
नई दिल्ली। कर्नाटक विधानसभा चुनाव २०१८ के नतीजे मंगलवार को आएंगे। इन नतीजों को लेकर पूरे देश में गहमागहमी का माहौल है। इन नतीजों का असर उत्तर प्रदेश के राजनीतिक समीकरणों पर भी पड़ सकता है। दरअसल, रूझानों के मद्देनजर किसी को पूर्ण बहुमत मिलने के आसार नहीं लग रहे। यदि ऐसा हुआ तो जनता दल (सेक्युलर) निर्णायक भूमिका में आ जाएगी। ऐसी स्थिति में जेडीएस के साथ गठबंधन में चुनाव लड़ रही बीएसपी की भूमिका अहम होगी, क्योंकि जेडीएस यदि बीजेपी का समर्थन करती है तो बीएसपी के लिए धर्मसंकट की स्थिति हो जाएगी। यदि गठबंधन ने बीजेपी को समर्थन दिया तो उत्तर प्रदेश में लोकसभा चुनाव २०१९ के लिए बनी बीएसपी और समाजवादी पार्टी की जुगलबंदी मुश्किल में आ जाएगी, क्योंकि वहां बीएसपी फिलहाल बीजेपी की कट्टर विरोधी है।
सपा को माया पर भरोसा
इधर समाजवादी पार्टी को भरोसा है कि मायावती उत्तर प्रदेश की कीमत पर कर्नाटक में बीजेपी-जेडीएस गठबंधन का हिस्सा नहीं बनेंगी। उनका मानना है कि बीएसपी के लिए उत्तर प्रदेश सबसे ज्यादा जरूरी है जबकि कर्नाटक में ऐसा कुछ नहीं जिससे उम्मीद की जाए कि वे बीजेपी से हाथ मिलाएगी। हालांकि शुगर मिल बिक्री में अनियमितताओं को लेकर मायावती पर सीबीआई की नजरें हैं। ऐसे में मायावती के बीजेपी से हाथ मिलाने की संभावनाओं को भी खारिज नहीं किया जा सकता।
जेडीएस का 'आजाद' रुख बरकरार
गौरतलब है कि अब तक जेडीएस अपने उस रुख पर कायम है जिसमें कांग्रेस और बीजेपी को समर्थन नहीं देने की बात कही गई है। लेकिन अपनी पार्टी के दलित नेता को मुख्यमंत्री बनाने के लिए जेडीएस किसी से भी समझौता कर सकती है। उधर कांग्रेस ने दलित नेता को मुख्यमंत्री बनाने की बात कहकर गठबंधन की संभावनाएं बढ़ा दी है, हालांकि देवेगौड़ा कांग्रेस से हाथ मिलाएंगे इसकी संभावनाएं कम लग रही हैं। दरअसल, बीएसपी गठबंधन में २० सीटों पर चुनाव लड़ रही हैं, लेकिन करीबी नतीजों में कुछ सीटें भी निर्णायक भूमिका निभा सकती हैं।