
ESports Career in India: क्या गेमिंग सिर्फ समय बिताने का जरिया है, या यह एक असली करियर बन सकता है? भारत में ई-स्पोर्ट्स की दुनिया इसका जवाब खुद दे रही है। नए करियर के रास्ते, बड़े ब्रांड्स का निवेश और सरकार की स्पष्ट नीतियों के साथ यह क्षेत्र अब सिर्फ मनोरंजन नहीं, बल्कि संभावनाओं का बड़ा मैदान बन चुका है।
अगस्त 2025 में सरकार ने 'ऑनलाइन गेमिंग प्रोत्साहन और नियमन अधिनियम, 2025' पारित किया, जिसने रम्मी, पोकर और फैंटेसी स्पोर्ट्स जैसे पैसों वाले ऑनलाइन गेम्स पर रोक लगाते हुए ई-स्पोर्ट्स और सामाजिक गेम्स को बढ़ावा देने का रास्ता साफ किया। इस कानून ने ई-स्पोर्ट्स को एक वैध प्रतिस्पर्धी खेल के रूप में मान्यता दी और टूर्नामेंट, प्रशिक्षण अकादमियों तथा तकनीकी मंचों के लिए दिशा-निर्देश तय किए।
इसके बाद मई 2026 में 'ऑनलाइन गेमिंग नियम, 2026' लागू हुए, जिनमें ई-स्पोर्ट्स को स्पष्ट रूप से परिभाषित किया गया और एक नया डिजिटल नियामक 'भारतीय ऑनलाइन गेमिंग प्राधिकरण' बनाया गया। इसके तहत पंजीकरण, उपयोगकर्ता सुरक्षा, शिकायत निवारण और पारदर्शिता जैसी व्यवस्थाएं लागू हुईं, जिसने इस उद्योग को निवेश और विस्तार के लिए एक भरोसेमंद आधार दिया।
2025 में भारत का ई-स्पोर्ट्स बाजार करीब 239 मिलियन डॉलर का था और अनुमान है कि 2034 तक यह बढ़कर 1.09 अरब डॉलर तक पहुंच सकता है। यानी करीब साढ़े अठारह प्रतिशत की सालाना वृद्धि दर से।
एक दूसरी रिपोर्ट के मुताबिक 2026 में यह बाजार करीब 240.3 मिलियन डॉलर का आंका गया था, इसके 2033 तक 765.3 मिलियन डॉलर तक पहुंचने की उम्मीद है। वहीं कुछ अन्य अनुमान बताते हैं कि 2024 में यह बाजार 67.8 मिलियन डॉलर का था और 2030 तक साढ़े तीन सौ मिलियन डॉलर के करीब पहुंच सकता है। भले ही आंकड़े अलग-अलग रिपोर्ट में थोड़े अलग हों, लेकिन संकेत एक जैसा है। मोबाइल-प्रथम संस्कृति, इंटरनेट की व्यापक पहुंच और युवा आबादी ने इस क्षेत्र को मजबूत जमीन दी है।
एक सर्वेक्षण के मुताबिक 83 प्रतिशत ई-स्पोर्ट्स खिलाड़ी इसे आर्थिक रूप से व्यवहारिक करियर मानते हैं और इनमें से 49 प्रतिशत इसे बहुत व्यावहारिक बताते हैं। हर तीन में से करीब दो खिलाड़ी, यानी लगभग 75 प्रतिशत युवा इसे पूर्णकालिक पेशे के तौर पर अपनाने पर विचार कर चुके हैं।
शीर्ष खिलाड़ी जैसे स्काउट (तनमय सिंह) और जोनाथन अमराल हर साल करीब एक करोड़ रुपए तक कमा रहे हैं। हैरत की बात यह सिर्फ खिलाड़ियों तक सीमित नहीं। कोच, विश्लेषक, टीम मैनेजर और कंटेंट क्रिएटर जैसी भूमिकाओं में भी दिलचस्पी तेजी से बढ़ रही है। सर्वे में शामिल 56 प्रतिशत लोगों ने खिलाड़ी के अलावा दूसरी भूमिकाओं में करियर बनाने की इच्छा जताई।
भारत में अब दो हजार से ज्यादा गेमिंग कंपनियां काम कर रही हैं, जो डेवलपमेंट, पब्लिशिंग, ई-स्पोर्ट्स, कंटेंट क्रिएशन और सहायक कारोबार में एक लाख तीस हजार से अधिक पेशेवरों को रोजगार दे रही हैं। ई-स्पोर्ट्स फ्रैंचाइजी, प्रसारण साझेदारियां और ब्रांड निवेश भी लगातार बढ़ रहे हैं, इससे यह क्षेत्र सिर्फ खेल नहीं, बल्कि मनोरंजन और व्यवसाय दोनों का रूप लेता जा रहा है।
राष्ट्रीय स्तर पर तैयारी भी शुरू हो चुकी है। नोडविन गेमिंग को ईस्पोर्ट्स वर्ल्ड कप फाउंडेशन ने भारत का राष्ट्रीय टीम पार्टनर नियुक्त किया है, जो क्वालिफायर मुकाबलों, टीम की संरचना और अंतरराष्ट्रीय प्रतिनिधित्व की जिम्मेदारी संभालेगा।
इतनी संभावनाओं के बावजूद रास्ता आसान नहीं है। कई खिलाड़ियों के लिए वित्तीय अस्थिरता और लंबे समय तक टिकने वाले करियर पथ की कमी सबसे बड़ी चिंता बनी हुई है। फ्रैंचाइजी लीग, प्रसारण नेटवर्क और खिलाड़ी विकास के मॉडल अभी पूरी तरह विकसित नहीं हुए हैं। ग्रामीण और अर्ध-शहरी इलाकों में डिजिटल बुनियादी ढांचे की कमी और नीतिगत स्पष्टता का अभाव भी इस क्षेत्र की रफ्तार में रुकावट बना हुआ है।
भारत का गेमिंग समुदाय दुनिया के कुल गेमिंग समुदाय का करीब 20 प्रतिशत है, लेकिन वैश्विक गेमिंग अर्थव्यवस्था में इसका योगदान अभी भी बहुत कम है। इसी असंतुलन को पाटने के लिए अब भारत अपनी खुद की आईपी, लीग और फ्रैंचाइजी बनाने की दिशा में काम कर रहा है। यानी सिर्फ खेलने वाला देश बनने के बजाय, बनाने वाला देश बनने की कोशिश।
सरकार की नीतिगत स्पष्टता, बढ़ता निवेश और संस्थागत समर्थन मिलकर ई-स्पोर्ट्स को एक स्थायी करियर और उद्योग में बदल सकते हैं। स्कूलों-कॉलेजों में ई-स्पोर्ट्स टूर्नामेंट, करियर काउंसलिंग और स्थानीय गेमिंग कैफे जैसी पहलें इस क्षेत्र को और मजबूती दे सकती हैं। अगर खिलाड़ी, ब्रांड और संस्थान मिलकर काम करें, तो भारत वैश्विक ई-स्पोर्ट्स मानचित्र पर एक मज़बूत खिलाड़ी बनकर उभर सकता है।
ऐसे में कहा जा सकता है कि भारत में ई-स्पोर्ट्स अब सिर्फ मनोरंजन नहीं रह गया। बल्कि यह करियर, निवेश और राष्ट्रीय पहचान का एक नया मैदान बनता जा रहा है। यही सही समय है जब युवा इसे गंभीरता से देखें और एक वास्तविक, सम्मानजनक विकल्प के तौर पर अपनाएं।