
India 9 anchor species: जंगल बचाने का नया फॉर्मूला! (AI Creative)
India 9 anchor species: जरा सोचिए, अगर सिर्फ एक जानवर का घर बचाकर आप 700 से ज्यादा दूसरी प्रजातियों को भी बचा सकें, तो क्या यह जंगल बचाने का सबसे स्मार्ट तरीका नहीं होगा? अब तक भारत में वन्यजीव संरक्षण की कहानी ज्यादातर बाघ, हाथी और गैंडे जैसे करिश्माई जानवरों के इर्द-गिर्द घूमती रही है। लेकिन एक नई वैज्ञानिक रिसर्च ने इस पूरी सोच को एक अलग एंगल से देखने का रास्ता दिखाया है।
नेशनल यूनिवर्सिटी ऑफ सिंगापुर (NUS) के आकाश लांबा और उनकी टीम, जिसमें NUS, नानयांग टेक्नोलॉजिकल यूनिवर्सिटी और यूनिवर्सिटी ऑफ क्वींसलैंड के शोधकर्ता शामिल थे, ने भारत की 160 कानूनन संरक्षित और संकटग्रस्त वर्टिब्रेट स्पीशीज को खंगाला। इसमें उन्होंने 2,187 टेरेस्ट्रियल स्पीशीज के हाई-रिजॉल्यूशन हैबिटेट मैप्स का इस्तेमाल किया और यह देखा कि किस जानवर का घर बचाने से सबसे ज्यादा दूसरे जीवों और कार्बन स्टॉक्स को फायदा मिल सकता है। नतीजे में उन्हें मिले 9 ऐसे 'एंकर स्पीशीज' यानी वो जानवर जिनका घर बचाना पूरे इकोसिस्टम को बचाने के बराबर है।
सांभर, तेंदुआ, ढोल (जंगली कुत्ता), बाघ, किंग कोबरा, गौर, भारतीय पैंगोलिन, स्लॉथ भालू और ग्रेट हॉर्नबिल। दिलचस्प बात यह है कि इस लिस्ट में सिर्फ मशहूर या बड़े जानवर नहीं, बल्कि किंग कोबरा और पैंगोलिन जैसे कम चर्चित जीव भी शामिल हैं। क्योंकि इनका हैबिटेट भी दूसरी कई स्पीशीज के साथ भारी ओवरलैप करता है।
स्टडी के मुताबिक, इन 9 में से किसी भी एक जानवर के हैबिटेट को एरिया-बेस्ड कंजर्वेशन से बचाने पर 729 टेरेस्ट्रियल वर्टिब्रेट स्पीशीज और करीब 1.1 गीगाटन (GtC) अबव-ग्राउंड कार्बन को सुरक्षा मिल सकती है। यानी भारत की कुल वर्टिब्रेट डायवर्सिटी और कार्बन स्टॉक का एक तिहाई से भी ज्यादा हिस्सा, वो भी सिर्फ एक जानवर पर फोकस करके।
ध्यान दें कि GtC यानी गीगाटन कार्बन, CO₂ के बराबर नहीं होता, दोनों का मास अलग है, इसलिए इसे 1.1 अरब टन CO₂ लिखना वैज्ञानिक रूप से गलत होगा
इन 9 में से भी सांभर, तेंदुआ और ढोल सबसे दमदार निकले। इनमें से किसी एक का हैबिटेट बचाने पर आधे से ज्यादा वर्टिब्रेट डायवर्सिटी और 1.8 GtC कार्बन तक सुरक्षित हो सकता है। सांभर का हैबिटेट भारत के सबसे बड़े कार्बन स्टॉक्स से ओवरलैप करता पाया गया, जबकि तेंदुआ अलग-अलग तरह के लैंडस्केप्स में फैला है। इसके हैबिटेट में 1,500 से ज्यादा को-ऑक्यूरिंग स्पीशीज मिलती हैं। यानी तेंदुए को बचाना सिर्फ तेंदुए की गिनती बढ़ाना नहीं, बल्कि एक पूरा इकोसिस्टम बचाना है।
यह कोई नई कल्पना नहीं है। प्रोजेक्ट टाइगर इसका जीता-जागता उदाहरण है, बाघ के संरक्षण के लिए बनाए गए प्रोटेक्टेड लैंडस्केप्स ने रास्ते में कई और स्पीशीज और बड़े फॉरेस्ट कार्बन स्टॉक्स को भी बचा लिया। सवाल बस यह है कि यह सोच सिर्फ बाघ तक सीमित क्यों रहे, जब दूसरी प्रजातियों में भी वही क्षमता मौजूद है?
यह रिसर्च 2026 के UN Biodiversity Conference से ठीक पहले सामने आई है, जब दुनिया भर की सरकारें बायोडायवर्सिटी और क्लाइमेट टारगेट्स को साथ लाने के तरीके तलाश रही हैं। भारत ने Kunming-Montreal Global Biodiversity Framework के तहत 2030 तक अपने 30% भूभाग को संरक्षित करने का वादा किया है, जबकि अभी प्रोटेक्टेड एरिया सिर्फ करीब 5% ही है। यानी अगले चार साल से भी कम समय में करीब एक चौथाई और जमीन कंजर्व करनी होगी। वो भी तब जब खेती, इंडस्ट्री, खनन और शहरीकरण के लिए भी जमीन की मांग लगातार बढ़ रही है।
ऐसे हालात में हर इंच जमीन की स्मार्ट प्लानिंग बेहद जरूरी हो जाती है। रिसर्चर्स का सुझाव है कि भारत के पास पहले से मौजूद वाइल्डलाइफ प्रोटेक्शन एक्ट (WPA) जैसे स्पीशीज-स्पेसिफिक कानूनी टूल्स का इस्तेमाल इन एंकर स्पीशीज के लिए भी किया जा सकता है। बिना नए प्रोटेक्टेड एरिया घोषित किए भी। लेकिन सावधान, यह पूरा जवाब नहीं है
खुद रिसर्चर्स इस फ्रेमवर्क को एक 'फर्स्ट-ऑर्डर स्क्रीनिंग टूल' कहते हैं। इसका मतलब है कि यह कंजर्वेशन प्रायोरिटी तय करने में शुरुआती मदद दे सकता है, लेकिन जमीन पर असली फैसले लेने से पहले स्थानीय समुदाय, खेती, सड़क, खनन और दूसरी जमीनी हकीकतों को भी देखना जरूरी होगा। '9 जानवर बचाओ, बाकी सब अपने आप बच जाएगा', यह इस स्टडी का निष्कर्ष हरगिज नहीं है।
कहना होगा कि 2026 में Conservation Letters में प्रकाशित यह स्टडी वाइल्डलाइफ कंजर्वेशन और क्लाइमेट एक्शन को एक ही सवाल में बदल देती है, 'किस जानवर का घर बचाने से सबसे ज्यादा प्रकृति एक साथ बच सकती है?' फिलहाल इसका वैज्ञानिक जवाब इन 9 जानवरों सांभर, तेंदुआ, ढोल, बाघ, किंग कोबरा, गौर, भारतीय पैंगोलिन, स्लॉथ भालू और ग्रेट हॉर्नबिल की तरफ इशारा करता है।
Updated on:
10 Aug 2026 03:08 pm
Published on:
10 Aug 2026 03:08 pm
