बरेली में 26 सितंबर 2025 को हुई हिंसा मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने बड़ा फैसला सुनाते हुए छह आरोपियों की एफआईआर रद्द करने की याचिका खारिज कर दी, जिससे आरोपियों को झटका लगा।
High Court: 26 सितंबर 2025 को बरेली में हुई हिंसा के मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने आरोपियों को बड़ा झटका दिया है। अदालत ने इस मामले में नामजद छह आरोपियों द्वारा दाखिल याचिका को खारिज कर दिया है। याचिका में आरोपियों ने अपने खिलाफ दर्ज एफआईआर को रद्द करने की मांग की थी, जिसे अदालत ने स्वीकार करने से इनकार कर दिया। हाईकोर्ट के इस फैसले के बाद अब पुलिस की जांच और कानूनी कार्रवाई का रास्ता साफ हो गया है।
यह मामला बरेली के बारादरी थाना क्षेत्र में दर्ज किया गया था। उस समय थाना प्रभारी (एसएचओ) धनंजय पांडे की ओर से हिंसा और अवैध भीड़ एकत्रित करने के आरोप में एफआईआर दर्ज कराई गई थी। इस एफआईआर में 28 लोगों को नामजद आरोपी बनाया गया था, जबकि 200 से 250 अज्ञात लोगों को भी उपद्रव और हिंसा में शामिल होने के आरोप में आरोपी बनाया गया था।
पुलिस के अनुसार 26 सितंबर 2025 को करीब 250 लोगों की भीड़ एक धरना स्थल की ओर बढ़ रही थी। आरोप है कि यह भीड़ बिना प्रशासनिक अनुमति के धरना प्रदर्शन करने की तैयारी में थी। जब पुलिस और प्रशासन को इसकी जानकारी मिली तो मौके पर पहुंचकर स्थिति को नियंत्रित करने की कोशिश की गई।
बताया गया कि भीड़ को समझाने और रोकने का प्रयास किया गया, लेकिन स्थिति धीरे-धीरे तनावपूर्ण हो गई। आरोप है कि कुछ लोगों ने उग्र होकर हंगामा किया और कानून-व्यवस्था की स्थिति को प्रभावित करने की कोशिश की। इसी दौरान हिंसा और उपद्रव की घटना सामने आई, जिसके बाद पुलिस ने सख्ती बरतते हुए मामला दर्ज किया।
घटना के बाद बारादरी थाने में थाना प्रभारी धनंजय पांडे की ओर से विस्तृत एफआईआर दर्ज कराई गई। इस एफआईआर में 28 लोगों को नामजद किया गया, जबकि बड़ी संख्या में अज्ञात लोगों को भी आरोपी बनाया गया। पुलिस का कहना है कि घटना के दौरान बड़ी संख्या में लोग मौजूद थे और उनमें से कई ने कानून-व्यवस्था को बिगाड़ने की कोशिश की। इसलिए जांच के दौरान वीडियो फुटेज, स्थानीय लोगों के बयान और अन्य साक्ष्यों के आधार पर आरोपियों की पहचान की जा रही है।
एफआईआर में आरोप लगाया गया कि भीड़ ने बिना अनुमति के धरना देने की योजना बनाई थी, जिससे क्षेत्र में तनाव की स्थिति पैदा हो सकती थी। पुलिस के मुताबिक इस तरह की गतिविधियां सार्वजनिक व्यवस्था और शांति के लिए खतरा बन सकती हैं।
मामले में नामजद छह आरोपियों ने इलाहाबाद हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। उन्होंने अदालत में याचिका दाखिल कर अपने खिलाफ दर्ज एफआईआर को रद्द करने की मांग की थी। याचिकाकर्ताओं का कहना था कि उनके खिलाफ लगाए गए आरोप निराधार हैं और उन्हें बेवजह इस मामले में फंसाया गया है। याचिकाकर्ताओं की ओर से यह भी तर्क दिया गया कि एफआईआर में पर्याप्त साक्ष्य नहीं हैं और पुलिस ने बिना उचित आधार के उनका नाम शामिल कर लिया है। इसलिए एफआईआर को रद्द किया जाना चाहिए।
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद याचिका को खारिज कर दिया। अदालत ने कहा कि प्रथम दृष्टया मामले में जांच की आवश्यकता है और इस स्तर पर एफआईआर को रद्द करना उचित नहीं होगा। अदालत का मानना था कि जब किसी घटना के संबंध में पुलिस ने प्राथमिकी दर्ज की है और उसमें जांच की प्रक्रिया चल रही है, तो उसे इस प्रारंभिक चरण में खत्म करना न्यायसंगत नहीं होगा। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि मामले की जांच के दौरान यदि आरोप गलत पाए जाते हैं तो आगे की प्रक्रिया में आरोपियों को राहत मिल सकती है, लेकिन अभी एफआईआर को रद्द नहीं किया जा सकता।
हाईकोर्ट के इस फैसले के बाद पुलिस की जांच को बल मिला है। पुलिस अधिकारियों का कहना है कि मामले की निष्पक्ष और गहन जांच की जा रही है। घटना से जुड़े सभी पहलुओं की पड़ताल की जा रही है और उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर आगे की कार्रवाई की जाएगी। पुलिस का यह भी कहना है कि जिन अज्ञात लोगों को आरोपी बनाया गया है, उनकी पहचान के लिए वीडियो फुटेज और अन्य तकनीकी साधनों का सहारा लिया जा रहा है। जांच पूरी होने के बाद ही मामले में आगे की कानूनी प्रक्रिया तय की जाएगी।
इस मामले को लेकर प्रशासन और पुलिस का रुख सख्त दिखाई दे रहा है। अधिकारियों का कहना है कि बिना अनुमति के धरना-प्रदर्शन और कानून-व्यवस्था को प्रभावित करने वाली गतिविधियों को किसी भी हाल में बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। प्रशासन ने स्पष्ट किया है कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में विरोध और प्रदर्शन का अधिकार सभी को है, लेकिन इसके लिए निर्धारित नियमों और प्रक्रियाओं का पालन करना जरूरी है। बिना अनुमति के भीड़ इकट्ठा करना और सार्वजनिक व्यवस्था को प्रभावित करना कानूनन अपराध की श्रेणी में आता है।