
शिक्षिका की बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका पर कोर्ट का फैसला। फोटो सोर्स-Ai
Child Custody Case Prayagraj:प्रयागराज स्थित इलाहाबाद हाईकोर्ट में एक पारिवारिक विवाद की सुनवाई उस समय बेहद भावुक मोड़ पर पहुंच गई, जब अदालत को 2 छोटे भाई-बहनों की अभिरक्षा अलग-अलग माता-पिता को सौंपने का फैसला सुनाना पड़ा। न्यायालय ने बच्चों के सर्वोत्तम हित को प्राथमिकता देते हुए यह व्यवस्था तय की कि ढाई साल की बेटी सप्ताह के शुरुआती 3 दिन पिता के साथ रहेगी, जबकि 6 साल के बेटा सप्ताहांत ((Weekend) )और स्कूल की छुट्टियों में मां के साथ रहेगा।
यह आदेश न्यायमूर्ति संदीप जैन की एकलपीठ ने मेरठ निवासी एक सरकारी शिक्षिका द्वारा दायर बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका पर सुनवाई के दौरान दिया।
करीब 2 घंटे तक चली सुनवाई के दौरान अदालत ने पति-पत्नी के बीच सुलह कराने का भी प्रयास किया। न्यायालय ने दोनों पक्षों से दोबारा साथ रहने की संभावना तलाशने को कहा, लेकिन दोनों अपने-अपने फैसले पर अडिग रहे और साथ रहने से इनकार कर दिया।
स्थिति को देखते हुए अदालत ने बच्चों के भविष्य, उनकी पढ़ाई और मानसिक विकास को ध्यान में रखते हुए अभिरक्षा का संतुलित समाधान निकालने की कोशिश की।
सुनवाई के दौरान 3 महीने से पिता के साथ रह रही ढाई साल की बच्ची को अदालत में पेश किया गया। जैसे ही उसने अपनी मां को देखा, वह दौड़कर उनके गले लग गई। मां-बेटी एक-दूसरे से लिपटकर रोने लगीं। बच्ची ने अपने छोटे-छोटे हाथों से मां के आंसू पोंछे और दोनों ने एक-दूसरे को चूमते हुए भावुक पल साझा किए।
जब पिता और दादी उसे अपने साथ ले जाने लगे तो वह लगातार "मम्मा… मम्मा…" कहकर रोती रही। अदालत में मौजूद लोग भी इस दृश्य को देखकर भावुक हो गए। इस स्थिति को देखते हुए कोर्ट ने तत्काल बच्ची को मां के सुपुर्द करने का आदेश दिया।
सुनवाई के दौरान अदालत ने छह वर्षीय बेटे से भी बातचीत की। शुरुआत में बच्चे ने कहा कि वह पिता के साथ रहना चाहता है। बेटे ने कहा- मुझे पापा पसंद हैं। हालांकि मां के सामने आने पर उसने कहा कि वह दोनों के साथ रहना चाहता है, लेकिन यह भी बताया कि मां उसे खेलने नहीं देती, इसलिए वह पिता के साथ रहना पसंद करेगा।
कोर्ट ने बच्चे के व्यवहार का अवलोकन करते हुए माना कि शुरुआती बयान कुछ हद तक प्रभावित प्रतीत हुआ, लेकिन साथ ही यह भी पाया कि पिता बच्चे की पढ़ाई पर विशेष ध्यान दे रहे हैं। बच्चा एक प्रतिष्ठित स्कूल में पढ़ रहा है, जो पिता के घर से करीब दो किलोमीटर की दूरी पर है। अदालत ने माना कि फिलहाल उसकी शिक्षा और नियमित दिनचर्या को देखते हुए पिता के साथ रहना उसके हित में होगा।
सरकारी स्कूल में शिक्षिका के रूप में कार्यरत मां ने अदालत से भावुक अपील करते हुए कहा कि वह भी अपने दोनों बच्चों का पालन-पोषण करने में पूरी तरह सक्षम हैं। उन्होंने कहा कि किसी भी मां के लिए अपने बच्चों से अलग होना सबसे बड़ा दर्द होता है।उन्होंने अदालत से आग्रह किया कि दोनों बच्चों की अभिरक्षा उन्हें दी जाए, ताकि भाई-बहन एक साथ रह सकें और मां का स्नेह दोनों को मिल सके।
दूसरी ओर, बच्चों के पिता, जो पेशे से बिल्डर हैं, ने अदालत में कहा कि उनकी आय मां की तुलना में अधिक है। उन्होंने दावा किया कि वे बच्चों को बेहतर शिक्षा, स्वास्थ्य सुविधाएं और बेहतर जीवनशैली उपलब्ध करा सकते हैं। उन्होंने अदालत से दोनों बच्चों की अभिरक्षा अपने पक्ष में देने की मांग की।
दोनों पक्षों की दलीलें, बच्चों के व्यवहार, उनकी पढ़ाई, भावनात्मक स्थिति और भविष्य को ध्यान में रखते हुए इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अभिरक्षा का संतुलित आदेश पारित किया।
अदालत ने व्यवस्था दी कि ढाई वर्षीय बेटी सप्ताह के सोमवार, मंगलवार और बुधवार पिता के साथ रहेगी, जबकि 6 वर्षीय बेटा शनिवार, रविवार और स्कूल की छुट्टियों के दौरान मां के पास रहेगा। बाकी दिनों की अभिरक्षा और मुलाकात की व्यवस्था भी बच्चों के हित को ध्यान में रखकर तय की गई।
Updated on:
17 Jul 2026 02:53 pm
Published on:
17 Jul 2026 02:42 pm
