Submarine Internet Cables Undersea: जब भी इंटरनेट की बात होती है, ज्यादातर लोगों के मन में मोबाइल टावर, वाई-फाई या सैटेलाइट की तस्वीर उभरती है। लेकिन वास्तविकता इससे अलग है। दुनिया के अधिकांश अंतरराष्ट्रीय इंटरनेट डेटा का आदान-प्रदान समुद्र की गहराई में बिछी सबमरीन फाइबर-ऑप्टिक केबलों के जरिए होता है। यही केबल महाद्वीपों को जोड़ती हैं और वीडियो कॉल, ऑनलाइन बैंकिंग, क्लाउड सेवाओं, अंतरराष्ट्रीय व्यापार और डिजिटल भुगतान जैसी सेवाओं को संभव बनाती हैं।
एक्सपर्ट्स बताते हैं, दुनियाभर के अंतरराष्ट्रीय डेटा ट्रैफिक का 95 प्रतिशत से ज्यादा हिस्सा समुद्र के अंदर बिछी फाइबर-ऑप्टिक केबलों से गुजरता है। सैटेलाइट की भूमिका महत्वपूर्ण है, लेकिन क्षमता, गति और लागत के मामले में समुद्री केबल आज भी वैश्विक इंटरनेट की रीढ़ मानी जाती हैं।
कैसे काम करती हैं ये केबल?
सबमरीन केबल सामान्य तार नहीं होतीं। इनके भीतर बेहद महीन ऑप्टिकल फाइबर होते हैं, जिनसे लेजर प्रकाश के रूप में डेटा भेजा जाता है। बाहर की कई सुरक्षात्मक परतें इन्हें समुद्री दबाव, नमी और बाहरी क्षति से बचाती हैं।
उथले समुद्री क्षेत्रों में इन्हें अक्सर समुद्र तल के नीचे दबाया भी जाता है, ताकि जहाजों के लंगर या मछली पकड़ने के उपकरणों से नुकसान न पहुंचे।
समुद्र के भीतर तय दूरी पर रिपीटर (Repeater) लगाए जाते हैं, जो प्रकाश संकेतों को मजबूत करते हैं ताकि हजारों किलोमीटर दूर तक डेटा बिना गुणवत्ता खोए पहुंच सके।
अगर केबल कट जाएं तो क्या होगा?
किसी एक केबल के क्षतिग्रस्त होने से सामान्य तौर पर पूरा इंटरनेट बंद नहीं होता, क्योंकि ज्यादातर देशों के पास कई वैकल्पिक मार्ग होते हैं। लेकिन यदि किसी क्षेत्र में सीमित कनेक्टिविटी हो और एक से अधिक महत्वपूर्ण केबल प्रभावित हो जाएं, तो इंटरनेट की गति कम हो सकती है। अंतरराष्ट्रीय संचार प्रभावित हो सकता है और बैंकिंग, क्लाउड सेवाओं तथा वित्तीय लेनदेन में रुकावट आ सकता है।
अंतरराष्ट्रीय केबलों को सबसे ज्यादा नुकसान प्राकृतिक घटनाओं से नहीं, बल्कि मछली पकड़ने के जाल और जहाजों के लंगर से होता है। भूकंप और समुद्र के अंदर होने वाले भूस्खलन भी कुछ मामलों में केबलों को नुकसान पहुंचा सकते हैं।
समुद्र में कितनी केबलें हैं?
दूरसंचार उद्योग के शोध मंच TeleGeography के मुताबिक, दुनिया भर में 600 से ज्यादा सक्रिय और निर्माणाधीन सबमरीन केबल प्रणालियां हैं। इनकी कुल लंबाई लगभग 15 लाख किलोमीटर से अधिक है। यह दूरी पृथ्वी की परिधि से कई गुना अधिक है।
भारत के लिए क्यों महत्वपूर्ण हैं ये केबल?
भारत तेजी से डिजिटल अर्थव्यवस्था की ओर बढ़ रहा है। UPI भुगतान, क्लाउड कंप्यूटिंग, आईटी सेवाएं, ऑनलाइन शिक्षा, ई-कॉमर्स और डेटा सेंटर, इन सभी की अंतरराष्ट्रीय कनेक्टिविटी काफी हद तक समुद्री केबलों पर निर्भर करती है।
भारत के प्रमुख समुद्री केबल लैंडिंग स्टेशन मुंबई, चेन्नई, कोच्चि और तूतीकोरिन जैसे तटीय शहरों में स्थित हैं। यहीं से अंतरराष्ट्रीय नेटवर्क देशभर में पहुंचता है।
क्या सैटेलाइट इंटरनेट इनकी जगह ले सकता है?
लो-अर्थ ऑर्बिट (LEO) सैटेलाइट इंटरनेट दूरदराज क्षेत्रों तक इंटरनेट पहुंचाने में उपयोगी साबित हो रहा है। लेकिन विशेषज्ञ मानते हैं कि फिलहाल वह समुद्री फाइबर-ऑप्टिक केबलों का पूर्ण विकल्प नहीं है। कारण यह है कि फाइबर केबल अधिक क्षमता, कम विलंब (Low Latency) और अपेक्षाकृत कम लागत पर बड़ी मात्रा में डेटा भेज सकती हैं। इसलिए भविष्य में भी सैटेलाइट और समुद्री केबल एक-दूसरे के पूरक बने रहने की संभावना है।
डिजिटल सुरक्षा का नया आयाम
हाल के वर्षों में समुद्री अवसंरचना (Undersea Infrastructure) की सुरक्षा पर दुनिया का ध्यान बढ़ा है। कई देशों ने समुद्र के भीतर मौजूद ऊर्जा पाइपलाइन और संचार केबलों की सुरक्षा को राष्ट्रीय सुरक्षा से जोड़कर देखना शुरू किया है। विशेषज्ञों का मानना है कि बढ़ती डिजिटल निर्भरता के दौर में इन नेटवर्कों की निगरानी और सुरक्षा पहले से अधिक महत्वपूर्ण हो गई है।
- अंतरराष्ट्रीय इंटरनेट डेटा का 95% से अधिक हिस्सा समुद्री फाइबर-ऑप्टिक केबलों से गुजरता है।
- दुनिया में 600 से अधिक सक्रिय या निर्माणाधीन सबमरीन केबल सिस्टम हैं।
- कुल लंबाई लगभग 15 लाख किलोमीटर से अधिक है।
- जहाजों के लंगर और मछली पकड़ने की गतिविधियां केबल क्षति के प्रमुख कारण हैं।
- भारत के प्रमुख केबल लैंडिंग स्टेशन मुंबई, चेन्नई, कोच्चि और तूतीकोरिन में हैं।
- कहना होगा कि सैटेलाइट इंटरनेट महत्वपूर्ण है, लेकिन फिलहाल समुद्री केबलों का पूर्ण विकल्प नहीं माना जाता।
दुनिया का इंटरनेट किस रास्ते चलता है?
- 95%+ डेटा- अंतरराष्ट्रीय इंटरनेट ट्रैफिक का अधिकांश हिस्सा समुद्री केबलों से गुजरता है।
- सैटेलाइट नहीं, फाइबर- बड़ी मात्रा में डेटा भेजने के लिए फाइबर-ऑप्टिक केबल अधिक तेज और किफायती हैं।
समुद्र में कितनी केबलें हैं?
- 600+ केबल सिस्टम- दुनिया में सक्रिय और निर्माणाधीन सबमरीन केबल सिस्टम।
- 15 लाख किलोमीटर से ज्यादा लंबाई- इतनी लंबी केबलें हैं कि पृथ्वी की परिधि से कई गुना अधिक दूरी तय करती हैं।
- घटनाएं- जहाजों के लंगर और मछली पकड़ने के उपकरण केबल क्षति के प्रमुख कारण माने जाते हैं।
- भूकंप भी- समुद्र के अंदर भूकंप और भूस्खलन से भी केबल टूट सकती हैं।
- भारत में प्रमुख लैंडिंग स्टेशन- मुंबई, चेन्नई, कोच्चि और तूतीकोरिन।
- डिजिटल अर्थव्यवस्था की रीढ़- UPI, क्लाउड, आईटी सेवाएं और अंतरराष्ट्रीय डेटा ट्रैफिक इन्हीं कनेक्शनों पर निर्भर हैं।
केबल कितनी गहराई में होती हैं?
- 8,000 मीटर तक- कुछ समुद्री मार्गों में केबल कई हजार मीटर गहराई तक बिछाई जाती हैं।
- उथले समुद्र में दफन- तटीय इलाकों में इन्हें समुद्र तल के नीचे दबाया जाता है, ताकि नुकसान कम हो।
एक केबल में कितनी क्षमता?
- सैकड़ों Tbps तक- आधुनिक सबमरीन केबल प्रति सेकंड दर्जनों से लेकर सैकड़ों टेराबिट डेटा वहन कर सकती हैं।
- एक साथ करोड़ों कनेक्शन- यही क्षमता वैश्विक वीडियो स्ट्रीमिंग और क्लाउड सेवाओं को संभव बनाती है।
- टेलीकॉम + टेक कंपनियां- वैश्विक दूरसंचार कंपनियां और बड़ी टेक कंपनियां मिलकर निवेश करती हैं।
- मरम्मत के लिए विशेष जहाज- केबल टूटने पर विशेष Cable Repair Ships समुद्र में जाकर उसकी मरम्मत करते हैं।
कहां-कहां बिछी हैं समुद्र के नीचे इंटरनेट केबलें?
- अटलांटिक महासागर (Atlantic Ocean)यूरोप और उत्तरी अमेरिका के बीच सबसे व्यस्त इंटरनेट मार्ग। दुनिया की सबसे अधिक डेटा क्षमता वाली कई केबलें यहीं हैं।
- प्रशांत महासागर (Pacific Ocean)एशिया, अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया को जोड़ने वाली लंबी सबमरीन केबलों का प्रमुख क्षेत्र।
- हिंद महासागर (Indian Ocean)भारत, श्रीलंका, मालदीव, मध्य पूर्व, अफ्रीका और दक्षिण-पूर्व एशिया को जोड़ने वाली महत्वपूर्ण केबलें यहीं से गुजरती हैं।
- भूमध्य सागर (Mediterranean Sea)यूरोप, उत्तरी अफ्रीका और मध्य पूर्व के बीच डिजिटल कनेक्टिविटी का प्रमुख मार्ग।
- लाल सागर (Red Sea)एशिया और यूरोप के बीच जाने वाली कई अंतरराष्ट्रीय इंटरनेट केबलें इस संकरे समुद्री मार्ग से होकर गुजरती हैं, इसलिए यह रणनीतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण क्षेत्र माना जाता है।
- अरब सागर (Arabian Sea)भारत के मुंबई और पश्चिमी तट को मध्य पूर्व, अफ्रीका और यूरोप से जोड़ने वाली कई प्रमुख केबलें यहां से गुजरती हैं।
- बंगाल की खाड़ी (Bay of Bengal)चेन्नई सहित भारत के पूर्वी तट को सिंगापुर, मलेशिया और दक्षिण-पूर्व एशिया से जोड़ने वाली केबलों का अहम मार्ग।
भारत से जुड़े प्रमुख समुद्री मार्ग
- मुंबई- अरब सागर - मध्य पूर्व - यूरोप
- चेन्नई- बंगाल की खाड़ी - सिंगापुर - पूर्वी एशिया
- कोच्चि और तूतीकोरिन - हिंद महासागर - दक्षिण-पूर्व एशिया - पश्चिम एशिया
- दुनिया की कोई एक'मुख्य इंटरनेट केबल' नहीं है- सैकड़ों सबमरीन केबलें मिलकर एक विशाल वैश्विक नेटवर्क बनाती हैं।
- यदि किसी एक केबल में खराबी आ जाए- अगर ऐसा हो तो डेटा अक्सर दूसरी उपलब्ध केबलों के रास्ते भेज दिया जाता है, इसलिए अधिकांश मामलों में इंटरनेट पूरी तरह बंद नहीं होता।
- केबल का व्यास- गहरे समुद्र में कई केबल लगभग बगीचे की पाइप जितनी मोटी होती हैं।
- लेजर से चलता है डेटा- बिजली नहीं, बल्कि प्रकाश (Light Pulses) के जरिए सूचनाएं भेजी जाती हैं।
डिजिटल युग में इंटरनेट केवल मोबाइल टावरों या उपग्रहों पर नहीं चलता। समुद्र की गहराइयों में बिछा फाइबर-ऑप्टिक नेटवर्क वैश्विक डिजिटल अर्थव्यवस्था की आधारभूत संरचना है। जैसे-जैसे ऑनलाइन सेवाओं, क्लाउड कंप्यूटिंग और कृत्रिम बुद्धिमत्ता का उपयोग बढ़ेगा, इन समुद्री केबलों का महत्व भी बढ़ता जाएगा। इसलिए भविष्य की डिजिटल दुनिया को समझने के लिए समुद्र के नीचे फैले इस अदृश्य नेटवर्क को समझना भी उतना ही जरूरी है।