
जोरावर सिंह बारहठ राजस्थान के उन क्रांतिकारियों में गिने जाते हैं, जिन्होंने ब्रिटिश शासन के खिलाफ सशस्त्र क्रांतिकारी गतिविधियों में सक्रिय भूमिका निभाई। इतिहास के अनुसार 23 दिसंबर 1912 को दिल्ली में वायसराय लॉर्ड हार्डिंग पर हुए बम हमले में उनकी भूमिका ने अंग्रेजी सरकार को हिला दिया था। इसके बाद वे गिरफ्तारी से बचते हुए लंबे समय तक साधु के वेश में रहे और ‘अमरदास बैरागी’ नाम से जीवन बिताया।
शाहपुरा के बारहठ परिवार ने राजस्थान के स्वतंत्रता आंदोलन में असाधारण भूमिका निभाई। इस परिवार में ठाकुर कृष्ण सिंह बारहठ के पुत्र केसरी सिंह बारहठ और जोरावर सिंह बारहठ तथा केसरी सिंह के पुत्र कुंवर प्रताप सिंह बारहठ ब्रिटिश सत्ता के विरोध में सक्रिय रहे। राजस्थान पर्यटन विभाग भी शाहपुरा को इन तीनों प्रमुख स्वतंत्रता सेनानियों से जोड़ता है।
जोरावर सिंह का जन्म 12 सितंबर 1883 को शाहपुरा रियासत के देवपुरा क्षेत्र में हुआ था। कुछ स्रोत उनके जन्मस्थान के संबंध में अलग विवरण देते हैं, इसलिए देवखेड़ा गांव को निश्चित रूप से लिखने के बजाय शाहपुरा क्षेत्र का उल्लेख अधिक सुरक्षित है। उनका परिवार समृद्ध और प्रभावशाली था, लेकिन जोरावर सिंह ने आराम और राजसी जीवन के बजाय क्रांतिकारी रास्ता चुना।
उनकी प्रारंभिक शिक्षा उदयपुर में और आगे की शिक्षा जोधपुर में होने का उल्लेख मिलता है। बाद में वे जोधपुर दरबार से भी जुड़े और इसी दौर में उनका संपर्क उन लोगों से हुआ, जो अंग्रेजी शासन के खिलाफ क्रांतिकारी गतिविधियों में सक्रिय थे।
बीसवीं सदी के शुरुआती वर्षों में देश के कई हिस्सों में सशस्त्र क्रांतिकारी गतिविधियां तेज हो रही थीं। राजस्थान भी इससे अछूता नहीं था। जोरावर सिंह का संपर्क रासबिहारी बोस और मास्टर अमीरचंद जैसे क्रांतिकारियों से हुआ। बारहठ परिवार की क्रांतिकारी गतिविधियों का संबंध राजस्थान से बाहर बने व्यापक क्रांतिकारी नेटवर्क से भी जुड़ गया था। इसी नेटवर्क में आगे चलकर ब्रिटिश भारत के वायसराय लॉर्ड हार्डिंग को निशाना बनाने की योजना बनी।
23 दिसंबर 1912 भारतीय क्रांतिकारी इतिहास की महत्वपूर्ण तारीख है। उस दिन राजधानी को कलकत्ता से दिल्ली स्थानांतरित किए जाने के बाद वायसराय लॉर्ड हार्डिंग का दिल्ली में भव्य जुलूस निकाला जा रहा था।
जुलूस चांदनी चौक से गुजर रहा था। इसी दौरान क्रांतिकारियों ने वायसराय पर बम फेंका। इस घटना में हार्डिंग घायल हुए और उनका एक अंगरक्षक मारा गया। राजस्थान सरकार के प्रकाशन सुजस में भी जोरावर सिंह और उनके भतीजे प्रताप सिंह की इस कार्रवाई में सक्रिय भूमिका का उल्लेख है।
इस घटना को इतिहास में दिल्ली षड्यंत्र केस से जोड़ा जाता है। अलग-अलग ऐतिहासिक विवरणों में बम फेंकने वाले क्रांतिकारियों की भूमिका के बारे में कुछ अंतर मिलता है, लेकिन उपलब्ध राजस्थान संबंधी सरकारी सामग्री जोरावर सिंह और प्रताप सिंह की सक्रिय भागीदारी की पुष्टि करती है।
हमले के बाद ब्रिटिश सरकार ने क्रांतिकारियों को पकड़ने के लिए व्यापक अभियान शुरू किया। जोरावर सिंह गिरफ्तारी से बच निकले। इसके बाद उनका जीवन भूमिगत क्रांतिकारी के रूप में बीता।
वे साधु का भेस धारण कर ‘अमरदास बैरागी’ नाम से रहने लगे। यही वह पहचान थी, जिसने उन्हें लंबे समय तक ब्रिटिश पुलिस की नजरों से बचाए रखा। राजस्थान की प्रतियोगी परीक्षाओं और सरकारी अध्ययन सामग्री में भी अमरदास बैरागी नाम को जोरावर सिंह बारहठ से जोड़ा गया है।
उनका यह गुप्त जीवन केवल कुछ वर्षों का नहीं था। उन्होंने जीवन के अंतिम दशकों का बड़ा हिस्सा इसी पहचान के साथ बिताया। यही वजह है कि राजस्थान के स्वतंत्रता आंदोलन के इतिहास में उनका नाम असाधारण साहस और गुप्त क्रांतिकारी गतिविधियों के प्रतीक के रूप में सामने आता है।
जोरावर सिंह के साथ उनके भतीजे कुंवर प्रताप सिंह बारहठ भी क्रांतिकारी गतिविधियों में सक्रिय थे। प्रताप सिंह, जोरावर सिंह के पुत्र नहीं, बल्कि उनके भतीजे और केसरी सिंह बारहठ के पुत्र थे।
प्रताप सिंह बाद में बनारस षड्यंत्र केस में गिरफ्तार किए गए। जेल में उन्हें कठोर यातनाएं दी गईं, लेकिन उन्होंने अपने साथियों के बारे में जानकारी देने से इनकार किया। 7 मई 1918 को बरेली जेल में उनका निधन हुआ।
इस तरह बारहठ परिवार की तीन पीढ़ियों ने ब्रिटिश शासन के खिलाफ अलग-अलग स्तर पर संघर्ष किया। केसरी सिंह ने साहित्य, राजनीतिक चेतना और क्रांतिकारी संगठन के जरिये आवाज उठाई, जोरावर सिंह भूमिगत सशस्त्र क्रांति से जुड़े और प्रताप सिंह ने जेल में यातनाएं सहते हुए अपने साथियों के नाम बताने से इनकार किया।
इतिहास के अनुसार 1937 में भारत के कई प्रांतों में कांग्रेस की सरकारें बनने के बाद जोरावर सिंह के खिलाफ लंबित मामलों और वारंट को समाप्त कराने के प्रयास किए गए। उपलब्ध ऐतिहासिक विवरणों के अनुसार केसरी सिंह और अन्य नेताओं ने इस दिशा में प्रयास किए। लेकिन इसी दौरान जोरावर सिंह गंभीर रूप से बीमार पड़ गए। उन्हें निमोनिया हो गया और 17 अक्टूबर 1939 को मध्यप्रदेश के सिटामऊ क्षेत्र के एकलगढ़ में उनका निधन हो गया। अहम बात यह रही कि जिस क्रांतिकारी को अंग्रेज दशकों तक तलाशते रहे, वह अंत तक गिरफ्तार नहीं हुआ।
जोरावर सिंह बारहठ की कहानी केवल एक बम हमले या एक क्रांतिकारी घटना की कहानी नहीं है। यह उस दौर की कहानी है जब राजस्थान के एक प्रभावशाली परिवार ने व्यक्तिगत सुख-सुविधाओं से ऊपर देश की स्वतंत्रता को रखा।
शाहपुरा में बारहठ परिवार की स्मृति आज भी जीवित है। राजस्थान पर्यटन विभाग के अनुसार यहां त्रिमूर्ति स्मारक और बारहठ परिवार से जुड़ी ऐतिहासिक विरासत मौजूद है।
23 दिसंबर को बारहठ परिवार की क्रांतिकारी भूमिका की स्मृति में कार्यक्रम आयोजित किए जाने का भी उल्लेख मिलता है।
जोरावर सिंह बारहठ का जीवन हमें यह बताता है कि स्वतंत्रता आंदोलन केवल बड़े शहरों या प्रसिद्ध नेताओं तक सीमित नहीं था। राजस्थान के शाहपुरा जैसे क्षेत्रों से निकले क्रांतिकारियों ने भी राष्ट्रीय आंदोलन की दिशा को प्रभावित किया।
उन्होंने वैभव छोड़कर संघर्ष चुना, पहचान छिपाकर वर्षों तक जीवन बिताया और गिरफ्तारी के भय के बावजूद अपने उद्देश्य से पीछे नहीं हटे। उनके साथ केसरी सिंह और प्रताप सिंह का बलिदान जुड़ा हुआ है।
इसलिए उन्हें याद करना केवल अतीत को दोहराना नहीं, बल्कि उस पीढ़ी के साहस को समझना है जिसने स्वतंत्रता की कीमत अपने जीवन से चुकाई।
जोरावर सिंह बारहठ की कहानी राजस्थान के उस क्रांतिकारी इतिहास का महत्वपूर्ण अध्याय है, जिसमें साहस, त्याग, गोपनीय संघर्ष और देश के लिए समर्पण एक साथ दिखाई देते हैं।