
India bullet train: जब 2017 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और जापान के तत्कालीन प्रधानमंत्री शिंजो आबे ने मुंबई-अहमदाबाद हाई-स्पीड रेल परियोजना की आधारशिला रखी थी, तब इसे भारत का सबसे महत्वाकांक्षी रेल सपना कहा गया था। आलोचकों का तर्क था कि भारत पूरी तरह जापानी तकनीक पर निर्भर रहेगा और निर्माण में वर्षों लगेंगे। लेकिन नौ साल बाद तस्वीर बदलती दिखाई दे रही है। परियोजना का अधिकांश सिविल निर्माण भारतीय कंपनियों और इंजीनियरों के हाथों पूरा हो रहा है। यही वजह है कि अब यह परियोजना केवल 320 किमी प्रति घंटे की रफ्तार वाली ट्रेन नहीं, बल्कि भारत को हाई-स्पीड रेल तकनीक में आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में बड़ा कदम मानी जा रही है।
मुंबई-अहमदाबाद हाई-स्पीड रेल कॉरिडोर की लंबाई 508 किलोमीटर है। परियोजना में 12 स्टेशन बनाए जा रहे हैं। शुरुआती वर्षों में भूमि अधिग्रहण और पर्यावरणीय मंजूरियों के कारण काम धीमा रहा, लेकिन पिछले कुछ वर्षों में निर्माण ने तेजी पकड़ी है। राष्ट्रीय हाई स्पीड रेल कॉरपोरेशन लिमिटेड (NHSRCL) के अनुसार, अधिकांश पिलर, वायाडक्ट, पुल और स्टेशन निर्माण में भारतीय कंपनियों ने प्रमुख भूमिका निभाई है। परियोजना में आधुनिक प्रीकास्ट तकनीक, फुल स्पैन लॉन्चिंग और बड़े पैमाने पर स्वदेशी इंजीनियरिंग क्षमता का इस्तेमाल किया जा रहा है।
बुलेट ट्रेन परियोजना के लिए हजारों टन स्टील, सीमेंट, प्रीकास्ट गर्डर, इलेक्ट्रिकल सिस्टम, ट्रैक, सिग्नलिंग और आधुनिक मशीनों की जरूरत पड़ी। इसका फायदा देश के स्टील, सीमेंट, इंजीनियरिंग और निर्माण उद्योग को भी मिला। रेलवे विशेषज्ञ मानते हैं कि इस परियोजना से भारतीय कंपनियों को हाई-स्पीड रेल निर्माण का अनुभव मिलेगा, जिसका उपयोग भविष्य के अन्य कॉरिडोरों में किया जा सकेगा।
शुरुआत में परियोजना के कई हिस्से जापानी विशेषज्ञों पर निर्भर थे, लेकिन अब बड़ी संख्या में भारतीय इंजीनियरों को हाई-स्पीड रेल तकनीक का प्रशिक्षण दिया जा चुका है। परियोजना के कई निर्माण कार्य पूरी तरह भारतीय कंपनियां संभाल रही हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि इससे भविष्य में भारत केवल हाई-स्पीड रेल का उपभोक्ता नहीं रहेगा, बल्कि इस क्षेत्र में तकनीकी क्षमता विकसित करने वाले देशों में शामिल हो सकता है।
चीन ने पिछले दो दशकों में दुनिया का सबसे बड़ा हाई-स्पीड रेल नेटवर्क तैयार किया है और अब वह अपनी तकनीक निर्यात भी करता है। भारत ने अलग रास्ता चुना है। यहां पहली परियोजना जापान की तकनीक के साथ बनाई जा रही है, लेकिन निर्माण क्षमता धीरे-धीरे भारतीय कंपनियों के हाथ में आ रही है। विशेषज्ञ मानते हैं कि यह मॉडल भविष्य में भारत को कम लागत वाली हाई-स्पीड परियोजनाओं में प्रतिस्पर्धी बना सकता है।
परियोजना की लागत लगातार चर्चा का विषय रही है। इसके अलावा यात्रियों की संख्या, किराया, रखरखाव और भविष्य के अन्य हाई-स्पीड कॉरिडोर की आर्थिक व्यवहार्यता भी महत्वपूर्ण सवाल हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि यदि बुलेट ट्रेन का किराया बहुत अधिक रहा तो इसकी पहुंच सीमित रह सकती है।
सरकार का लक्ष्य 2027 तक परियोजना का संचालन शुरू करने का लक्ष्य रखा गया था। लेकिन इसे अब 2027 में ही संचालित किया जाएगा। यदि यह समय पर पूरा होता है तो भारत दुनिया के उन चुनिंदा देशों में शामिल होगा, जहां हाई-स्पीड रेल नेटवर्क संचालित होगा। इससे न केवल यात्रा का समय घटेगा बल्कि, देश की इंजीनियरिंग क्षमता, विनिर्माण और तकनीकी दक्षता को भी नई पहचान मिलेगी।
मुंबई-अहमदाबाद बुलेट ट्रेन परियोजना केवल दो शहरों के बीच तेज यात्रा का माध्यम नहीं है। यह भारत की इंजीनियरिंग क्षमता, हाई-स्पीड रेल तकनीक, औद्योगिक विकास और 'मेक इन इंडिया' अभियान की बड़ी परीक्षा भी है। यदि परियोजना तय समय पर पूरी होती है और इससे मिली तकनीकी विशेषज्ञता का उपयोग भविष्य के कॉरिडोरों में किया जाता है, तो भारत एशिया में हाई-स्पीड रेल निर्माण की नई ताकत बन सकता है।