
Hospital Waiting Time in India: भारत में स्वास्थ्य सेवाओं का दायरा तेजी से बढ़ रहा है। आयुष्मान भारत जैसी योजनाओं और अस्पतालों के विस्तार से पहले की तुलना में अब लोगों की अस्पतालों तक पहुंच आसान हो गई है। लेकिन इसके साथ ही एक नई चुनौती भी स्वास्थ्य मंत्रालय के सामने आ रही है। और वो है मरीजों को इलाज के लिए लंबा इंतजार कर रहा है। ओपीडी में एक लाइन में 100 या उससे ज्यादा मरीज होते हैं। अपनी बारी का घंटों इंतजार करते हैं। जब बारी आती भी है तो उन्हें सोनोग्राफी, सर्जरी जैसी तुरंत जरूरतों के लिए दो से तीन महीने कभी कभी 5-6 महीनों की डेट मिल जाती है। इतने लंबे इंतजार के अनुभव मरीजों की जान पर बन सकते हैं। सवाल उठता है कि आखिर इंतजार क्यों करना पड़ रहा है? मामले में हेल्थ एक्सपर्ट कोई एक कारण नहीं मानते हैं कि मरीजों की संख्या लगातार बढ़ रही है, बल्कि उनका कहना है कि अस्पतालों में डॉक्टर्स, एक्सपर्ट्स, अस्पतालों के साथ ही बेड की उपलब्धता में क्षेत्रीय असमानता भी इसका बड़ा कारण है।
राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय (NSO) के हालिया सर्वे में सामने आया कि पहले की तुलना में कहीं अधिक भारतीय अब इलाज के लिए स्वास्थ्य संस्थानों तक पहुंच रहे हैं। सरकारी अस्पतालों में बड़ी संख्या में मरीजों को कम या बिना खर्च के उपचार मिल रहा है, जिससे वहां मरीजों का दबाव और बढ़ा है।
दूसरी ओर निजी अस्पतालों में भी मरीजों की संख्या बढ़ रही है। उद्योग विशेषज्ञों का कहना है कि अब अस्पताल केवल महानगरों तक सीमित नहीं रहना चाहते और छोटे शहरों में भी विस्तार कर रहे हैं, लेकिन प्रशिक्षित डॉक्टरों और विशेषज्ञों की कमी इस विस्तार की गति को प्रभावित कर रही है।
कार्डियोलॉजी, ऑन्कोलॉजी (कैंसर), न्यूरोलॉजी, ऑर्थोपेडिक्स, नेफ्रोलॉजी और गैस्ट्रोएंटरोलॉजी जैसे सुपर स्पेशियलिटी विभागों में मरीजों की संख्या लगातार बढ़ रही है। बड़े सरकारी अस्पतालों में इन विभागों की ओपीडी में रोज हजारों मरीज पहुंचते हैं, जिससे अपॉइंटमेंट और जांच के लिए प्रतीक्षा समय बढ़ जाता है।
एक्सपर्ट्स का कहना है कि शुरुआती जांच में देरी कई बार बीमारी को गंभीर बना सकती है। इसलिए प्राथमिक स्तर पर बेहतर स्क्रीनिंग और जिला अस्पतालों की क्षमता बढ़ाना जरूरी है।
भारत की लगभग दो-तिहाई आबादी ग्रामीण क्षेत्रों में रहती है, लेकिन विशेषज्ञ डॉक्टरों की उपलब्धता वहां बेहद सीमित है। एक अध्ययन के अनुसार सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों (CHC) में हजारों विशेषज्ञ चिकित्सकों के पद खाली हैं, जिससे मरीजों को जिला या बड़े शहरों के अस्पतालों का रुख करना पड़ता है। यही कारण है कि बड़े सरकारी अस्पतालों पर मरीजों का भार लगातार बढ़ता जा रहा है।
दरअसल स्वास्थ्य विशेषज्ञ मानते हैं कि समस्या बहुआयामी है। गैर-संचारी रोग (डायबिटीज, हृदय रोग, कैंसर) तेजी से बढ़ रहे हैं। बुजुर्ग आबादी बढ़ने से इलाज की मांग बढ़ी है। आयुष्मान भारत जैसी योजनाओं से अधिक लोग अस्पतालों तक पहुंच रहे हैं। कई मरीज छोटे अस्पतालों की बजाय सीधे बड़े मेडिकल कॉलेजों और AIIMS जैसे संस्थानों में जाना पसंद करते हैं। इन सभी कारणों से बड़े अस्पतालों में भीड़ बढ़ रही है।
विशेषज्ञों का मानना है कि केवल नए अस्पताल बनाना पर्याप्त नहीं होगा। जरूरत है कि जिला अस्पतालों और मेडिकल कॉलेजों को सुपर स्पेशियलिटी सेवाओं से मजबूत किया जाए। टेलीमेडिसिन, ई-ओपीडी, डिजिटल अपॉइंटमेंट और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस आधारित ट्रायेज सिस्टम से भी मरीजों की कतार कम की जा सकती है। कई निजी अस्पताल अब AI आधारित तकनीकों का उपयोग मरीजों के बेहतर प्रबंधन के लिए शुरू कर रहे हैं।
एक्सपर्ट्स का कहना है पिछले कुछ वर्षों में स्वास्थ्य ढांचे का विस्तार हुआ है और अधिक लोग इलाज तक पहुंच पा रहे हैं। सरकारी अस्पतालों में इलाज का आर्थिक बोझ भी कई परिवारों के लिए कम हुआ है। लेकिन यदि डॉक्टरों, नर्सों, विशेषज्ञों और अस्पतालों की क्षमता समान गति से नहीं बढ़ी, तो प्रतीक्षा अवधि भविष्य में और बड़ी चुनौती बन सकती है।
भारत की स्वास्थ्य व्यवस्था एक विरोधाभास के दौर में है। एक ओर इलाज तक पहुंच पहले से बेहतर हुई है, दूसरी ओर उसी बढ़ती पहुंच ने अस्पतालों पर अभूतपूर्व दबाव भी पैदा किया है। आने वाले वर्षों में असली चुनौती केवल अधिक अस्पताल बनाना नहीं, बल्कि मरीज को समय पर इलाज उपलब्ध कराना होगी। यदि प्राथमिक स्वास्थ्य सेवाएं, विशेषज्ञ डॉक्टरों की उपलब्धता और डिजिटल स्वास्थ्य प्रणाली को साथ लेकर आगे बढ़ा गया, तो लंबी प्रतीक्षा की समस्या काफी हद तक कम की जा सकती है। वरना इलाज से पहले का इंतजार ही स्वास्थ्य व्यवस्था की सबसे बड़ी परीक्षा बन सकता है।