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मानवाधिकार आयोगों की भूमिका पर इलाहाबाद हाईकोर्ट के जजों का अलग-अलग फैसला, जानें मामला

Allahabad HC Split Verdict : यूपी के 558 मदरसों की NHRC जांच पर इलाहाबाद हाईकोर्ट के दो जजों ने अलग-अलग आदेश दिए। जस्टिस अतुल श्रीधरन ने लिंचिंग जैसे मामलों में आयोग की 'खामोशी' पर सवाल उठाए, जबकि जस्टिस विवेक सरन ने इन टिप्पणियों पर असहमति जताई।
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प्रयागराज

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Avaneesh Kumar Mishra

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Updated: 29 Apr 2026, 7:24 PM IST

इलाहाबाद हाईकोर्ट, PC- Wikipedia

प्रयागराज : इलाहाबाद उच्च न्यायालय की एक डिवीजन बेंच में एक दुर्लभ मामले में दोनों जजों ने अलग-अलग अंतरिम आदेश पारित किए हैं। जस्टिस अतुल श्रीधरन और जस्टिस विवेक सरन के बीच राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC) तथा राज्य मानवाधिकार आयोगों के कामकाज को लेकर गहरी असहमति सामने आई है।

यह मामला टीचर्स एसोसिएशन मदारिस अरबिया द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई के दौरान सामने आया। याचिका में राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग द्वारा उत्तर प्रदेश के 558 सहायता प्राप्त मदरसों के कामकाज के संबंध में पारित जांच संबंधी आदेशों को चुनौती दी गई थी।

जस्टिस अतुल श्रीधरन की टिप्पणियां

जस्टिस अतुल श्रीधरन ने मानवाधिकार आयोगों की प्राथमिकताओं पर सवाल उठाते हुए तीखी टिप्पणी की। उन्होंने कहा कि आयोग उन मामलों में सुओ मोटो संज्ञान (suo motu cognizance) लेने में नाकाम रहे हैं, जहां मुस्लिम समुदाय के सदस्यों पर हमले होते हैं या उनकी लिंचिंग की घटनाएं सामने आती हैं तथा अपराधियों के खिलाफ मामले दर्ज नहीं किए जाते या उचित जांच नहीं होती।

जज ने कहा, 'उन मामलों में खुद संज्ञान लेने के बजाय, जिनमें मुस्लिम समुदाय के सदस्यों पर हमले होते हैं और कभी-कभी उनकी लिंचिंग भी हो जाती है… मानवाधिकार आयोग उन मामलों में दखल देते हुए दिखाई देते हैं, जिनका पहली नजर में उनसे कोई लेना-देना नहीं है।'

जस्टिस श्रीधरन ने आगे कहा कि कोर्ट के समक्ष ऐसा कोई उदाहरण नहीं पेश किया गया जिसमें NHRC या राज्य आयोग ने 'स्वयंभू रक्षकों (vigilantes)' द्वारा कानून हाथ में लेने या आम नागरिकों को परेशान करने के मामलों में सुओ मोटो संज्ञान लिया हो।

उन्होंने विशेष रूप से अंतरधार्मिक संबंधों से जुड़े मामलों का जिक्र करते हुए कहा, 'कभी-कभी किसी सार्वजनिक स्थान पर अलग धर्म के व्यक्ति के साथ एक कप कॉफी पीना भी एक डरावना काम बन जाता है।'

जस्टिस श्रीधरन ने यह भी टिप्पणी की कि आयोग अनुच्छेद 226 के तहत हाई कोर्ट के अधिकार क्षेत्र वाले मामलों में दखल देकर अपने मूल क्षेत्राधिकार से बाहर जा रहे हैं।

जस्टिस विवेक सरन की असहमति

दूसरी ओर, जस्टिस विवेक सरन ने जस्टिस श्रीधरन की इन व्यापक टिप्पणियों से स्पष्ट असहमति जताई। उन्होंने कहा कि वे पैराग्राफ 6 और 7 में दी गई कई टिप्पणियों से सहमत नहीं हैं और इसलिए उन्होंने अलग अंतरिम आदेश पारित किया।

जस्टिस सरन ने कहा कि जब मामले की मेरिट या NHRC की भूमिका पर कोई आदेश पारित किया जाना हो, तो सभी संबंधित पक्षों को सुनना जरूरी था। उन्होंने यह भी उल्लेख किया कि NHRC की ओर से कोई पक्ष कोर्ट में मौजूद नहीं था और याचिकाकर्ता ने भी सुनवाई स्थगित करने की मांग की थी।

जस्टिस सरन का कहना था कि पक्षों की गैरमौजूदगी में ऐसी प्रतिकूल और व्यापक टिप्पणियां करना उचित नहीं था।

जान लें क्या है पूरा मामला?

याचिका में NHRC द्वारा फरवरी 2025 में जारी आदेश को चुनौती दी गई है, जिसमें उत्तर प्रदेश के 558 मदरसों के खिलाफ आर्थिक अपराध शाखा (EOW) से जांच कराने का निर्देश दिया गया था। कोर्ट ने इस याचिका पर सुनवाई के दौरान ही मानवाधिकार आयोगों की समग्र भूमिका पर चर्चा की।

चूंकि दोनों जजों की राय अलग-अलग है, इसलिए यह मामला अब बड़े बेंच या आगे की सुनवाई के लिए सूचीबद्ध किया जा सकता है।

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