा फिर तेज हो गई है।
भारत की आबादी 1951 की तुलना में लगभग चार गुना हो चुकी है। लेकिन सांसदों की संख्या लगभग वही है। यही कारण है कि एक सांसद पर पहले की तुलना में कहीं अधिक मतदाता हैं। कई संसदीय क्षेत्रों की आबादी करोड़ के करीब पहुंच रही है। प्रतिनिधित्व का संतुलन प्रभावित हो रहा है।
अमेरिका - अमेरिका में प्रतिनिधि सभा की सीटें 435 पर स्थिर हैं, लेकिन हर 10 साल की जनगणना के बाद राज्यों के बीच सीटों का पुनर्वितरण होता है।
ब्रिटेन - सीटों की सीमाएं समय-समय पर बदली जाती हैं ताकि, आबादी के अनुसार प्रतिनिधित्व बना रहे।
ऑस्ट्रेलिया - जनसंख्या बढ़ने पर संसद की सीटों में बदलाव संभव है।
कनाडा - लगभग हर जनगणना के बाद संसद में सीटों की संख्या बढ़ाई जाती है ताकि बढ़ती आबादी का प्रतिनिधित्व हो सके।
मतलब दुनिया के कई लोकतंत्र समय-समय पर सीटों या निर्वाचन क्षेत्रों में बदलाव करते हैं, हालांकि हर देश का मॉडल अलग है।
क्यों लग रही जरूरत?- लोकतंत्र में समान प्रतिनिधित्व जरूरी। आबादी के अनुसार सांसदों की संख्या बढ़नी चाहिए। बड़े निर्वाचन क्षेत्रों की समस्या कम होगी।
क्यों हो रहा विरोध? - जनसंख्या नियंत्रण करने वाले राज्यों को नुकसान हो सकता है। राजनीतिक शक्ति का संतुलन बदल सकता है। संसद का संचालन अधिक जटिल हो सकता है।
संवैधानिक विशेषज्ञों का मानना है कि परिसीमन केवल सीटें बढ़ाने का मामला नहीं है, बल्कि यह संघीय ढांचे, राज्यों के प्रतिनिधित्व और लोकतांत्रिक संतुलन से जुड़ा विषय है। इसलिए किसी भी फैसले में जनसंख्या, क्षेत्रीय संतुलन और संविधान की भावना-तीनों का ध्यान रखना होगा।
कहना होगा कि परिसीमन केवल चुनावी सीमाएं बदलने की प्रक्रिया नहीं, बल्कि भारत के लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व की नई रूपरेखा तय करने वाला फैसला हो सकता है। आने वाले वर्षों में यह तय करेगा कि संसद में किस राज्य की आवाज कितनी मजबूत होगी और बदलती आबादी के अनुरूप लोकतंत्र खुद को किस तरह ढालेगा। इसलिए यह बहस केवल राजनीतिक नहीं, बल्कि संवैधानिक और राष्ट्रीय महत्व का विषय है।