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साइलेंट फर्टिलिटी क्राइसिस- आबादी नहीं, अब घटती जन्मदर भविष्य की नई चुनौती, जानिए क्यों बढ़ी भारत की चिंता

India Silent Fertility Crisis: भारत में जन्दर लगातार घट रही है और FTR प्रतिस्थापन स्तर नीचे आ चुकी है। जानिए क्या है साइलेंट फर्टिलिटी क्राइसिस? क्या हैं इसके कारण, आंकड़े क्यों डराते हैं और भारत के भविष्य पर क्या होगा इसका असर?
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Aug 03, 2026
Silent Fertility Crisis
Silent Fertility Crisis: भारत को भविष्य की चिंता सताई। (AI Creative)

India Silent Fertility Crisis: दुनिया के सबसे अधिक आबादी वाले देश के रूप में भारत की पहचान लंबे समय तक जनसंख्या विस्फोट से जुड़ी रही। लेकिन अब तस्वीर बदल रही है। देश की कुल प्रजनन दर (Total Fertility Rate-TFR) प्रतिस्थापन स्तर (2.1) से नीचे आ चुकी है। यानी औसतन एक महिला अब इतनी संतान को जन्म नहीं दे रही है कि अगली पीढ़ी समान आकार में बनी रहे। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यह रुझान लंबे समय तक जारी रहा, तो आने वाले दशकों में भारत को भी जापान, दक्षिण कोरिया और चीन जैसी चुनौतियों, बुजुर्ग आबादी में बढ़ोतरी, श्रमिकों की कमी और सामाजिक सुरक्षा पर बढ़ते दबाव का सामना करना पड़ सकता है। फिलहाल भारत के पास युवा आबादी का लाभ (Demographic Dividend) है, लेकिन यही अवसर भविष्य में चुनौती भी बन सकता है।

तेजी से बदल रही है तस्वीर

स्वास्थ्य सर्वेक्षण NFHS-5 (2019-21) के अनुसार भारत की कुल प्रजनन दर (TFR) 2.0 पर आ गई है, जबकि आबादी को स्थिर बनाए रखने के लिए इसे लगभग 2.1 माना जाता है। यह बदलाव अचानक नहीं आया है। 1950 के दशक में भारत की TFR लगभग 6 थी। परिवार नियोजन, महिलाओं की शिक्षा, शहरीकरण, स्वास्थ्य सेवाओं में सुधार और बदलती सामाजिक सोच के कारण इसमें लगातार गिरावट दर्ज हुई है।

देश के कई राज्य, केरल, तमिलनाडु, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, पंजाब, पश्चिम बंगाल और दिल्ली पहले ही प्रतिस्थापन स्तर से नीचे पहुंच चुके हैं। यानी देश के बड़े हिस्से में परिवार छोटे होते जा रहे हैं।

आखिर जन्मदर क्यों घट रही है?

विशेषज्ञों के मुताबिक इसके पीछे कई सामाजिक और आर्थिक कारण एक साथ काम कर रहे हैं।

  • महिलाओं की शिक्षा और रोजगार में बढ़ती भागीदारी।
  • शादी की औसत उम्र बढ़ना।
  • पहला बच्चा देर से पैदा करने की प्रवृत्ति।
  • बच्चों की शिक्षा और स्वास्थ्य पर बढ़ता खर्च।
  • महानगरों में महंगी जीवनशैली और आवास की लागत।
  • छोटे परिवार को प्राथमिकता देने वाली सामाजिक सोच।
  • गर्भनिरोधक साधनों और परिवार नियोजन सेवाओं की बेहतर उपलब्धता।
  • इन कारणों से अब अधिकतर परिवार एक या दो बच्चों तक ही सीमित रहना पसंद कर रहे हैं।

क्या यह केवल स्वास्थ्य का मुद्दा है?

एक्सपर्ट का मानना है, नहीं। यह स्वास्थ्य, अर्थव्यवस्था और सामाजिक संरचना तीनों से जुड़ा विषय है। यदि जन्मदर लंबे समय तक कम बनी रहती है, तो भविष्य में कामकाजी उम्र की आबादी घट सकती है। इससे उद्योगों को श्रमिकों की कमी, सरकार को पेंशन और स्वास्थ्य सेवाओं पर अधिक खर्च तथा परिवारों को बुजुर्गों की देखभाल जैसी चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है। भारत अभी युवा देश है। संयुक्त राष्ट्र के अनुमानों के अनुसार आने वाले दशकों में 60 वर्ष से अधिक आयु की आबादी का अनुपात लगातार बढ़ेगा। ऐसे में कार्यबल और आश्रित आबादी के बीच संतुलन बनाए रखना नीति-निर्माताओं के लिए महत्वपूर्ण होगा।

दुनिया से क्या मिल रही सीख?

दक्षिण कोरिया दुनिया की सबसे कम प्रजनन दर वाले देशों में शामिल है। वहां सरकार वर्षों से आर्थिक प्रोत्साहन, मातृत्व सहायता और बाल देखभाल योजनाओं पर भारी खर्च कर रही है, फिर भी जन्मदर में अपेक्षित सुधार नहीं हुआ। जापान में बुजुर्ग आबादी तेजी से बढ़ने के कारण श्रमिकों की कमी और सामाजिक सुरक्षा पर दबाव लगातार बढ़ रहा है। चीन ने एक-बच्चा नीति समाप्त कर दो और फिर तीन बच्चों की अनुमति दी, लेकिन जीवनयापन की बढ़ती लागत और सामाजिक बदलावों के कारण जन्मदर में उल्लेखनीय सुधार नहीं हो सका। इन उदाहरणों से स्पष्ट है कि एक बार जन्मदर बहुत नीचे चली जाए तो उसे दोबारा बढ़ाना आसान नहीं होता।

भारत के लिए अभी अवसर भी है

हालांकि विशेषज्ञ यह भी मानते हैं कि भारत की स्थिति फिलहाल इन देशों जैसी नहीं है। देश की बड़ी आबादी अभी भी युवा है और कई राज्यों में जन्मदर प्रतिस्थापन स्तर के आसपास है। इसलिए भारत के पास अपनी जनसांख्यिकीय ताकत का लाभ उठाने का समय है। यदि रोजगार, कौशल विकास, महिला कार्यबल की भागीदारी, मातृत्व सहायता, सस्ती बाल देखभाल सुविधाएं और स्वास्थ्य सेवाएं मजबूत की जाएं तो भारत अपनी युवा आबादी को आर्थिक विकास में बदल सकता है।

क्या कम जन्मदर हमेशा बुरी खबर है?

एक्सपर्ट्स का कहना है कि ऐसा होना हमेशा जरूरी नहीं है। कम जन्मदर के कुछ सकारात्मक पहलू भी हैं। परिवार प्रत्येक बच्चे की शिक्षा और स्वास्थ्य पर अधिक निवेश कर सकते हैं। महिलाओं को शिक्षा और करियर के बेहतर अवसर मिलते हैं। संसाधनों पर दबाव कम हो सकता है। मातृ एवं शिशु स्वास्थ्य में सुधार की संभावना बढ़ती है। लेकिन यदि जन्मदर बहुत नीचे चली जाए और लंबे समय तक वहीं बनी रहे, तो आर्थिक विकास और सामाजिक संतुलन प्रभावित हो सकता है।

भारत को क्या करना होगा?

विशेषज्ञों का मानना है कि अभी घबराने की नहीं, बल्कि तैयारी की जरूरत है। सरकार को ऐसी नीतियों पर ध्यान देना होगा जो परिवार और रोजगार के बीच संतुलन बनाएं। महिलाओं के लिए सुरक्षित कार्यस्थल, गुणवत्तापूर्ण मातृत्व लाभ, सस्ती चाइल्ड-केयर सुविधाएं, बेहतर सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यवस्था और बुजुर्गों के लिए मजबूत सामाजिक सुरक्षा भविष्य की महत्वपूर्ण जरूरतें होंगी।

क्या कहती है रिसर्च

  1. भारत में हर 3 में से 1 वयस्क अपनी मनचाही संतान संख्या हासिल नहीं कर पा रहा
  • 36% भारतीय वयस्कों ने बताया कि उन्हें अनचाही गर्भावस्था का सामना करना पड़ा।
  • 30% लोगों ने कहा कि वे जितने बच्चे चाहते थे, उतने नहीं हो पाए या जितने नहीं चाहते थे, उससे अधिक/कम बच्चे हुए।
  • 23% लोगों ने दोनों तरह की स्थिति का अनुभव किया।
  • यह बताता है कि असली संकट केवल कम जन्मदर नहीं, बल्कि 'Fertility Aspirations' यानी अपनी इच्छानुसार परिवार न बना पाना भी है।

2. भारत की TFR अब 1.9 तक पहुंच गई

UNFPA State of World Population 2025 के मुताबिक भारत की Total Fertility Rate (TFR) 1.9 है।
यह Replacement Level (2.1) से नीचे है, यानी यदि यही रुझान जारी रहा तो लंबे समय में आबादी की प्राकृतिक वृद्धि धीमी पड़ सकती है।

  1. भारत की आबादी अभी बढ़ेगी, फिर घटने लगेगी

अप्रैल 2025 में भारत की अनुमानित आबादी 146.39 करोड़ है। संयुक्त राष्ट्र का अनुमान है कि भारत की आबादी 2060 के शुरुआती दशक में लगभग 170 करोड़ के आसपास पहुंचकर स्थिर होगी और उसके बाद धीरे-धीरे घटने लगेगी।

  1. राज्यों के बीच बड़ा अंतर

भारत में एक जैसी स्थिति नहीं है। बिहार (लगभग 3.0) और मेघालय (लगभग 2.9) जैसे राज्यों में TFR अभी भी राष्ट्रीय औसत से काफी ऊपर है। वहीं दिल्ली, केरल, तमिलनाडु, पंजाब, पश्चिम बंगाल और महाराष्ट्र जैसे राज्यों में यह प्रतिस्थापन स्तर से काफी नीचे है। इससे स्पष्ट है कि भारत एक साथ उच्च और निम्न जन्मदर-दोनों वास्तविकताओं का सामना कर रहा है।

  1. भारत की असली चुनौती 'कम बच्चे' नहीं, 'चुनने की आजादी' है

UNFPA की 2025 रिपोर्ट का निष्कर्ष है कि दुनिया और भारत का वास्तविक संकट केवल जन्मदर का घटना नहीं है, बल्कि यह है कि कई लोग आर्थिक दबाव, नौकरी, महंगी परवरिश, स्वास्थ्य सेवाओं की कमी या सामाजिक कारणों से उतने बच्चे नहीं कर पा रहे, जितने वे वास्तव में चाहते हैं। रिपोर्ट इसे 'Crisis of Fertility Aspirations' कहती है।

UNFPA, State of World Population 2025' के मुताबिक 'भारत का भविष्य इस बात पर निर्भर करेगा कि वह कम होती जन्मदर से नहीं, बल्कि लोगों को अपनी इच्छानुसार परिवार बनाने के लिए कितना सक्षम बना पाता है।'

भारत आज एक ऐसे मोड़ पर खड़ा है जहां उसकी सबसे बड़ी ताकत—युवा आबादी—भविष्य में सबसे बड़ी चुनौती भी बन सकती है। लंबे समय तक देश की चिंता बढ़ती आबादी थी, लेकिन अब धीरे-धीरे घटती जन्मदर भी नीति-निर्माताओं के एजेंडे में जगह बना रही है। यह संकट आज दिखाई नहीं देता, इसलिए इसे 'Silent Fertility Crisis' कहा जा रहा है। यदि समय रहते संतुलित सामाजिक, आर्थिक और परिवार-अनुकूल नीतियां नहीं बनाई गईं, तो आने वाले 20–30 वर्षों में इसका असर भारत के श्रम बाजार, अर्थव्यवस्था और सामाजिक ढांचे पर साफ दिखाई दे सकता है।

Updated on:
03 Aug 2026 11:39 am
Published on:
03 Aug 2026 11:37 am