प्रयागराज

इलाहाबाद हाईकोर्ट के जस्टिस यशवंत वर्मा ने दिया इस्तीफा, छापे में मिले थे ‘500 के जले हुए नोट’

Justice Yashwant Verma Resigns: इलाहाबाद हाईकोर्ट के जस्टिस यशवंत वर्मा ने इस्तीफा दे दिया है। छापे के दौरान 500 के जले हुए नोट मिलने के बाद विवाद बढ़ा था।

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इलाहाबाद हाईकोर्ट के जस्टिस यशवंत वर्मा ने दिया इस्तीफा।

Justice Yashwant Verma Resigns: जस्टिस यशवंत वर्मा (Justice Yashwant Verma) ने अपने पद से इस्तीफा देते हुए राष्ट्रपति को त्यागपत्र सौंप दिया है। उनके खिलाफ कथित कैश कांड सामने आने के बाद यह बड़ा घटनाक्रम हुआ है। इस मामले को लेकर पहले से ही जांच चल रही थी और उनके खिलाफ संसदीय कार्रवाई की भी संभावना जताई जा रही थी।

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कैश कांड के बाद बढ़ा विवाद

14 मार्च 2025 को दिल्ली (Delhi) स्थित उनके आवास पर आग लगने की घटना के दौरान 500-500 रुपये के नोटों के जले हुए बंडल मिलने का मामला सामने आया था। इस घटना के बाद न्यायिक और राजनीतिक गलियारों में हलचल मच गई थी। इसी विवाद के चलते उन्हें दिल्ली हाई कोर्ट (Delhi High Court) से स्थानांतरित कर इलाहाबाद हाई कोर्ट (Allahabad High Court) भेज दिया गया।

ट्रांसफर के बाद भी नहीं मिली जिम्मेदारी

ट्रांसफर के बाद उन्होंने 5 अप्रैल 2025 को इलाहाबाद हाईकोर्ट में शपथ ली, लेकिन उन्हें कोई न्यायिक कार्य नहीं सौंपा गया। जब तक उनके खिलाफ चल रही इन-हाउस जांच पूरी नहीं हो जाती, उन्हें न्यायिक जिम्मेदारियों से दूर रखा गया था।

महाभियोग प्रस्ताव को दी थी चुनौती

कैश कांड के बाद जस्टिस वर्मा ने अपने खिलाफ लाए गए महाभियोग प्रस्ताव को चुनौती दी थी। उनका कहना था कि संसद के दोनों सदनों में प्रस्ताव लाया गया, लेकिन राज्यसभा (Rajya Sabha) ने इसे मंजूरी नहीं दी। इसके बावजूद लोक सभा (Lok Sabha) ने अकेले जांच समिति का गठन कर दिया, जिसे उन्होंने नियमों के खिलाफ बताया।

सुप्रीम कोर्ट में पहुंचा मामला

इस पूरे विवाद पर मामला सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court of India) तक पहुंचा। 6 जनवरी को सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि जांच समिति के गठन में कुछ खामियां नजर आती हैं। हालांकि कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि यह देखा जाएगा कि क्या ये खामियां इतनी गंभीर हैं कि पूरी प्रक्रिया को रद्द किया जाए।

फैसले पर सुप्रीम कोर्ट ने सुरक्षित रखा निर्णय

8 जनवरी को सुप्रीम कोर्ट ने जस्टिस वर्मा की याचिका पर फैसला सुरक्षित रख लिया। जस्टिस दीपांकर दत्ता (Justice Dipankar Datta) और जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा (Justice Satish Chandra Sharma) की बेंच ने दो दिन की सुनवाई के बाद यह निर्णय लिया। हालांकि, कोर्ट ने जस्टिस वर्मा को संसदीय समिति के सामने जवाब दाखिल करने के लिए अतिरिक्त समय देने से इनकार कर दिया।

संसदीय जांच पैनल पर उठे सवाल

7 जनवरी को सुप्रीम कोर्ट ने टिप्पणी की थी कि लोकसभा स्पीकर द्वारा गठित संसदीय जांच पैनल में कुछ खामियां हैं। कोर्ट ने कहा कि जजेज इन्क्वायरी एक्ट (Judges Inquiry Act) के तहत लोकसभा स्पीकर को यह अधिकार है कि वह भ्रष्टाचार के आरोपों की जांच के लिए समिति गठित कर सकते हैं, भले ही राज्यसभा में प्रस्ताव खारिज हो चुका हो।

लोकसभा स्पीकर को जारी हुआ नोटिस

इससे पहले 16 दिसंबर 2025 को सुप्रीम कोर्ट ने ओम बिरला (Om Birlaध को नोटिस जारी किया था। कोर्ट ने लोकसभा स्पीकर कार्यालय और संसद के दोनों सदनों के महासचिवों से जवाब मांगा था। सुनवाई के दौरान जस्टिस दत्ता ने सवाल उठाया था कि जब राज्यसभा में प्रस्ताव खारिज हो चुका था, तब लोकसभा में समिति का गठन कैसे किया गया।

राजनीतिक और न्यायिक हलकों में चर्चा

इस पूरे घटनाक्रम ने न्यायपालिका और संसद के अधिकारों को लेकर बहस छेड़ दी है। जस्टिस यशवंत वर्मा का इस्तीफा इस मामले में एक बड़ा मोड़ माना जा रहा है, जबकि आगे की कार्रवाई और जांच पर सभी की नजरें टिकी हुई हैं।

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