
Prayagraj News: देश में बढ़ते भ्रष्टाचार और अवैध निर्माण के मामलों पर इलाहाबाद हाई कोर्ट ने बेहद कड़ी टिप्पणी की है। सुनवाई के दौरान कोर्ट ने कहा कि समाज में ईमानदारी का स्तर इस हद तक गिर चुका है कि अब लोग किसी काम को गलत तब मानते हैं, जब उसमें पकड़े जाते हैं। कोर्ट ने राम मंदिर में चढ़ावे से जुड़ी कथित चोरी के मामले का भी जिक्र करते हुए कहा कि अगर ऐसी घटनाएं भी लोगों को शर्मिंदा नहीं करतीं, तो इससे बड़ी चिंता की बात और क्या हो सकती है।
यह टिप्पणी इलाहाबाद हाई कोर्ट की खंडपीठ में न्यायमूर्ति अतुल श्रीधरन ने हमीरपुर के फैमुद्दीन और दो अन्य की याचिका की सुनवाई के दौरान की। अपने विस्तृत फैसले में उन्होंने कहा कि दशकों से भ्रष्टाचार को सामान्य मानने की प्रवृत्ति बढ़ी है और यह लोकतंत्र व प्रशासन, दोनों के लिए गंभीर चुनौती बन चुकी है। उन्होंने कहा कि भ्रष्टाचार करने वालों के खिलाफ सख्त से सख्त सजा पर विचार होना चाहिए। अपने आदेश में उन्होंने यहां तक टिप्पणी की कि ऐसे मामलों में मृत्युदंड जैसे कड़े प्रावधान पर भी बहस होनी चाहिए।
न्यायमूर्ति श्रीधरन ने अपने फैसले में हाल में चर्चा में रहे राम मंदिर चढ़ावा विवाद का उल्लेख करते हुए कहा कि अगर भगवान के मंदिर में चढ़ाए गए दान में कथित गड़बड़ी की खबरें भी समाज को झकझोर नहीं पा रहीं, तो यह ईमानदारी के सबसे निचले स्तर का संकेत है। उन्होंने कहा कि आज स्थिति यह बन गई है कि लोग गलत काम करने से नहीं, बल्कि पकड़े जाने से डरते हैं।
कोर्ट ने अवैध निर्माण के मामलों में सिर्फ बिल्डरों को ही नहीं, बल्कि सरकारी अधिकारियों की जिम्मेदारी पर भी सवाल उठाए। अदालत ने कहा कि कई मामलों में नगर निगम और विकास प्राधिकरण के कुछ अधिकारी रिश्वत लेकर अवैध निर्माण होने देते हैं। बाद में कार्रवाई होने पर नुकसान आम लोगों को उठाना पड़ता है, जबकि जिम्मेदार अधिकारी बच निकलते हैं। कोर्ट ने कहा कि यदि किसी अवैध निर्माण को गिराया जाता है, तो उसमें लापरवाही या मिलीभगत करने वाले अधिकारियों की जवाबदेही भी तय होनी चाहिए।
यह मामला हमीरपुर के फैमुद्दीन और अन्य की याचिका से जुड़ा था। याचिकाकर्ताओं ने आशंका जताई थी कि उनकी संपत्तियों पर बुलडोजर कार्रवाई हो सकती है। सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति अतुल श्रीधरन ने सुझाव दिया कि एफआईआर दर्ज होने के तुरंत बाद मकान गिराने जैसी कार्रवाई से बचना चाहिए। उन्होंने कहा कि यदि किसी व्यक्ति का मकान लंबे समय से बना हुआ है, तो ध्वस्तीकरण से पहले पर्याप्त समय देकर नोटिस दिया जाना चाहिए, ताकि वह वैकल्पिक व्यवस्था कर सके।
हालांकि, इस मामले की सुनवाई कर रही खंडपीठ के दूसरे सदस्य न्यायमूर्ति सिद्धार्थ ने कुछ निर्देशों पर असहमति जताई। उनका कहना था कि हाई कोर्ट अनुच्छेद 226 के तहत इस तरह की निश्चित समय-सीमा तय नहीं कर सकता। उन्होंने यह भी आशंका जताई कि ऐसे निर्देशों का गलत इस्तेमाल भी हो सकता है। अब इस कानूनी मतभेद के कारण मामला तीसरे न्यायाधीश के पास भेजा जाएगा।
हाई कोर्ट की यह टिप्पणी ऐसे समय आई है, जब देशभर में भ्रष्टाचार, अवैध निर्माण और बुलडोजर कार्रवाई को लेकर लगातार बहस चल रही है। अदालत ने स्पष्ट किया कि कानून का पालन केवल आम नागरिकों पर ही नहीं, बल्कि सरकारी तंत्र और अधिकारियों पर भी समान रूप से लागू होना चाहिए। भ्रष्टाचार पर सख्त कार्रवाई और जवाबदेही तय किए बिना व्यवस्था में सुधार संभव नहीं है।