
US Nuclear Policy: दुनिया की तीन सबसे बड़ी सैन्य शक्तियों अमेरिका, रूस और चीन के बीच रणनीतिक प्रतिस्पर्धा लगातार तेज हो रही है। इसी बीच अमेरिका में यह चर्चा शुरू हुई है कि क्या उसकी मौजूदा परमाणु नीति बदलते हालात के लिए पर्याप्त है, या फिर उसे नई रणनीति अपनानी चाहिए। रिपोर्टों के मुताबिक, पेंटागन के नीति प्रमुख एल्ब्रिज कोल्बी (Elbridge Colby) की निगरानी में यह नई रणनीति तैयार की जा रही है, जिसमें रूस और चीन की बढ़ती सैन्य क्षमताओं तथा कम दूरी के सामरिक (टैक्टिकल) परमाणु हथियारों के बढ़ते महत्व के मद्देनजर अमेरिका को अपनी परमाणु नीति में बदलाव करना चाहिए या नहीं, इस पर विचार हो रहा है। हालांकि, अभी तक किसी नई नीति की आधिकारिक घोषणा नहीं हुई है।
टैक्टिकल (Tactical) परमाणु हथियार अपेक्षाकृत कम क्षमता वाले परमाणु हथियार होते हैं। इन्हें सीमित सैन्य लक्ष्यों या युद्धक्षेत्र में इस्तेमाल के लिए विकसित किया जाता है। इसके विपरीत, रणनीतिक (Strategic) परमाणु हथियार लंबी दूरी तक मार करने और बड़े शहरों या महत्वपूर्ण सैन्य ठिकानों को निशाना बनाने के लिए बनाए जाते हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि रूस अपने परमाणु शस्त्रागार का आधुनिकीकरण कर रहा है, जबकि चीन भी पिछले कुछ वर्षों में अपने परमाणु हथियारों और मिसाइल क्षमता का तेजी से विस्तार कर रहा है। ऐसे में अमेरिका अपनी प्रतिरोध क्षमता को भविष्य की चुनौतियों के अनुरूप बनाए रखना चाहता है। गौरतलब है कि यह समीक्षा New START संधि की समाप्ति के करीब छह महीने बाद सामने आई है, यह अमेरिका (US) और रूस के बीच सामरिक परमाणु शस्त्रागार को सीमित करने वाला आखिरी बचा हुआ द्विपक्षीय समझौता था, जो फरवरी 2026 में खत्म हो गया।
एक्सपर्ट्स कहते हैं नहीं, किसी रणनीति की समीक्षा का अर्थ यह नहीं होता कि युद्ध तय है। परमाणु नीति का मुख्य उद्देश्य विरोधी देशों को हमला करने से रोकना (Deterrence) और शक्ति संतुलन बनाए रखना होता है। अधिकांश रक्षा विशेषज्ञ मानते हैं कि परमाणु हथियारों का सबसे बड़ा उद्देश्य उनका उपयोग नहीं, बल्कि उनके इस्तेमाल की नौबत ही न आने देना है।
यदि अमेरिका भविष्य में अपनी परमाणु रणनीति में बदलाव करता है, तो इसका असर वैश्विक सुरक्षा, हथियार नियंत्रण समझौतों और महाशक्तियों के बीच रणनीतिक संतुलन पर पड़ सकता है। ऐसे किसी भी कदम पर रूस, चीन और अन्य परमाणु शक्तियों की प्रतिक्रिया भी महत्वपूर्ण होगी।
अमेरिकी रक्षा मंत्रालय (पेंटागन) की नई परमाणु रणनीति की यह समीक्षा पेंटागन के नीति प्रमुख एल्ब्रिज कोल्बी (Elbridge Colby) की निगरानी में की जा रही है। रिपोर्ट्स बताती हैं कि यह वर्गीकृत (classified) समीक्षा खासतौर पर उन हालात को ध्यान में रखकर तैयार की जा रही है, जिनमें अमेरिका के सहयोगी देश किसी क्षेत्रीय संघर्ष के दौरान रूस या चीन के हमले का शिकार हो सकते हैं। इसका मकसद अमेरिकी राष्ट्रपति को परमाणु विकल्पों की एक व्यापक रेंज देना है, ताकि प्रतिरोध क्षमता (deterrence) और मजबूत हो सके।
दरअसल यह समीक्षा एक अहम मोड़ पर आई है। अमेरिका और रूस के बीच सामरिक परमाणु शस्त्रागार को सीमित करने वाली आखिरी बड़ी द्विपक्षीय संधि, New START, फरवरी 2026 की शुरुआत में समाप्त हो चुकी है। इस संधि की मियाद खत्म होने के करीब छह महीने बाद यह नई रणनीति सामने आई है, जो दिखाता है कि अमेरिका अब बिना किसी संधि-बाध्यता के अपनी परमाणु नीति को नए सिरे से आकार दे रहा है।
रिपोर्ट्स के मुताबिक, रूस ने अपने थियेटर (क्षेत्रीय) और टैक्टिकल परमाणु शस्त्रागार का बड़े पैमाने पर आधुनिकीकरण किया है। कुछ अनुमानों के मुताबिक, रूस के पास आज करीब 2,000 आधुनिक जमीन, समुद्र और हवा से दागे जाने वाले परमाणु सिस्टम हैं। ये अमेरिका के मुकाबले करीब 10:1 की संख्यात्मक बढ़त बताई जा रही है। वहीं चीन ने पिछले कुछ वर्षों में अपना परमाणु त्रिकोण (nuclear triad) यानी जमीन, समुद्र और हवा, तीनों माध्यमों से परमाणु हमला करने की क्षमता विकसित कर ली है, साथ ही कम क्षमता वाले (लो-यील्ड) परमाणु हथियार और दोहरे इस्तेमाल वाली मिसाइलें भी तैनात कर रहा है।
इस बीच अमेरिका, रूस और चीन, तीनों देशों के परमाणु शस्त्रागार को शामिल करते हुए एक त्रिपक्षीय (trilateral) हथियार नियंत्रण समझौते की संभावना पर भी बातचीत चल रही है, हालांकि चीन अब तक ऐसी किसी वार्ता में शामिल होने से इनकार करता रहा है। अमेरिकी अधिकारियों का तर्क है कि जहां अमेरिका ने पुराने समझौतों का पालन किया, वहीं रूस ने उनका उल्लंघन किया और चीन बिना किसी समझौते के अपने शस्त्रागार का विस्तार करता रहा। यही असंतुलन नई रणनीति की बड़ी वजह बन रहा है।
फिलहाल अमेरिका केवल अपनी सुरक्षा रणनीति की समीक्षा कर रहा है। किसी नई परमाणु नीति या टैक्टिकल परमाणु हथियारों के व्यापक विस्तार पर अंतिम फैसला घोषित नहीं किया गया है। इसलिए इस पूरे घटनाक्रम को संभावित रणनीतिक बदलाव के रूप में देखना चाहिए, न कि तत्काल नीति परिवर्तन के रूप में।