
अमेरिका की वाशिंगटन यूनिवर्सिटी इन सेंट लुइस के मैककेल्वे स्कूल ऑफ इंजीनियरिंग में एल्वेरा और विलियम आर. स्टकेनबर्ग प्रोफेसर गैंग वू (Prof. Gang Wu) के नेतृत्व में वैज्ञानिकों की एक संयुक्त टीम ने हाइड्रोजन ईंधन सेल (Fuel Cell) तकनीक में क्रांतिकारी सफलता हासिल की है। इस अंतरराष्ट्रीय शोध दल में ब्रुकहेवन नेशनल लेबोरेटरी, लॉरेन्स बर्कले नेशनल लेबोरेटरी, नॉर्थईस्टर्न यूनिवर्सिटी और पिट्सबर्ग यूनिवर्सिटी के दिग्गज वैज्ञानिक शामिल थे।
वैज्ञानिकों की इस साझा रिसर्च के दूरगामी नतीजे दुनिया की प्रतिष्ठित वैज्ञानिक पत्रिका 'नेचर नैनोटेक्नोलॉजी' (Nature Nanotechnology) में प्रकाशित हुए हैं। इस खोज से न केवल बिजली की भारी खपत करने वाले AI और टेक डेटा सेंटर्स को ग्रीन एनर्जी मिलेगी, बल्कि भविष्य की इलेक्ट्रिक गाड़ियों और हैवी व्हीकल्स में हाइड्रोजन फ्यूल सेल का इस्तेमाल बेहद सस्ता और टिकाऊ हो जाएगा।
दुनियाभर में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) और डिजिटल सेवाओं के विस्तार के कारण डेटा सेंटर्स की मांग अभूतपूर्व दर से बढ़ रही है। इन विशाल सर्वर फार्मों को चलाने और लगातार ठंडा रखने के लिए भारी मात्रा में बिजली की जरूरत होती है।
इलेक्ट्रिक पावर रिसर्च इंस्टीट्यूट (EPRI) के आंकड़ों के मुताबिक, वर्ष 2023 तक अमेरिकी डेटा सेंटर्स कुल राष्ट्रीय बिजली मांग का 4% हिस्सा इस्तेमाल कर रहे थे। अनुमान है कि 2030 तक यह आंकड़ा बढ़ कर 9% तक पहुंच जाएगा। इससे नेशनल पावर ग्रिड पर दबाव खतरनाक स्तर तक बढ़ सकता है।
प्रोफेसर गैंग वू के अनुसार, "यदि कोई डेटा सेंटर फ्यूल सेल का उपयोग कर खुद अपनी बिजली पैदा करने लगे, तो वह हाइड्रोजन को सीधे स्वच्छ बिजली में बदल देगा। इससे पावर ग्रिड पर निर्भरता और दबाव पूरी तरह समाप्त हो जाएगा।"
हाइड्रोजन फ्यूल सेल ऑक्सीजन और हाइड्रोजन के रासायनिक मिलन से बिजली पैदा करते हैं, जिसमें सह-उत्पाद (By-product) के रूप में केवल पानी और गर्मी निकलती है। इस रासायनिक प्रक्रिया को तेज करने के लिए प्लैटिनम (Platinum) जैसी कीमती धातु का उपयोग उत्प्रेरक (Catalyst) के रूप में किया जाता है।
प्लैटिनम का अत्यधिक महंगा होना: प्लैटिनम का उपयोग कम करने के लिए इसे अति-सूक्ष्म नैनोकणों में बदला जाता है।
स्थिरता की कमी: फ्यूल सेल के लगातार चलने पर ये नैनोकण आपस में जुड़ जाते हैं या पिघलकर बड़े हो जाते हैं, जिससे सेल का प्रदर्शन तेजी से गिरने लगता है।
रिसर्च करने वाली प्रोफेसर वू की टीम ने इस जटिल चुनौती से निपटने के लिए नैनोटेक्नोलॉजी का अनोखा ढांचा तैयार किया है। उन्होंने 'छिद्रयुक्त खोखले कार्बन गोलों' (Hollow Carbon Spheres) की एक नई संरचना बनाई, जिसमें सूक्ष्मतम नैनोचैनल एक खास रेडियल पैटर्न में बने हुए हैं।
उच्च तापमान सहने की क्षमता: इस विशेष नैनो-संरचना के कारण प्लैटिनम-कोबाल्ट नैनोकणों को 1000°C के अत्यधिक तापमान पर गर्म किया जा सका। आमतौर पर इतने तापमान पर नैनोकण नष्ट हो जाते हैं, लेकिन इस कार्बन सपोर्ट ने उन्हें 5 नैनोमीटर से छोटा और समान रूप से बिखरा हुआ बनाए रखा।
परमाणुओं की सटीक व्यवस्था: 1000°C तापमान पर गर्म होने से प्लैटिनम के परमाणुओं में एक अत्यधिक व्यवस्थित 'इंटरमेटैलिक' (Intermetallic) ढांचा बन गया, जो फ्यूल सेल को जबरदस्त ताकत और लंबी उम्र देता है।
प्रयोगशाला में किए गए कड़े परीक्षणों में इस नए उत्प्रेरक ने असाधारण प्रदर्शन दर्ज किया:
1,50,000 तीव्र वोल्टेज चक्रों (Stress Cycles) के बाद भी उत्प्रेरक ने अपनी 85% कार्यक्षमता कायम रखी।
वैज्ञानिकों का अनुमान है कि यह स्थायित्व लगभग 25,000 घंटे (करीब 3 साल लगातार) के निर्बाध संचालन के बराबर है।
इसमें मौजूद खुले नैनोचैनल प्रोटॉन, ऑक्सीजन और पानी के निर्बाध आवागमन का आसान रास्ता बनाते हैं, जिससे बिजली का नुकसान न्यूनतम होता है।
खास बात यह है किवाशिंगटन यूनिवर्सिटी के टेक्नोलॉजी मैनेजमेंट ऑफिस ने प्रोफेसर गैंग वू की इस पेटेंट तकनीक को व्यावसायिक इस्तेमाल के लिए पंजीकृत कर लिया है। यदि यह तकनीक उद्योग स्तर पर बड़े पैमाने पर तैयार की जाती है, तो यह केवल डेटा सेंटर्स ही नहीं बल्कि लंबी दूरी के इलेक्ट्रिक ट्रकों और बसों, समुद्री जहाजों और कॉमर्शियल एविएशन और घरेलू पावर बैकअप सिस्टम को पूरी तरह प्रदूषण मुक्त और किफायती बना देगी।