
Roads and Landslides in Uttarakhand : बारिश में पहाड़ पर सड़कें क्यों हो जाती हैं क्षतिग्रस्त, PC- Chatgpt
उत्तराखंड में सड़क सिर्फ आने-जाने का साधन नहीं है। पहाड़ के किसी गांव तक सड़क पहुंचने का मतलब है अस्पताल तक जल्दी पहुंचना, बच्चों का स्कूल जाना आसान होना, खेती का सामान बाजार तक पहुंचना और गांव में रोजगार के नए रास्ते खुलना।
लेकिन यही सड़क जब पहाड़ की ढलान काटकर बनाई जाती है तो दूसरी समस्या भी पैदा होती है। पेड़ और वनस्पति हटती है, प्राकृतिक जल निकासी बदलती है और ढलान का संतुलन प्रभावित हो सकता है। मानसून में जब पानी कमजोर चट्टानों और मिट्टी में पहुंचता है तो भूस्खलन का खतरा बढ़ जाता है।
यही उत्तराखंड की सड़क की सबसे बड़ी कहानी है। सड़क पहाड़ को जोड़ती भी है और अगर निर्माण ठीक तरीके से न हो तो पहाड़ को कमजोर भी कर सकती है।
उत्तराखंड के हजारों गांव लंबे समय तक सड़क से दूर रहे। कई जगह लोगों को मुख्य सड़क तक पहुंचने के लिए कई किलोमीटर पैदल चलना पड़ता था।
बीमार व्यक्ति को डोली या कंधे पर लेकर अस्पताल ले जाना पड़ता था। किसान अपनी फसल पीठ या खच्चरों के जरिए बाजार तक पहुंचाते थे। बच्चों को स्कूल जाने में ज्यादा समय लगता था। इसीलिए पहाड़ के गांवों के लिए सड़क को सिर्फ विकास की परियोजना नहीं बल्कि बुनियादी जरूरत माना गया।
2000 में शुरू हुई प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना ने ग्रामीण बस्तियों को ऑल-वेदर सड़क संपर्क देने की दिशा में बड़ा काम किया। जुलाई 2026 तक उत्तराखंड में PMGSY के तहत 21,902 किलोमीटर सड़कें पूरी हो चुकी थीं और 1,860 बस्तियां इससे जुड़ चुकी थीं।
2026-27 में भी उत्तराखंड के लिए PMGSY के तहत 566 किलोमीटर सड़क लंबाई का लक्ष्य रखा गया है। यानी पहाड़ में सड़क निर्माण अभी रुका नहीं है।
सड़क पहुंचने के बाद किसी गांव में बदलाव सिर्फ यात्रा के समय में नहीं होता। किसान अपनी सब्जी और फल जल्दी बाजार तक पहुंचा सकता है। दूध और दूसरी खराब होने वाली चीजें बेचने की संभावना बढ़ती है। गांव से मरीज को अस्पताल ले जाना आसान होता है।
पर्यटन वाले इलाकों में इसका असर और बड़ा होता है। होमस्टे खुलते हैं। टैक्सी चलती हैं। छोटे होटल और दुकानें शुरू होती हैं। स्थानीय युवाओं के लिए रोजगार के अवसर पैदा होते हैं। यही वजह है कि उत्तराखंड में सड़क निर्माण को पलायन रोकने और स्थानीय अर्थव्यवस्था को मजबूत करने से भी जोड़ा जाता है। लेकिन, सवाल तब शुरू होता है जब सड़क बनाने के लिए पहाड़ को काटना पड़ता है।
पहाड़ की ढलान हजारों साल में अपने प्राकृतिक संतुलन में बनी होती है। जब सड़क बनाने के लिए उस ढलान को काटा जाता है तो उसका कोण बदल जाता है। कई जगह चट्टानों में दरारें होती हैं और उनके ऊपर मिट्टी या कमजोर मलबा जमा होता है।
अगर इस दौरान पर्याप्त रिटेनिंग वॉल, ड्रेनेज, बोल्टिंग, नेटिंग और दूसरे ढलान स्थिरीकरण उपाय नहीं किए जाएं तो बारिश का पानी ढलान के भीतर पहुंचकर उसे कमजोर कर सकता है।
उत्तराखंड की जलवायु कार्ययोजना भी सड़क निर्माण के दौरान पहाड़ काटने और खुदाई से भूगर्भीय संरचना में बदलाव, दरारों और कमजोर सतहों की सक्रियता तथा प्राकृतिक जल निकासी में बाधा जैसे जोखिमों की ओर इशारा करती है।
यानी हर भूस्खलन सड़क की वजह से नहीं होता, लेकिन गलत तरीके से की गई सड़क कटिंग किसी पहले से कमजोर ढलान को और अस्थिर कर सकती है।
यह समझना जरूरी है कि उत्तराखंड में भूस्खलन की समस्या सिर्फ सड़क निर्माण से पैदा नहीं हुई। हिमालय दुनिया की युवा पर्वत श्रृंखलाओं में शामिल है। यहां भूगर्भीय हलचल, कमजोर चट्टानें, तेज बारिश, बादल फटना और भूकंपीय गतिविधियां पहले से प्राकृतिक जोखिम पैदा करती हैं।
वाडिया इंस्टीट्यूट ऑफ हिमालयन जियोलॉजी के अध्ययन में मसूरी और आसपास के 84 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र का विश्लेषण किया गया। इसमें करीब 15 प्रतिशत क्षेत्र को उच्च भूस्खलन संवेदनशील पाया गया। अध्ययन में ढलान, चट्टानों की प्रकृति, जमीन के इस्तेमाल के साथ रोड-कट और ड्रेनेज को भी भूस्खलन के संभावित कारणों में शामिल किया गया। इसलिए पहाड़ में सड़क बनाना मैदानी इलाकों की तरह सीधा काम नहीं है।
मानसून में पहाड़ पर भारी बारिश होती है। पानी अगर सही तरीके से नालियों और कलवर्ट से बाहर निकल जाए तो खतरा कम किया जा सकता है। लेकिन अगर सड़क निर्माण के दौरान प्राकृतिक जल निकासी बाधित हो जाए या नालियां मलबे से बंद हो जाएं तो पानी ढलान पर जमा होने लगता है। इसके बाद मिट्टी भारी होती है और चट्टानों के बीच दबाव बढ़ सकता है।
2013 की आपदा में उत्तराखंड के कई हिस्सों में भारी बारिश और भूस्खलन ने सड़क नेटवर्क को बुरी तरह प्रभावित किया था। केंद्र के आपदा प्रबंधन दस्तावेज में दर्ज है कि NH-58 के कई हिस्से मलबे और बोल्डर से बंद हुए, सड़क के किनारे की ढलानें विफल हुईं और कुछ जगह कलवर्ट बंद होने से बाढ़ की स्थिति और बिगड़ी। यानी सड़क खुद सिर्फ रास्ता नहीं रहती, आपदा के समय वही राहत और बचाव की सबसे महत्वपूर्ण लाइफलाइन भी बन जाती है।
बिल्कुल नहीं। उत्तराखंड जैसे पहाड़ी राज्य में सड़क जरूरी है। सवाल सड़क बनाने या न बनाने का नहीं, बल्कि कैसे और कहां सड़क बनाई जाए इसका है। सरकार भी अब सड़क निर्माण में ढलान स्थिरीकरण और निगरानी पर ज्यादा जोर दे रही है।
चारधाम परियोजना में रिटेनिंग वॉल, ब्रेस्ट वॉल, नेटिंग, एंकरिंग और दूसरे उपायों के जरिए ढलानों को स्थिर करने का प्रावधान किया गया है। जैव-इंजीनियरिंग के जरिए वनस्पति दोबारा विकसित करने की कोशिश भी की जाती है।
2026 में सड़क परिवहन मंत्रालय ने चारधाम मार्ग के 100 किलोमीटर हिस्से में उपग्रह आधारित InSAR तकनीक से जमीन की हलचल की निगरानी शुरू करने की जानकारी दी। इसका उद्देश्य भूस्खलन से पहले कमजोर ढलानों की पहचान करना है। मंत्रालय ने यह भी बताया कि नई व्यवस्था में सड़क निर्माण से पहले ढलान काटने और स्थिरीकरण के लिए अलग चरण रखा जा रहा है और स्थिरता को कम से कम एक मानसून सीजन के बाद जांचने पर जोर है।
उत्तराखंड में आने वाले समय में सड़कें और बढ़ेंगी। पर्यटन बढ़ रहा है, गांवों को जोड़ना जरूरी है और सामरिक दृष्टि से भी सीमावर्ती इलाकों तक बेहतर संपर्क चाहिए। लेकिन इसके साथ तीन सवाल लगातार महत्वपूर्ण होंगे।
क्योंकि सड़क बनने के बाद उसका काम खत्म नहीं होता। सड़क की असली परीक्षा पहली भारी बारिश में होती है।
उत्तराखंड को सड़कें चाहिए। लेकिन ऐसी सड़कें नहीं जो कुछ साल बाद बार-बार भूस्खलन की वजह बनें। जरूरत है कम से कम पहाड़ काटने, वैज्ञानिक ढलान डिजाइन, मजबूत जल निकासी, स्थानीय भूगर्भीय अध्ययन, जैव-इंजीनियरिंग और नियमित निगरानी की।
क्योंकि पहाड़ में सड़क सिर्फ दो जगहों को नहीं जोड़ती। वह इंसान और प्रकृति के बीच भी एक नया रिश्ता बनाती है और अगर यह रिश्ता संतुलित नहीं रहा तो जिस सड़क को गांव तक विकास पहुंचाने का रास्ता माना गया था, वही बरसात में गांव को बाकी दुनिया से काटने वाली सबसे बड़ी वजह भी बन सकती है।
Updated on:
21 Aug 2026 01:49 pm
Published on:
21 Aug 2026 01:49 pm
