
कुत्ते को केवल इंसान का वफादार साथी माना जाता है, लेकिन विज्ञान की नई पड़ताल बताती है कि हमारा यह रिश्ता सिर्फ सुरक्षा या सहचर्य तक सीमित नहीं है। पिछले 15,000 वर्षों में मनुष्यों और कुत्तों ने एक-दूसरे के शरीर, व्यवहार और जीवनशैली को गहराई से प्रभावित किया है। मशहूर प्रकाशन टेलर एंड फ्रांसिस ग्रुप (Taylor & Francis Group) की ओर से प्रकाशित नई पुस्तक "फर्स्ट डॉग्स: हंटर-गैदरर्स एंड देयर कैनिन कंपैनियंस फ्रॉम प्रीहिस्ट्री टू द प्रेजेंट" में इस अनोखे रिश्ते का विस्तार से विश्लेषण किया गया है। अध्ययन के मेन रिसर्चर और ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी के पुरातत्वविद प्रोफेसर पीटर मिशेल (Prof. Peter Mitchell) के अनुसार, इंसानों ने भेड़ियों पर सीधे जबरन कंट्रोल नहीं किया था। इसके बजाय, शुरुआती हंटर-गैदरर्स और भेड़िये लगभग एक-दूसरे के बराबर के भागीदार बन कर साथ आए थे।
प्रोफेसर पीटर मिशेल का मानना है कि इंसान की ओर से पौधों को उगाने या अन्य जानवरों मसलन गाय व बकरी को पालतू बनाने से हजारों साल पहले कुत्ते इंसानी जीवन का अभिन्न हिस्सा बन चुके थे।
समान भागीदारी: शुरुआती दौर में भेड़िये और इंसान दोनों ही शिकारी थे। दोनों एक-दूसरे की क्षमताओं इंसानों की सोच-समझ और भेड़ियों की सूंघने व दौड़ने की पॉवर का लाभ उठाते हुए पास आए।
साझा अनुकूलन: जैसे-जैसे इंसानी आबादी दुनिया के अलग-अलग कोनों में फैली, कुत्ते भी उनके साथ चले गए और वहां की जलवायु व जीवनशैली के अनुसार खुद को ढालते चले गए।
दुनिया भर के अलग-अलग माहौल में इंसानों के साथ रहते हुए कुत्तों के शारीरिक बनावट और डीएनए में चमत्कारिक बदलाव आए:
तिब्बत के अत्यधिक ऊंचाई वाले इलाकों में इंसानों के साथ-साथ कुत्तों ने भी पतली हवा (हाइपोक्सिया) में सांस लेने और जीवित रहने की आनुवंशिक क्षमता विकसित की। शोधकर्ताओं ने पाया है कि तिब्बती कुत्तों में वही जीन मौजूद हैं जो तिब्बती इंसानों को कम ऑक्सीजन वाले वातावरण में स्वस्थ रखते हैं।
बर्फीले आर्कटिक इलाकों में कुत्तों के बिना इंसानों का बचना नामुमकिन था।
पुरातत्वविदों को मिली प्राचीन कुत्तों की हड्डियों के अध्ययन से पता चलता है कि उनकी रीढ़ की हड्डी और अंगों में भारी भार खींचने के अनुसार बदलाव आ गए थे।
आइसोटोप अध्ययनों से यह भी साबित हुआ है कि तटीय इलाकों में रहने वाले इंसान और कुत्ते एक जैसा समुद्री भोजन (मछलियां व सी-फूड) खाते थे।
दक्षिण अमेरिका और दक्षिण-पूर्व एशिया के घने जंगलों में रहने वाले कुत्ते आर्कटिक के भारी स्लेज कुत्तों से बिल्कुल अलग थे। वे आकार में छोटे, दुबले और बेहद फुर्तीले थे ताकि घने पेड़ों और झाड़ियों के बीच से आसानी से शिकार कर सकें। स्वदेशी लोगों ने शिकार की क्षमता बढ़ाने के लिए पिल्लों का चयन किया और कभी-कभी जंगली कैनाइड्स के साथ उनका क्रॉस-ब्रीडिंग कराया।
कुत्तों ने केवल शिकार या रखवाली ही नहीं की, बल्कि सांस्कृतिक और आर्थिक भूमिकाएं भी निभाईं:
कपड़ों के लिए पालन (ऊनी कुत्ते): उत्तर अमेरिका के उत्तर-पश्चिमी तट पर स्वदेशी समुदायों ने खास तरह के लंबे और ऊनी बालों वाले छोटे कुत्तों की नस्ल विकसित की थी। इनके बालों को काट कर धार्मिक अनुष्ठानों के लिए कंबल बनाए जाते थे।
धार्मिक और आध्यात्मिक महत्व: कई प्राचीन संस्कृतियों में कुत्तों को धार्मिक अनुष्ठानों, परलोक यात्रा के रक्षक और लोककथाओं के महत्वपूर्ण पात्र के रूप में देखा गया। ध्यान रहे कि 14,000 साल पुरानी कब्रों में मनुष्यों के साथ उनके प्यारे कुत्तों को दफन किए जाने के साक्ष्य मिलते हैं।
पर्यावरण के अलावा, बीमारियों और परजीवियों ने भी यह तय किया कि कुत्ते पृथ्वी के किन हिस्सों में फैल सकते हैं।
अफ्रीका के कुछ उष्णकटिबंधीय इलाकों में ट्रिपैनोसोमियासिस (नींद की बीमारी) और एर्लिकियोसिस जैसी मक्खियों व कीड़ों से फैलने वाली बीमारियों के कारण कुत्ते काफी देर से पहुंचे या वहां उनकी आबादी सीमित रही। इससे वैज्ञानिकों को यह समझने में मदद मिली है कि ठंडे इलाकों के मूल निवासी रहे कैनाइड्स कैसे गर्म और रोगग्रस्त इलाकों में संघर्ष करते रहे।
आनुवंशिक शोध बताते हैं कि उपनिवेशवाद (Colonialism) के दौर में जब यूरोपीय नस्लों के कुत्ते दुनिया भर में फैले, तो कई प्राचीन स्थानीय नस्लें धीरे-धीरे विलुप्त हो गईं या मिक्स हो गईं। हालांकि, आज भी कुछ आधुनिक कुत्तों के डीएनए में उन 15,000 साल पुरानी वंशावलियों के आनुवंशिक निशान सुरक्षित हैं।
'जंगली भेड़ियों के कुत्ते में बदलने का प्रॉसेस किसी एक दिन या घटना का परिणाम नहीं थी। यह एक लंबी, धीमी और दोतरफा विकासवादी यात्रा थी। हाल की शताब्दियों में इंसानों ने कुत्तों की नस्लों को अपने हिसाब से ढालने पर अधिक कंट्रोल कर लिया है, लेकिन यह रिश्ता हमेशा पारस्परिक और जटिल रहा है।'
—प्रोफेसर पीटर मिशेल।