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छोटी जमीन पर बड़ी कमाई: कैसे एक खेत बन रहा है मछली, बाग और मुर्गीपालन का सौदागर, बदल रहा किसानों की तकदीर

Integrated Farming Model: आपके पास जमीन का छोटा सा टुकड़ा भी है, तो आप उसे कैसे उपजाऊ और लाभ देने वाली बना सकते हैं, देशभर से किसानों की सफलता की कहानियां हर रोज सामने आने लगी हैं कि कैसे वो अपना बड़ा सपना साकार होते देख रहे हैं, भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद का मॉडल जल भराव वाली जमीनों को बना रहा मुनाफे का सौदा
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भारत

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Sanjana Kumar

Aug 21, 2026

Integrated Farming Model

Integrated Farming Model: जानें छोटे से जमीन के टुकड़ा किसानों को कैसे बना रहा मालामाल? (AI Creative)

Integrated Farming Model: क्या थोड़ी-सी जमीन में भी बड़ा सपना पूरा हो सकता है? बिहार के कई गांवों में इसका जवाब आज हां में मिल रहा है। सीमित संसाधनों और घटती जमीन से जूझते छोटे किसानों के लिए एक नया रास्ता खुल रहा है। समेकित कृषि प्रणाली, यानी खेती, पशुपालन, मछलीपालन और बागवानी को एक साथ जोड़कर की जाने वाली खेती। यह तरीका न सिर्फ किसानों की जेब भर रहा है, बल्कि मिट्टी की सेहत भी सुधार रहा है।

एक खेत में कई कमाई के रास्ते

इस प्रणाली की खासियत यही है कि किसान अकेले फसल पर निर्भर नहीं रहता। खेत, मछली-तालाब, बाग और पशुपालन को एक साथ मिलाकर काम करने से मिट्टी की उर्वरता बनी रहती है, लागत घटती है और आय के कई नए रास्ते खुलते हैं। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद की मोतिहारी स्थित शाखा ने इस मॉडल को बिहार के उन इलाकों में उतारा है, जहां साल के बड़े हिस्से में पानी भरा रहता है, यानी जलजमाव वाले क्षेत्र। यहां मछलीपालन, बागवानी, पशुपालन और फसल को जोड़कर किसानों को नए और मुनाफे वाले विकल्प दिए गए हैं।

आंकड़े जो भरोसा जगाते हैं

एक अध्ययन के अनुसार, जब फसल के साथ मछलीपालन और बागवानी में मुर्गीपालन भी जोड़ दिया गया, तो प्रति एकड़ (हेक्टेयर) करीब तीन लाख चार हजार नौ सौ रुपए की शुद्ध कमाई हुई और लागत के मुकाबले फायदे का अनुपात दो गुना से भी ज्यादा पहुंच गया। दूसरे तरह के जोड़ों में भी किसानों को अच्छा-खासा मुनाफा हुआ। यह साफ इशारा है कि छोटे किसानों के लिए यह तरीका आर्थिक रूप से टिकाऊ और भरोसेमंद साबित हो रहा है।

सरकार और वैज्ञानिकों की सक्रियता

17 जून 2026 को पटना में हुए एक किसान-वैज्ञानिक संवाद में केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने साफ निर्देश दिए कि छोटी जोत वाले किसानों के लिए हर इलाके की जरूरत के हिसाब से समेकित कृषि मॉडल तैयार किए जाएं। उन्होंने धान की सीधी बुवाई, सूखे को सहने वाली फसल की किस्में, बारिश के पानी को सहेजने की व्यवस्था और बूंद-बूंद सिंचाई जैसी तकनीकों को अपनाने पर भी जोर दिया। इसके साथ ही, कृषि अनुसंधान परिषद की टीम ने 'खेत बचाओ अभियान-2026' के तहत किसानों को मिट्टी की सेहत, संतुलित खाद के इस्तेमाल और मौसम की मार झेल सकने वाली खेती के तरीके सिखाए।

इन कोशिशों से किसानों को यह समझ आया कि मिट्टी की जांच, जैविक खाद, हरी खाद (जैसे धैंचा) और फसल के बचे हुए हिस्सों का सही इस्तेमाल कैसे मिट्टी को उपजाऊ बना सकता है और खर्च घटा सकता है।

गांव-गांव से उत्साह भरी खबरें

पूर्वी चंपारण के कई गांवों में हुई कार्यशालाओं में साढ़े पांच सौ से ज्यादा किसानों ने हिस्सा लिया और मिट्टी की सेहत सुधारने वाले वैज्ञानिक तरीकों को अपनाने में गहरी दिलचस्पी दिखाई। एक किसान ने बताया कि हरी खाद और फसल के बचे हुए हिस्सों ने उनके खेत की मिट्टी को मानो एक 'प्राकृतिक खाद बनाने की फैक्ट्री' में बदल दिया है, जिससे खाद पर होने वाला खर्च काफी कम हो गया।

कैमूर जिले में पच्चीस प्रशिक्षित किसानों ने सब्ज़ी, फल, मछली और बत्तख पालन को मिलाकर समेकित खेती शुरू की है। इससे सीमित ज़मीन में भी उनकी कमाई बढ़ रही है और खेती में जोखिम भी घटा है।

क्या यह तरीका हर जगह कारगर होगा?

इस मॉडल की सफलता के लिए कुछ जरूरी बातें ध्यान रखनी होंगी, हर इलाके की जरूरत के हिसाब से मॉडल तैयार करना, जैसे बिहार के जलजमाव वाले इलाकों के लिए मछलीपालन और बागवानी का मेल सबसे उपयुक्त पाया गया है। इसके साथ ही मिट्टी की सेहत बनाए रखना, वैज्ञानिक तकनीकों का सही इस्तेमाल करना, और किसानों-वैज्ञानिकों के बीच लगातार बातचीत बनी रहना भी उतना ही जरूरी है।

आगे की राह: पंचायत और किसान क्या कर सकते हैं

गांव के मुखिया और पंचायत स्तर पर इस मॉडल को अपनाने के लिए सबसे पहला कदम है। स्थानीय कृषि विभाग और कृषि अनुसंधान परिषद से संपर्क करना। किसान मिलकर समूह बना सकते हैं, ताकि प्रशिक्षण, खेत में प्रदर्शन और सामूहिक खरीद-बिक्री की व्यवस्था हो सके। इससे लागत घटेगी और मुनाफा बढ़ेगा। इसके अलावा पंचायतें मिट्टी जांच शिविर, हरी खाद बनाने के केंद्र और पानी सहेजने की संरचनाएं बनवाकर छोटे किसानों की मदद कर सकती हैं।

कहना होगा कि, सीमित जमीन के बावजूद छोटे किसान अब बड़े सपने देख सकते हैं। समेकित कृषि प्रणाली उन्हें कमाई के नए रास्ते दिखा रही है। मिट्टी की सेहत सुधारकर, वैज्ञानिक तरीके अपनाकर और अलग-अलग तरह की खेती को जोड़कर। अब जरूरत है कि पंचायत, किसान और वैज्ञानिक मिलकर इस मॉडल को धरातल पर उतारें और हर खेत को समृद्धि की राह पर ले जाएं।