
Low Protein Benefits : आज के दौर में सुपरमार्केट, किराना की दुकानों और मेडिकल स्टोर के शेल्फ प्रोटीन से भरे पड़े हैं। चाहे अनाज हो, कॉफी हो या फिर पीने का पानी, हर चीज़ को 'हाई प्रोटीन' बता कर बेचा जा रहा है। लोगों के बीच यह धारणा बन चुकी है कि जितना ज़्यादा प्रोटीन खाएंगे, सेहत उतनी ही ज्यादा बेहतर होगी। लेकिन सेल प्रेस (Cell Press) की नई वैज्ञानिक शोध पत्रिका 'सेल प्रेस ब्लू' (Cell Press Blue) में प्रकाशित एक विस्तृत समीक्षा इस सोच पर सवाल उठाती है। विस्कॉन्सिन-मैडिसन विश्वविद्यालय (University of Wisconsin–Madison) के प्रमुख शोध वैज्ञानिक डडली लैमिंग (Dudley Laming) और उनकी रिसर्चर्स साथी बेली ए. नोपफ (Bailey A. Knopf) की टीम की इस व्यापक समीक्षा के अनुसार, साधारण या सुस्त जीवनशैली जीने वाले लोगों के लिए बहुत अधिक प्रोटीन खाना सेहत के लिए नुकसानदेह हो सकता है। रिसर्च टीम ने 350 से अधिक वैज्ञानिक अध्ययनों का विश्लेषण करने के बाद यह पाया कि कम प्रोटीन वाला आहार लेने से शरीर का चयापचय (Metabolism) सुधरता है, कोशिकाओं की सूजन और टूट-फूट कम होती है, और उम्र बढ़ने की रफ्तार भी धीमी हो सकती है।
आमतौर पर माना जाता है कि शरीर को स्वस्थ रखने के लिए प्रोटीन सबसे ज़रूरी पोषक तत्व है। लेकिन वैज्ञानिक डडली लैमिंग और उनकी टीम का कहना है कि आज का आम इंसान उतना शारीरिक श्रम नहीं करता जितना पहले किया करता था। जो लोग खेलकूद, जिम या कड़ा शारीरिक श्रम करते हैं, उनके लिए प्रोटीन मांसपेशियों (Muscles) के निर्माण और मरम्मत में मदद करता है। लेकिन जो लोग दिनभर बैठकर काम करते हैं, उनके शरीर में अतिरिक्त प्रोटीन जमा होकर चयापचय संबंधी समस्याएं और बीमारियां पैदा कर सकता है।
बाज़ार में प्रोटीन उत्पादों की भरमार ने लोगों में यह गलतफहमी पैदा कर दी है कि हर किसी को अत्यधिक प्रोटीन की आवश्यकता है। क्यों कि बाजार में अनाज, कॉफी और पानी जैसी रोजमर्रा की चीजों को 'हाई प्रोटीन' बताकर जरूरत से ज्यादा बढ़ावा दिया जा रहा है। इस अंधाधुंध प्रचार के कारण आम लोगों में यह भ्रांति बन गई है कि अधिक प्रोटीन खाने से ही सेहत बेहतरीन रहती है।
बिना कसरत या शारीरिक श्रम के अत्यधिक प्रोटीन खाने से शरीर में वसा, आंतरिक सूजन और चयापचय संबंधी समस्याएं बढ़ सकती हैं।
ज़रूरत के हिसाब से आहार लेना चाहिए, यानि शरीर को जितने पोषक तत्वों की आवश्यकता हो, उतना ही खाना सेहत को दुरुस्त और ऊर्जावान बनाए रखता है। किसी भी एक पोषक तत्व (जैसे अत्यधिक प्रोटीन या वसा) का बहुत ज़्यादा सेवन चयापचय को बिगाड़ सकता है। आप कितना शारीरिक श्रम या कसरत करते हैं, उसी के आधार पर अपनी डाइट तय करना ही समझदारी है।
संतुलित खानपान न केवल बीमारियों से बचाता है, बल्कि उम्र बढ़ाने की रफ्तार को धीमा कर लंबी और स्वस्थ जिंदगी देता है।
वैज्ञानिकों को लंबे समय से यह पता है कि खाने में कैलोरी (Calorie) की मात्रा घटाने से जीवों की उम्र बढ़ती है और कैंसर जैसी बीमारियों का खतरा कम होता है। हालांकि, आम जीवन में लंबे समय तक भूखा रहना या कम कैलोरी वाला खाना खाना लगभग असंभव सा होता है। शोध वैज्ञानिक डडली लैमिंग के अनुसार, कैलोरी घटाने के बजाय प्रोटीन की मात्रा सीमित करना (Protein Restriction) एक आसान और असरदार विकल्प हो सकता है।
मक्खियों और चूहों पर किए गए शुरुआती अध्ययनों में देखा गया कि जब उनके भोजन में प्रोटीन कम किया गया, तो कुल कैलोरी घटाए बिना भी उनकी उम्र लंबी हो गई। हालिया इंसानी ट्रायल में पाया गया कि जिन लोगों ने अपने भोजन में प्रोटीन सीमित किया, उनका वजन और शरीर की चर्बी (Fat) कम हुई। इतना ही नहीं, खाली पेट ब्लड शुगर (Blood Sugar) के स्तर में भी बेहतरीन सुधार देखा गया, भले ही वे सामान्य मात्रा में कैलोरी खा रहे थे।
आपको प्रोटीन का कितना सेवन करना चाहिए,वैज्ञानिकों ने नये शोध के माध्यम से यह बताया है। ( फोटो: Google Gemini AI)
सेल प्रेस की इस समीक्षा रिपोर्ट में उन जैविक तंत्रों (Biological Mechanisms) की विस्तार से व्याख्या की गई है जो यह बताते हैं कि कम प्रोटीन खाने से शरीर को क्या फायदे होते हैं:
(क) FGF21 हार्मोन का बढ़ना
जब भोजन में प्रोटीन कम होता है, तो शरीर में फाइब्रोब्लास्ट ग्रोथ फैक्टर 21 (FGF21) नामक हार्मोन का स्तर बढ़ जाता है।
यह हार्मोन शरीर की ऊर्जा खपत (Energy Expenditure) को बढ़ाता है।
यह खून में शर्करा (शुगर) के नियंत्रण को बेहतर बनाता है।
यह शरीर के अंदरूनी अंगों की सूजन (Inflammation) को घटाता है।
चूहों पर हुए प्रयोगों में अधिक FGF21 वाले चूहे सामान्य चूहों से ज़्यादा समय तक जीवित रहे। इंसानों में भी कम प्रोटीन खाने से यह हार्मोन बढ़ता है।
(ख) अमीनो एसिड का संतुलन
प्रोटीन छोटे-छोटे कणों से मिलकर बनता है जिन्हें 'अमीनो एसिड' (Amino Acids) कहते हैं।
रिसर्च टीम के मुताबिक, मेथियोनीन (Methionine), आइसोल्यूसीन (Isoleucine), और वैलीन (Valine) जैसे अमीनो एसिड का अधिक सेवन शरीर में विकास (Growth) से जुड़े रास्तों को ज़रूरत से ज़्यादा सक्रिय कर देता है।
जब ये तंत्र लगातार अत्यधिक सक्रिय रहते हैं, तो मोटापा, आंतरिक सूजन और असमय बुढ़ापे का खतरा काफी बढ़ जाता है।
रिसर्च में यह भी साफ किया गया है कि अधिक प्रोटीन के आंकड़े पूरी तरह गलत नहीं हैं, लेकिन उन्हें गलत तरीके से समझा जा रहा है।
मांसपेशियों का बचाव: कुछ अध्ययनों से पता चलता है कि अधिक प्रोटीन खाने से वजन घटाने में मदद मिलती है और बुजुर्गों की मांसपेशियाँ कमज़ोर नहीं होतीं।
नई गाइडलाइंस: हाल ही में अमेरिका में आहार संबंधी दिशानिर्देशों (Dietary Guidelines) को बदला गया था, जिसमें प्रतिदिन प्रति किलोग्राम वजन के हिसाब से 1.2 से 1.6 ग्राम प्रोटीन खाने की सलाह दी गई।
व्यायाम की शर्त: डडली लैमिंग और उनकी टीम का कहना है कि अधिक प्रोटीन का फायदा केवल तभी मिलता है जब व्यक्ति साथ में नियमित व्यायाम करे। यदि आप बिना कसरत किए सिर्फ अधिक प्रोटीन खा रहे हैं, तो यह फायदे की जगह नुकसान पहुँचा सकता है।
शोधकर्ताओं का मानना है कि 'सबके लिए एक ही नियम' (One Size Fits All) वाला फॉर्मूला पोषण में काम नहीं करता।
एथलीट / जिम जाने वाले उच्च (High) कसरत करने से प्रोटीन सीधे मांसपेशियों की मरम्मत में लगता है और बीमारियाँ नहीं पनपतीं।
गर्भवती महिलाएं उच्च (High) बच्चे के विकास और शारीरिक ज़रूरतों के लिए अधिक पोषण चाहिए।
कमज़ोर बुजुर्ग मध्यम से उच्च मांसपेशियों के नुकसान (Muscle Loss) को रोकने के लिए।
बैठकर काम करने वाले (Desk Job) सीमित / कम (Moderate to Low) अत्यधिक प्रोटीन चयापचय बिगाड़ सकता है और बुढ़ापे की प्रक्रिया तेज़ कर सकता है।
विस्कॉन्सिन-मैडिसन विश्वविद्यालय के शोधकर्ता डडली लैमिंग कहते हैं कि आहार संबंधी सलाह सिर्फ उम्र के आधार पर नहीं, बल्कि व्यक्ति के शारीरिक गतिविधि स्तर (Physical Activity Level) को देखकर दी जानी चाहिए।
यदि आपकी दिनचर्या में भागदौड़ या कसरत कम है, तो प्रोटीन सप्लीमेंट्स और हाई-प्रोटीन डाइट के पीछे भागने के बजाय संतुलित और सीमित प्रोटीन वाला भोजन लेना ही आपकी उम्र को लंबा और शरीर को निरोगी बना सकता है।
अध्ययन शीर्षक: वृद्धावस्था और दीर्घायु में प्रोटीन और अमीनो अम्ल प्रतिबंध के प्रमुख लक्षण (Hallmarks of protein and amino acid restriction in aging and longevity)।
लेखक/शोधकर्ता: बेली ए. नोपफ, डडली डब्ल्यू. लैमिंग (विस्कॉन्सिन-मैडिसन विश्वविद्यालय)।
सहयोग: नेशनल इंस्टीट्यूट ऑन एजिंग, विस्कॉन्सिन पार्टनरशिप प्रोग्राम।