
4-day work week : क्या है 4-Day Work Week।
दुनियाभर में पारंपरिक 5 दिन काम और 2 दिन छुट्टी वाले मॉडल पर सवाल उठ रहे हैं। बढ़ते तनाव, बर्नआउट और वर्क-लाइफ बैलेंस की मांग के बीच 4-Day Work Week एक बड़े प्रयोग के तौर पर उभरा है। लेकिन असल तस्वीर उतनी सीधी नहीं है जितनी अक्सर बताई जाती है। अलग-अलग देशों में यह मॉडल अलग-अलग तरीकों से लागू हुआ है।
घंटे घटाने वाला मॉडल (100-80-100): कर्मचारी 4 दिन, करीब 32 घंटे काम करते हैं, पर सैलरी 100% वही रहती है। यानी कुल काम के घंटे कम होते हैं।
कंप्रेस्ड मॉडल: कुल साप्ताहिक घंटे (जैसे 38-40) वही रहते हैं, बस उन्हें 5 दिन की बजाय 4 लंबे दिनों में फिट किया जाता है। यानी दिन घटते हैं, घंटे नहीं।
यह अंतर अहम इसलिए है क्योंकि अलग-अलग देशों ने इनमें से अलग-अलग मॉडल अपनाए हैं, जिसकी वजह से नतीजों की तुलना करना मुश्किल हो जाता है। आइए जानते हैं किन देशों में क्या हुआ।
2015 से 2019 के बीच रेक्याविक सिटी काउंसिल और आइसलैंड की सरकार ने मिलकर 2,500 से ज्यादा कर्मचारियों पर बड़ा ट्रायल चलाया, जिसमें साप्ताहिक घंटे 40 से घटाकर 35-36 किए गए, बिना सैलरी में कोई कटौती किए। ज्यादातर कार्यस्थलों पर उत्पादकता समान रही या बेहतर हुई, और कर्मचारियों ने कम तनाव और बेहतर स्वास्थ्य महसूस किया। बाद में ट्रेड यूनियनों की बातचीत से करीब 86% कामकाजी आबादी को कम घंटों का विकल्प मिल गया।
यह तकनीकी रूप से पूरा '4-दिन' मॉडल नहीं था, बल्कि साप्ताहिक घंटे घटाए गए थे। कुछ शोधकर्ताओं का यह भी कहना है कि इस ट्रायल की सफलता को मीडिया में कुछ ज्यादा ही बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया गया है, हालांकि नतीजे फिर भी सकारात्मक ही रहे हैं।
जून से दिसंबर 2022 तक चले इस ट्रायल में 61 कंपनियों के करीब 2,900 कर्मचारी शामिल हुए। यह '100-80-100' मॉडल पर आधारित था। यानी 80% समय में 100% सैलरी और 100% प्रोडक्टिविटी का लक्ष्य। नतीजे उत्साहजनक रहे: 92% यानी 56 कंपनियों ने ट्रायल के बाद भी इसे जारी रखा, जिनमें से 18 ने इसे स्थायी रूप से अपना लिया। कंपनियों का औसत रेवेन्यू भी करीब स्थिर रहा (1.4% की मामूली बढ़ोतरी), बीमारी की छुट्टियां घटीं और कर्मचारियों का जॉब छोड़ने की दर भी कम हुई।
नवंबर 2022 से लागू 'लेबर डील' कानून के तहत फुल-टाइम कर्मचारियों को अपने सामान्य साप्ताहिक घंटे (आमतौर पर 38 घंटे) 5 दिन की बजाय 4 लंबे दिनों (करीब 9.5 घंटे प्रतिदिन) में पूरे करने का अधिकार मिला। यहां ध्यान देने वाली बात यह है कि कुल काम के घंटे कम नहीं हुए, सिर्फ उन्हें फिर से बांटा गया। यह पूरी तरह कर्मचारी की मर्जी पर निर्भर है, और नियोक्ता ठोस वजह देकर मना भी कर सकता है। हालांकि अपनाने की दर अभी सीमित है। 2023 तक करीब 1.9% कर्मचारी ही इस मॉडल पर काम कर रहे थे।
2021 में जापान सरकार ने अपनी आर्थिक नीति में कंपनियों से सप्ताह में 4 दिन काम का विकल्प देने की सिफारिश की, ताकि श्रम की कमी, दुनिया की सबसे कम जन्मदरों में से एक, और 'करोशी' (अत्यधिक काम से मौत) जैसी समस्याओं से निपटा जा सके। इसके बावजूद अपनाने की रफ्तार बहुत धीमी है। मंत्रालय के मुताबिक सिर्फ करीब 8% कंपनियां ही हफ्ते में 3 या ज्यादा छुट्टियां देती हैं। पैनासोनिक जैसी बड़ी कंपनी में 63,000 योग्य कर्मचारियों में से सिर्फ 150 ने ही इस विकल्प को चुना है। हाल में टोक्यो सरकार ने अप्रैल से अपने कर्मचारियों के लिए 4-दिन का हफ्ता शुरू करने का ऐलान किया, खासकर काम करने वाली माताओं और गिरती जन्मदर को ध्यान में रखते हुए।
इन देशों में भी छोटे स्तर के पायलट प्रोजेक्ट और ट्रायल हो चुके हैं, लेकिन ये राष्ट्रव्यापी नीति नहीं बल्कि सीमित प्रयोग हैं, जिनका दायरा आइसलैंड या UK के ट्रायल जितना बड़ा नहीं रहा।
भारत में अभी 4-Day Work Week आधिकारिक तौर पर लागू नहीं है, हालांकि इस पर चर्चा वर्षों से चल रही है। नए लेबर कोड्स में 4-दिन के हफ्ते जैसी व्यवस्था का प्रावधान जरूर है, पर इसमें भी ज्यादातर बेल्जियम जैसा 'घंटे वही, दिन कम' वाला मॉडल है। यानी रोज के काम के घंटे बढ़ाकर हफ्ते के कुल घंटे बराबर रखे जाते हैं, अलग-अलग राज्यों में अभी इसका अमल अलग-अलग है।
भारत के सामने चुनौतियां बड़ी आबादी, सेवा क्षेत्र में पहले से लंबे कार्य घंटे, मैन्युफैक्चरिंग-आधारित उद्योग और 24×7 ग्राहक सहायता जैसी सेवाएं हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि IT, स्टार्टअप, डिजिटल सेवाओं और कंसल्टिंग जैसे क्षेत्रों में हाइब्रिड मॉडल या पायलट प्रोजेक्ट के जरिए शुरुआत हो सकती है।
Updated on:
04 Aug 2026 09:57 am
Published on:
04 Aug 2026 09:57 am
