
जर्मनी के वैज्ञानिकों का कमाल:बिना कंप्रेसर के हाइड्रोजन टरबाइन 303 सेकंड चलाई। ( विजुअल: Google Gemoini AI.)
Compressorless : दुनिया भर के वैज्ञानिक क्लीन एनर्जी और ग्रीन फ्यूचर की दिशा में लगातार नए आयाम स्थापित कर रहे हैं। इसी कड़ी में जर्मनी के प्रतिष्ठित संस्थान कार्लज़ूहे इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी (KIT) की एक रिसर्च टीम ने एक ऐतिहासिक और अभूतपूर्व उपलब्धि हासिल की है। केआईटी के इंस्टीट्यूट ऑफ थर्मल एनर्जी टेक्नोलॉजी एंड सेफ्टी (ITES) के शोधकर्ताओं ने एक ऐसी विशेष कंप्रेसर-मुक्त (Compressor-less) हाइड्रोजन गैस टरबाइन का विकास किया है, जो यांत्रिक कंप्रेसर के बिना दहन कक्ष में होने वाले नियंत्रित विस्फोटों (Controlled Detonation Waves) का उपयोग कर के सीधे बिजली पैदा करती है। इस महत्वपूर्ण अध्ययन और प्रयोग का नेतृत्व आईटीईएस (ITES) के निदेशक प्रोफेसर डैनियल बनुती और उनकी विशेषज्ञ शोध टीम ने किया है।
रिसर्च के अनुसार कार्लज़ूहे इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी (केआईटी) के शोधकर्ताओं ने एक नए कंप्रेसर रहित गैस टरबाइन को रिकॉर्ड 303 सेकंड तक संचालित कर के हाइड्रोजन ऊर्जा के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि हासिल की है। इंस्टीट्यूट ऑफ थर्मल एनर्जी टेक्नोलॉजी एंड सेफ्टी (आईटीईएस) के निदेशक प्रोफेसर डैनियल बनुती बताते हैं कि इस नई खोज ने न केवल भविष्य के पावर प्लांट्स में ईंधन की दक्षता बढ़ाने का मार्ग प्रशस्त किया है, बल्कि आने वाले समय में विमानन (Aviation) उद्योग को भी पूरी तरह से कार्बन-मुक्त और अधिक कुशल बनाने की नई उम्मीद दी है।
रिसर्च के मुताबिक वैज्ञानिकों के सामने ऐसी तकनीक को विकसित करने में सबसे बड़ी चुनौती अत्यधिक तापमान और दहन कक्ष (Combustion Chamber) के पिघलने की थी। इससे पहले जितने भी प्रयोग किए गए थे, उनमें दहन कक्ष के अत्यधिक गर्म होकर पिघल जाने के डर से टरबाइन को केवल एक सेकंड के कुछ हिस्सों तक ही चलाया जा पाता था।
केआईटी (KIT) की टीम ने अपनी नई तकनीक और उन्नत इंजीनियरिंग के बल पर इस टरबाइन को लगातार 303 सेकंड (5 मिनट से अधिक) तक सफलता-पूर्वक संचालित करके हाइड्रोजन ऊर्जा के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि हासिल की है, नए परीक्षण में संचालन समय को पांच मिनट से अधिक तक बढ़ा दिया गया है। इससे पहले यह रिकॉर्ड अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा (NASA) के नाम था, जिसकी टरबाइन 250 सेकंड तक ही चल पाई थी।
गौरतलब है कि केआईटी टीम इस वर्ष की शुरुआत में ही बिना किसी मैकेनिकल कंप्रेसर के हाइड्रोजन गैस टरबाइन से सफलतापूर्वक बिजली बनाने वाली दुनिया की पहली टीम बनी थी, और अब इस संचालन समय को बढ़ाकर उन्होंने अपनी तकनीक की मजबूती और स्थायित्व को साबित कर दिया है । इस वर्ष के शुरू में, KIT टीम ने यांत्रिक कंप्रेसर पर निर्भर न रहने वाले हाइड्रोजन गैस टरबाइन से बिजली उत्पन्न करने वाली पहली टीम बनने का गौरव भी प्राप्त किया।
बिजली संयंत्रों (Power Plants) या हवाई जहाजों के इंजनों में उपयोग होने वाली पारंपरिक टरबाइनों को ईंधन जलाने के लिए बहुत अधिक दबाव वाली हवा की आवश्यकता होती है [cite: बनुती बताते हैं, “एक पारंपरिक गैस टरबाइन, जैसे कि बिजली संयंत्रों में या विमान के पंखों के नीचे उपयोग की जाने वाली टरबाइन। इसके लिए उनमें एक भारी यांत्रिक कंप्रेसर (Mechanical Compressor) लगा होता है [cite: यह नई टरबाइन दबाव बढ़ाने वाली दहन प्रणाली पर आधारित है। पारंपरिक गैस टरबाइन हवा का दबाव बढ़ाने के लिए एक यांत्रिक कंप्रेसर का उपयोग करती हैं।
यह यांत्रिक कंप्रेसर हवा को दबाने के लिए खुद टरबाइन द्वारा पैदा की गई कुल बिजली का लगभग 50 प्रतिशत हिस्सा अकेले ही उपभोग कर जाता है। एक पारंपरिक गैस टरबाइन… कुशल दहन के लिए आवश्यक उच्च दबाव तक हवा को कंप्रेस करने में अपनी लगभग 50 प्रतिशत शक्ति का उपभोग करती है। इसका मतलब यह है कि आधी ऊर्जा केवल टरबाइन को चलाने के लिए हवा को दबाने में ही बर्बाद हो जाती है और वह बिजली उत्पादन के लिए नहीं मिल पाती।
रिसर्च के अनुसार केआईटी से विकसित प्रणाली में किसी बाहरी या यांत्रिक कंप्रेसर की आवश्यकता ही नहीं होती। यह टरबाइन प्रेशर-गेन कंबस्शन (Pressure-Gain Combustion) या दबाव-वृद्धि दहन तकनीक पर काम करती है।
रिसर्च के मुताबिक जब दहन कक्ष के अंदर हाइड्रोजन का दहन होता है, तो प्रवाहित होने वाली गैसों में तरंग और भंवर पैटर्न (Wave and Vortex Patterns) के कारण एक विशेष प्रकार की द्रव-यांत्रिकी अस्थिरता (Fluid Mechanical Instability) उत्पन्न होती है। इससे दहन कक्ष के अंदर ही स्वतः विस्फोट तरंगें (Detonation Waves) बनती हैं, जो बहुत तेजी से दबाव को बढ़ा देती हैं । यह टरबाइन दबाव बढ़ाने वाली दहन प्रणाली पर आधारित है, इससे टरबाइन बिना यांत्रिक कंप्रेसर के चलती है।
इन वैज्ञानिकों के अनुसार, यह तकनीक कुछ अन्य ईंधनों के साथ भी काम कर सकती है, लेकिन हाइड्रोजन (Hydrogen) इस प्रणाली के लिए सबसे आदर्श और बेहतरीन ईंधन साबित होता है। इसके ये मुख्य कारण हैं:
हाइड्रोजन बहुत तेजी से रासायनिक प्रतिक्रिया करता है, जिससे दहन कक्ष में बहुत तेजी से और नियंत्रित तरीके से दबाव में वृद्धि (Pressure Rise) होती है। हाइड्रोजन विशेष रूप से उपयुक्त है क्योंकि यह बहुत तेजी से प्रतिक्रिया करता है और दबाव में स्थिर वृद्धि उत्पन्न कर सकता है।
रिसर्च के मुताबिक प्राकृतिक गैस या अन्य जीवाश्म ईंधनों के विपरीत, हाइड्रोजन के जलने से केवल पानी का वाष्प (Water Vapor) बनता है। इसके अलावा, हाइड्रोजन को सौर या पवन ऊर्जा जैसे नवीकरणीय स्रोतों (Renewable Energy Sources) से उत्पन्न करके पूरी तरह से पर्यावरण-अनुकूल बनाया जा सकता है। यह परिणाम स्वच्छ ऊर्जा उत्पादन के लिए हाइड्रोजन के उपयोग की दिशा में प्रगति का संकेत भी देता है। प्राकृतिक गैस के विपरीत, हाइड्रोजन का नवीकरणीय ऊर्जा स्रोतों से उत्पादन किया जा सकता है।
रिसर्च टीम के अनुसार दहन कक्ष में अत्यधिक तीव्र और शक्तिशाली नियंत्रित विस्फोटों को संभालना और उनसे बिना किसी रुकावट के स्थिर बिजली उत्पन्न करना वैज्ञानिकों के लिए एक बहुत बड़ी इंजीनियरिंग चुनौती थी, क्यों कि दहन कक्ष को टरबाइन से जोड़ना और उसके तीव्र दहन को बिजली में परिवर्तित करना एक अतिरिक्त इंजीनियरिंग चुनौती बन गया। कक्ष के अंदर होने वाली तीव्र और शक्तिशाली प्रतिक्रियाओं के कारण टरबाइन को स्थिर तरीके से ऊर्जा स्थानांतरित करना कठिन हो जाता है।
बिना कंप्रेसर वाली टरबाइन का सफल परीक्षण: 303 सेकंड चलाकर वैज्ञानिकों ने रचा इतिहास! (विजुअल: Google Gemini AI)
कंप्रेसर को पूरी तरह से हटा देने से टरबाइन तकनीक में कई क्रांतिकारी बदलाव आएंगे। चूंकि कंप्रेसर से 50% बिजली की खपत बंद हो जाएगी, इसलिए उत्पादित बिजली की कुल दक्षता (Efficiency) में भारी उछाल आएगा। कंप्रेसर हटाने से ऊर्जा की हानि कम हो सकती है, गतिशील घटकों की संख्या कम हो सकती है और समग्र दक्षता में सुधार हो सकता है।
वैज्ञानिकों के अनुसार यांत्रिक कंप्रेसर हटाने से टरबाइन के गतिशील घटकों (Moving Parts) की संख्या बहुत कम हो जाएगी। इससे मशीनें आकार में हल्की, निर्माण में सस्ती और रखरखाव (Maintenance) के मामले में बहुत आसान हो जाएंगी। रिसर्चर्स का कहना है कि यह तकनीक भविष्य में हल्की, कम खर्चीली और अत्यधिक कुशल टर्बाइनों के निर्माण में सहायक सिद्ध हो सकती है।
अब भविष्य में विमानों के इंजन बेहद हल्के और अधिक शक्तिशाली बनाए जा सकेंगे, जो पारंपरिक जेट ईंधन के बजाय शून्य-उत्सर्जन वाले हाइड्रोजन से चलेंगे।
यह उपलब्धि हमें जीवाश्म-मुक्त (Fossil-Free) और पूरी तरह से लचीली स्वच्छ ऊर्जा प्रणालियों की ओर ले जाने में एक मील का पत्थर साबित होगी।
दहन कक्ष के भीतर बहुत तीव्र और अचानक होने वाले विस्फोटों के कारण टरबाइन तक ऊर्जा का एक समान और स्थिर प्रवाह बनाए रखना बेहद कठिन काम है। लेकिन हमारी टीम दुनिया की पहली ऐसी टीम बनी है जिसने ऐसी टरबाइन को सफलतापूर्वक लंबे समय तक संचालित किया और इस पूरी प्रक्रिया के दौरान निरंतर बिजली भी पैदा की। यह बेहद मुश्किल है क्योंकि चैम्बर में होने वाली तीव्र और तीव्र दहन प्रक्रियाओं के कारण टरबाइन तक स्थिर ऊर्जा का स्थानांतरण चुनौतीपूर्ण हो जाता है। हम इस तरह की टरबाइन को सफलतापूर्वक संचालित करने और इस प्रक्रिया में बिजली उत्पन्न करने वाले पहले व्यक्ति हैं।
—प्रोफेसर डैनियल बनुती,केआईटी के इंस्टीट्यूट ऑफ थर्मल एनर्जी टेक्नोलॉजी एंड सेफ्टी,जर्मनी।
बहरहाल, कार्लज़ूहे इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी (KIT) के वैज्ञानिकों की यह कामयाबी सिर्फ लैब में किए गए एक प्रयोग तक सीमित नहीं है, बल्कि यह आने वाले समय में बिजली बनाने और साफ-सुथरे परिवहन की नींव बन सकती है। बिना कंप्रेसर वाली हाइड्रोजन टरबाइन का यह सफल परीक्षण दिखाता है कि सही तकनीक और नए विचारों के दम पर हम ऊर्जा के संकट को दूर कर सकते हैं और दुनिया को एक हरा-भरा व सुरक्षित भविष्य दे सकते हैं। इस ऐतिहासिक खोज से स्वच्छ ऊर्जा और आने वाले समय के हवाई जहाजों के लिए बेहद शानदार बिजली प्रणालियों का रास्ता खुलेगा।
Updated on:
04 Aug 2026 09:08 pm
Published on:
04 Aug 2026 09:04 pm
