
FCRA Bill India: विदेशी फंडिंग को लेकर एक बार फिर Foreign Contribution (Regulation) Act (FCRA) चर्चा में है। सरकार का तर्क है कि विदेशी धन के उपयोग में पारदर्शिता, जवाबदेही और राष्ट्रीय हित की सुरक्षा सुनिश्चित करना केवल भारत की नीति नहीं है, बल्कि दुनिया के कई लोकतांत्रिक देशों में भी विदेशी प्रभाव और फंडिंग को नियंत्रित करने के लिए कानून बनाए गए हैं।
यही वजह है कि FCRA को लेकर चल रही बहस केवल भारत तक सीमित नहीं है, बल्कि यह सवाल भी उठ रहा है कि लोकतंत्रों में विदेशी धन और राष्ट्रीय संप्रभुता के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए। हाल ही में यह मुद्दा अंतरराष्ट्रीय सुर्खियों में भी आया, जब एक अमेरिकी सांसद की टिप्पणियों ने प्रस्तावित संशोधन को वैश्विक बहस का हिस्सा बना दिया।
FCRA यानी Foreign Contribution (Regulation) Act यानी वह कानून, जो तय करता है कि भारत में कौन-सी संस्था, ट्रस्ट, NGO, एसोसिएशन या अन्य पात्र इकाई विदेशी स्रोतों से धन या अन्य योगदान प्राप्त कर सकती है और उसका उपयोग किन उद्देश्यों के लिए होगा। इसका प्रशासन गृह मंत्रालय (MHA) करता है।
Foreign Contribution (Regulation) Amendment Bill, 2026 को 25 मार्च 2026 को लोकसभा में पेश किया गया था। हाल के प्रस्तावित संशोधनों और नियमों का उद्देश्य विदेशी फंडिंग की पारदर्शिता, अंतिम दाता (Ultimate Donor) की पहचान, उपयोग के उद्देश्य और संस्थाओं के नियंत्रण पर अधिक स्पष्ट निगरानी स्थापित करना है। इसमें एक 'डेजिग्नेटेड अथॉरिटी' बनाने का प्रस्ताव भी शामिल है, जो FCRA पंजीकरण रद्द, सरेंडर या समाप्त होने की स्थिति में विदेशी धन से बनी परिसंपत्तियों को अपने कब्जे में लेकर उनका प्रबंधन और निपटान करेगी।
सिविल सोसाइटी संगठनों, धार्मिक समुदायों और राजनीतिक दलों के भारी विरोध के बाद संसद ने बिल पर आगे की चर्चा फिलहाल टाल दी है, हालांकि बिल अभी भी लंबित है और किसी भावी सत्र में वापस लाया जा सकता है। वहीं दूसरी ओर, FCRA नियम, 2026 (Rules) पहले ही 22 जून 2026 को अधिसूचित हो चुके हैं और अभी लागू हैं। यानी बिल के पास होने से पहले ही नए नियम अमल में आ चुके हैं।
दरअसल सरकार का कहना है कि अनियंत्रित विदेशी धन लोकतांत्रिक संस्थाओं, सार्वजनिक नीति और राष्ट्रीय हित को प्रभावित कर सकता है। इसलिए नियमन का उद्देश्य विदेशी चंदे पर रोक लगाना नहीं, बल्कि उसके उपयोग को पारदर्शी और जवाबदेह बनाना है। सरकार अक्सर इसके लिए फाइनेंशियल एक्शन टास्क फोर्स (FATF) के मानकों का हवाला देती है। हालांकि आलोचकों का कहना है कि FATF के मानक वास्तव में इस तरह के व्यापक और सख्त उपायों का समर्थन नहीं करते। FATF ने खुद एक अधिक लक्षित, जोखिम-आधारित दृष्टिकोण अपनाने की सिफारिश की है।
यदि संशोधन लागू होते हैं तो असर मुख्य रूप FCRA पंजीकृत NGOs, ट्रस्ट और सामाजिक संस्थाओं, धार्मिक एवं शैक्षणिक संस्थान जो विदेशी योगदान प्राप्त करते हैं, अंतरराष्ट्रीय दानदाता भी नजर में रहेंगे। इन संस्थाओं को दस्तावेजी अनुपालन, दाता संबंधी जानकारी और धन के उपयोग के रिकॉर्ड पर अधिक ध्यान देना होगा। गौरतलब है कि 2010 से अब तक करीब 22,000 FCRA पंजीकरण रद्द हो चुके हैं, जबकि अप्रैल 2026 तक करीब 15,000 पंजीकरण समाप्त होकर रिन्यू नहीं हो पाए। नए प्रावधान इन संस्थाओं की पुरानी परिसंपत्तियों पर भी असर डाल सकते हैं।
समर्थकों का कहना है कि इससे पारदर्शिता और जवाबदेही बढ़ेगी। वहीं आलोचकों का मानना है कि अधिक नियंत्रण से नागरिक समाज संगठनों के कामकाज पर असर पड़ सकता है, खासकर उन संस्थाओं पर जो मानवाधिकार, अल्पसंख्यक कल्याण और जलवायु कार्रवाई जैसे क्षेत्रों में काम करती हैं। यही कारण है कि प्रस्तावित संशोधन सार्वजनिक और राजनीतिक बहस का विषय बने हुए हैं।
दरअसल मामला केवल विदेशी धन का नहीं है, देखना यह भी होगा कि लोकतांत्रिक देश विदेशी धन को स्वीकार करते हुए राष्ट्रीय सुरक्षा, पारदर्शिता और नागरिक स्वतंत्रता के बीच संतुलन कैसे बनाते हैं। भारत का FCRA अब इसी वैश्विक बहस का हिस्सा बन चुका है।