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गलत पोप का साथ देना पड़ गया भारी? रोम की एक सियासी चाल से बदली इंग्लैंड की किस्मत

King Harold: नई रिसर्च में दावा किया गया है कि 1066 में राजा हेरोल्ड की हार के पीछे रोम का पोप विवाद भी अहम हो सकता है। वेटिकन में मिले पुराने पत्र के अंश इंग्लैंड, पोप अलेक्जेंडर द्वितीय और विलियम के बीच राजनीतिक संबंधों की नई कहानी बताते हैं।
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Aug 11, 2026
King Harold and the Pope Dispute News
राजा हेरोल्ड और पोप के रिश्तों व उनके निर्णयों के प्रभाव का विश्लेषण। ( फोटो: AI)

इंग्लैंड की सन 1066 में सत्ता हाथ से जाने के पीछे सिर्फ हेस्टिंग्स की लड़ाई और राजगद्दी का विवाद ही जिम्मेदार नहीं था। ईस्ट एंग्लिया विश्वविद्यालय (UEA) के इतिहासकार प्रोफेसर टॉम लाइसेंस की रिसर्च के मुताबिक, राजा हेरोल्ड की पोप से जुड़ी एक राजनीतिक पसंद ने भी उनकी मुश्किलें बढ़ाई हो सकती हैं। शोध में वेटिकन अभिलेखागार में सुरक्षित एक पुराने पोप-पत्र के बचे हुए अंशों का अध्ययन किया गया है। इससे संकेत मिलता है कि रोम में चल रही पोप पद की लड़ाई ने विलियम द कॉन्करर के इंग्लैंड पर हमले को समर्थन दिलाने में भूमिका निभाई हो सकती है। यानि 1066 की कहानी सिर्फ इंग्लैंड के सिंहासन की लड़ाई नहीं थी। इसके तार रोम की सत्ता की राजनीति से भी जुड़े हो सकते हैं।

जब रोम में दो पोप आमने-सामने थे

रिसर्च के अनुसार सन 1060 के दशक में पश्चिमी ईसाई जगत एक बड़े धार्मिक और राजनीतिक विवाद में फंसा हुआ था। वर्ष 1061 में दो अलग-अलग गुटों ने दो पोप चुन लिए थे। एक तरफ अलेक्जेंडर द्वितीय थे, जबकि दूसरी ओर परमा के बिशप कैडलस थे, जिन्हें बाद में होनोरियस द्वितीय के नाम से जाना गया।

दोनों पक्ष रोम पर अपना अधिकार जमाने के लिए संघर्ष कर रहे थे

रिसर्च के अनुसार दोनों पक्ष रोम पर अपना अधिकार जमाने के लिए संघर्ष कर रहे थे। इस विवाद में यूरोप की बड़ी राजनीतिक ताकतें भी शामिल थीं। होनोरियस को पवित्र रोमन साम्राज्य का मजबूत समर्थन हासिल था और उसके पक्ष को उत्तरी यूरोप के कुछ हिस्सों से भी समर्थन मिल रहा था। यही विवाद अब 1066 की घटनाओं को समझने की एक नई कड़ी के रूप में सामने आया है।

हेरोल्ड ने किसका साथ दिया था?

प्रोफेसर टॉम लाइसेंस के मुताबिक, पोप अलेक्जेंडर द्वितीय के एक पुराने पत्र में ऐसे शब्द मिलते हैं, जिनका संबंध उस समय चल रहे पोप विवाद से जोड़ा जा सकता है। पत्र के मूल संग्रह का बड़ा हिस्सा अब उपलब्ध नहीं है। हालांकि, उसके कुछ हिस्से मध्यकालीन कैनन कानून से जुड़े संग्रहों में सुरक्षित रह गए। वेटिकन में मौजूद ऐसे ही दो अंशों ने शोधकर्ताओं का ध्यान खींचा।पत्र में इंग्लैंड के बारे में कहा गया था कि वह कभी सेंट पीटर के संरक्षण में था, लेकिन बाद में कुछ लोगों ने उसे "सत्य के मार्ग" से भटका दिया।

पोप विवाद की पृष्ठभूमि में देखने पर इनका मतलब क्या है

पहले इतिहासकार इन शब्दों को सामान्य धार्मिक टिप्पणी मानते रहे। लेकिन प्रोफेसर लाइसेंस का कहना है कि इन्हें उस दौर के पोप विवाद की पृष्ठभूमि में देखने पर इनका मतलब कहीं ज्यादा राजनीतिक नजर आता है।

किंग हेरोल्ड और रोम के पोप के बीच विवाद के बारे में एक रिसर्च से नया खुलसा हुआ है । (विजुअल: पत्रिका)

हेरोल्ड की नीति ने बढ़ाई मुश्किल?

रिसर्च के मुताबिक, संभव है कि राजा हेरोल्ड ने पोप अलेक्जेंडर के विरोधी गुट के साथ ऐसा संबंध बनाया हो, जिससे रोम में उनकी स्थिति कमजोर हो गई। यहां एक महत्वपूर्ण सवाल उठता है-अगर हेरोल्ड ने पोप अलेक्जेंडर के विरोधियों का समर्थन किया था, तो क्या रोम ने भी उनके खिलाफ रुख अपना लिया?

हेरोल्ड को हटाना रोम के लिए एक बड़े यूरोपीय सत्ता संघर्ष का हिस्सा हो सकता था

प्रोफेसर लाइसेंस का मानना है कि ऐसा संभव है। उनके अनुसार, अलेक्जेंडर के लिए मामला सिर्फ हेरोल्ड के सिंहासन के दावे या कथित शपथ तोड़ने तक सीमित नहीं रहा होगा। अगर इंग्लैंड ने पोप के विरोधी गुट के साथ राजनीतिक नजदीकी बढ़ाई थी, तो हेरोल्ड को हटाना रोम की नजर में एक बड़े यूरोपीय सत्ता संघर्ष का हिस्सा बन सकता था।

विलियम को पोप का समर्थन क्यों मिला?

नॉर्मन विजय को लेकर इतिहास में एक बड़ा सवाल लंबे समय से मौजूद है—पोप ने इंग्लैंड के पहले से ताजपोशी किए जा चुके राजा हेरोल्ड के खिलाफ विलियम का समर्थन क्यों किया? परंपरागत तौर पर इसकी वजह हेरोल्ड के सिंहासन पर दावे और विलियम के साथ कथित शपथ विवाद को माना जाता है।

नई रिसर्च इस कहानी में एक और पहलू

प्रोफेसर लाइसेंस के मुताबिक, पोप अलेक्जेंडर के पास विलियम का समर्थन करने के अपने राजनीतिक कारण भी हो सकते थे। अगर हेरोल्ड वास्तव में पोप के विरोधी गुट के करीब चले गए थे, तो विलियम का हमला रोम की नजर में सिर्फ सत्ता हथियाने की कोशिश नहीं रहा होगा। इसे यूरोप में चर्च की सत्ता और राजनीतिक प्रभाव के लिए चल रहे संघर्ष का हिस्सा माना जा सकता था।

1066 का फैसला सिर्फ हेस्टिंग्स में नहीं हुआ?

रिसर्च के अनुसार 1066 में विलियम ने इंग्लैंड पर हमला किया और 14 अक्टूबर को हेस्टिंग्स की लड़ाई में हेरोल्ड की सेना से भिड़ंत हुई। लड़ाई में हेरोल्ड की हार हुई और इसके बाद विलियम ने इंग्लैंड की सत्ता अपने हाथ में ले ली। प्रोफेसर लाइसेंस के अनुसार, इस कहानी की शुरुआत हेस्टिंग्स से काफी पहले हो चुकी थी। उनका तर्क है कि 1066 का फैसला केवल युद्ध के मैदान में नहीं हुआ था। इसके पीछे रोम में लिए गए राजनीतिक और धार्मिक फैसलों का भी असर हो सकता है। यानि हेस्टिंग्स में तलवारें जरूर चलीं, लेकिन उस लड़ाई की राजनीतिक जमीन शायद यूरोप के दूसरे हिस्सों में पहले ही तैयार हो चुकी थी।

वेटिकन में छिपे पत्र ने खोली नई कहानी

इस रिसर्च की खास बात वह पुराना पोप-पत्र है, जिसका पूरा स्वरूप आज उपलब्ध नहीं है। पोप के पत्रों का मूल संग्रह समय के साथ खो गया। हालांकि, उनके कुछ हिस्से अलग-अलग धार्मिक और कानूनी दस्तावेजों में कॉपी होकर बच गए। प्रोफेसर लाइसेंस ने इन्हीं बचे हुए अंशों को नए नजरिए से देखा है। उनके मुताबिक, पत्र में इस्तेमाल भाषा उस समय पोप अलेक्जेंडर के विरोधियों और उनके समर्थकों के खिलाफ इस्तेमाल किए जाने वाले राजनीतिक-धार्मिक शब्दों से मिलती है। यही समानता उन्हें इस निष्कर्ष तक ले जाती है कि पत्र में इंग्लैंड के बारे में की गई टिप्पणी महज धार्मिक आलोचना नहीं, बल्कि उस समय की राजनीतिक खींचतान का संकेत हो सकती है।

नॉर्मन विजय का यूरोपीय कनेक्शन

रिसर्च कहती है कि अब तक 1066 की नॉर्मन विजय को मुख्य रूप से इंग्लैंड के भीतर हुए सत्ता संघर्ष के रूप में देखा जाता रहा है। एडवर्ड द कन्फेसर की मौत के बाद सिंहासन को लेकर हेरोल्ड, विलियम और दूसरे दावेदारों के बीच संघर्ष हुआ और आखिरकार विलियम विजयी हुए।

नई रिसर्च इस कहानी का दायरा बड़ा करती है

इसके मुताबिक, उस समय इंग्लैंड की राजनीति यूरोप की धार्मिक और राजनीतिक ताकतों से अलग नहीं थी। रोम का पोप पद, पवित्र रोमन साम्राज्य और यूरोप के अलग-अलग सत्ता केंद्र आपस में जुड़े हुए थे। ऐसे में इंग्लैंड का किसी एक पोप गुट के साथ खड़ा होना भी अंतरराष्ट्रीय राजनीति में महत्वपूर्ण कदम हो सकता था।

इतिहास की पुरानी पहेली का नया जवाब

इस शोध से एक पुराना सवाल फिर चर्चा में आ गया है-क्या पोप ने विलियम का समर्थन सिर्फ हेरोल्ड की शपथ और उत्तराधिकार विवाद की वजह से किया था? प्रोफेसर लाइसेंस की व्याख्या कहती है कि तस्वीर इससे कहीं बड़ी हो सकती है।

संभव है कि हेरोल्ड की पोप संबंधी नीति ने रोम में उनकी राजनीतिक स्थिति कमजोर कर दी हो और इससे विलियम को फायदा मिला हो। पोप के समर्थन ने नॉर्मन आक्रमण को उस दौर की धार्मिक राजनीति में एक तरह की वैधता देने में मदद की हो सकती है। हालांकि, यह 1066 की घटनाओं की एक नई ऐतिहासिक व्याख्या है, न कि ऐसा निष्कर्ष जिससे यह साबित हो जाए कि हेरोल्ड की हार का एकमात्र कारण पोप विवाद था।

इतिहासकारों ने भी बताया अहम पहलू

कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय के धर्मशास्त्र के रेगियस प्रोफेसर डेविड फर्ग्यूसन ने कहा कि यह शोध नॉर्मन आक्रमण को यूरोप के व्यापक राजनीतिक संदर्भ में समझने का नया नजरिया देता है। वहीं कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय के प्रारंभिक मध्यकालीन अंग्रेजी इतिहास के प्रोफेसर रोरी नाइस्मिथ के अनुसार, नॉर्मन विजय को सिर्फ अंग्रेजों और नॉर्मनों के बीच संघर्ष मानना पर्याप्त नहीं है। उस समय यूरोप में चल रहे घटनाक्रमों का भी इस पर असर था।

बेयू टेपेस्ट्री के बीच फिर चर्चा में 1066

यह रिसर्च ऐसे समय सामने आई है, जब ब्रिटिश म्यूजियम नॉर्मन विजय से जुड़ी प्रसिद्ध बेयू टेपेस्ट्री को प्रदर्शित करने वाली बड़ी प्रदर्शनी की तैयारी कर रहा है। बेयू टेपेस्ट्री 1066 की घटनाओं को समझने के लिए दुनिया की सबसे चर्चित ऐतिहासिक कलाकृतियों में शामिल है। ऐसे में पोप के पुराने पत्र से जुड़ी यह नई व्याख्या नॉर्मन विजय की कहानी को एक अलग कोण से देखने का मौका देती है।

कहानी का एक महत्वपूर्ण हिस्सा रोम में भी लिखा जा रहा था

बहरहाल 1066 में हेरोल्ड की हार को आमतौर पर हेस्टिंग्स की लड़ाई, सिंहासन के विवाद और विलियम की सैन्य ताकत से जोड़ा जाता है। लेकिन नई रिसर्च बताती है कि कहानी का एक महत्वपूर्ण हिस्सा रोम में भी लिखा जा रहा था।

रोम में गलत पोप गुट का साथ देने का नतीजा

अगर प्रोफेसर टॉम लाइसेंस की व्याख्या सही साबित होती है, तो हेरोल्ड की सबसे बड़ी राजनीतिक भूलों में से एक यह हो सकती है कि उन्होंने रोम में गलत पोप गुट का साथ दिया। इसका असर इतना बड़ा हुआ कि इंग्लैंड की सत्ता की लड़ाई यूरोप के धार्मिक और राजनीतिक संघर्ष से जुड़ गई और आखिरकार 1066 में इंग्लैंड का इतिहास ही बदल गया।

Updated on:
11 Aug 2026 09:11 pm
Published on:
11 Aug 2026 08:46 pm