
प्रतापगढ़. सीतामाता अभयारण्य में कॉमन ट्री फ्रॉग और पेंटेड कालौला जैसी दुर्लभ मेंढक प्रजातियों की मौजूदगी सामने आई है। इन प्रजातियों का यहां पाया जाना अभयारण्य की समृद्ध जैव विविधता को दर्शाता है। राजस्थान में टोड और मेंढकों की सबसे अधिक प्रजातियां सीतामाता अभयारण्य और इसके आसपास के क्षेत्र में मिलती हैं। रिटायर्ड असिस्टेंट डायरेक्टर ऑफ फॉरेस्ट डॉ. सतीश के. शर्मा के अनुसार, कॉमन ट्री फ्रॉग और पेंटेड कालौला की मौजूदगी प्रदेश के किसी अन्य क्षेत्र में सामने नहीं आई है। इन दोनों दुर्लभ प्रजातियों का सीतामाता अभयारण्य में पाया जाना इसे राजस्थान में मेंढकों की विविधता के लिहाज से खास बनाता है।
पेंटेड कालौला मध्यम आकार का मेंढक है, जिसकी पीठ का रंग गहरा चॉकलेट या महोगनी भूरा होता है। इसके शरीर के दोनों किनारों पर तांबे जैसे भूरे, क्रीम या गुलाबी-नारंगी रंग की मोटी पट्टियां पाई जाती हैं। इसका शरीर गोल-मटोल, सिर छोटा और थूथन छोटा व गोल होता है। पिछले पैरों में कुदाल जैसी कठोर संरचना होती है, जिसकी मदद से यह जमीन में गड्ढा खोदकर खुद को छिपा लेता है। यह पेड़ों और दीवारों पर भी चढ़ने में सक्षम है। पेंटेड कालौला मुख्य रूप से रात में सक्रिय रहता है, जबकि दिन के समय पत्तों के नीचे या जमीन में छिपा रहता है।
'पेंटेड फ्रॉग' को राजस्थान का सबसे खूबसूरत मेंढक बताया जाता है। इसकी पीठ, हाथों और पैरों पर काले-भूरे और चमकीले लाल रंग के निशान होते हैं। वहीं, 'ट्री फ्रॉग' का रंग फीका भूरा होता है, लेकिन इसे राज्य का आकर्षक मेंढक माना जाता है। ट्री फ्रॉग और बुश फ्रॉग 'राकोफोरिडी' परिवार से संबंधित हैं। नमी वाली जमीन, जलाशय, झाड़ियों और पेड़ों पर विभिन्न प्रजातियों के मेंढक पाए जाते हैं।
वन्यजीव विशेषज्ञ मंगल मेहता के अनुसार, कॉमन ट्री फ्रॉग सीतामाता अभयारण्य और आसपास के इलाकों में पाया जाता है। यह पानी के बजाय पेड़ों पर रहना पसंद करता है। इसकी उंगलियों के सिरों पर चिपचिपे और चौड़े डिस्क होते हैं, जिनकी मदद से यह पेड़ों के तनों और दीवारों जैसी सीधी सतहों पर चढ़ सकता है।