प्रयागराज

Aniruddh Acharya Maharaj : ‘गलती हुई है तो माफी मांगिए’-कथावाचक अनिरुद्ध आचार्य महाराज का प्रशासन से सवाल

Aniruddhacharya Public Statement: कथावाचक अनिरुद्ध आचार्य महाराज ने प्रशासन की कार्यशैली पर सवाल उठाते हुए कहा है कि यदि गलती हुई है तो उसे स्वीकार कर माफी मांगी जानी चाहिए। उन्होंने साधु-संतों और ब्राह्मणों के साथ कथित दुर्व्यवहार को संवैधानिक मूल्यों के खिलाफ बताया और संवाद का रास्ता अपनाने की अपील की।

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ब्राह्मणों और साधुओं के साथ कथित व्यवहार पर संत समाज में रोष, विनम्रता और संवाद की अपील (फोटो सोर्स : WhatsApp News Group)

Aniruddhacharya Maharaj Administrative Action:   देश में संत समाज और प्रशासन के संबंधों को लेकर एक बार फिर बहस तेज हो गई है। प्रसिद्ध कथावाचक अनिरुद्धाचार्य महाराज ने हाल ही में दिए गए अपने वक्तव्य में प्रशासन की कार्यशैली पर गंभीर सवाल उठाते हुए कहा कि यदि कहीं गलती हुई है तो उसे स्वीकार कर विनम्रता के साथ माफी मांगनी चाहिए। उन्होंने कहा कि ब्राह्मणों और साधुओं के साथ कथित दुर्व्यवहार न केवल सामाजिक मर्यादाओं के खिलाफ है, बल्कि भारतीय सांस्कृतिक मूल्यों पर भी चोट पहुंचाता है।

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‘प्रशासन ने गलती की है’-अनिरुद्धाचार्य महाराज

अनिरुद्धाचार्य महाराज ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि प्रशासन ने गलती तो की है। ब्राह्मणों और साधुओं को चोटी पकड़कर मारा गया। सवाल यह है कि प्रशासन माफी क्यों नहीं मांग रहा? माफी मांगने में इतनी देरी क्यों हो रही है, उन्होंने कहा कि संत समाज स्वभाव से दयालु और क्षमाशील होता है। यदि प्रशासन अपनी भूल स्वीकार कर संतों के चरणों में जाकर माफी मांगे, तो संत समाज बिना देर किए क्षमा कर देगा।

‘माफी मांगने में किस बात की अकड़’

अपने वक्तव्य में कथावाचक ने प्रशासनिक रवैये पर तीखा प्रश्न उठाते हुए कहा कि माफी मांगना कमजोरी नहीं, बल्कि नैतिक बल का प्रतीक होता है। उन्होंने पूछा,क्षमा मांग लेने में आखिर प्रशासन को किस बात की अकड़ है? प्रशासन को यह अधिकार किसने दिया है कि वह किसी की चोटी पकड़कर मारे? क्या यह अधिकार आपको संविधान ने दिया है। उनके इन सवालों ने न केवल प्रशासनिक जिम्मेदारी बल्कि संवैधानिक मूल्यों को लेकर भी एक नई बहस को जन्म दे दिया है।

संविधान और मानवीय गरिमा का सवाल

अनिरुद्धाचार्य महाराज ने अपने वक्तव्य में संविधान का उल्लेख करते हुए कहा कि भारत का संविधान हर नागरिक को सम्मान और गरिमा के साथ जीने का अधिकार देता है। उन्होंने कहा कि साधु-संत समाज भारतीय संस्कृति का आधार रहा है और उनके साथ किसी भी प्रकार का अपमान पूरे समाज की भावनाओं को आहत करता है। उन्होंने कहा कि कानून व्यवस्था बनाए रखना प्रशासन की जिम्मेदारी है, लेकिन इस जिम्मेदारी के निर्वहन में मानवीय संवेदनाओं और सांस्कृतिक मर्यादाओं की अनदेखी नहीं की जा सकती।

संत समाज की परंपरा: क्षमा और करुणा

कथावाचक ने यह भी कहा कि संत समाज सदैव से क्षमा, करुणा और सहनशीलता का प्रतीक रहा है। उनके शब्दों में, संत तो दयावान होते हैं। शरण में जाने पर संत माफ कर देते हैं। इसलिए प्रशासन को इस मामले को लंबा नहीं खींचना चाहिए। उन्होंने प्रशासन से अपील की कि अहंकार छोड़कर संवाद का मार्ग अपनाया जाए, ताकि समाज में तनाव की स्थिति उत्पन्न न हो।

लंबा खिंचता विवाद, बढ़ती असहजता

धार्मिक और सामाजिक जानकारों का मानना है कि यदि ऐसे मामलों में समय रहते संवेदनशीलता दिखाई जाए, तो विवाद गहराने से रोका जा सकता है। अनिरुद्धाचार्य महाराज का कहना है कि देरी से माफी मांगने से मामला और उलझता जा रहा है, जिससे प्रशासन और संत समाज के बीच दूरी बढ़ रही है। उन्होंने कहा कि प्रशासन का दायित्व केवल कानून का पालन कराना ही नहीं, बल्कि समाज के हर वर्ग के साथ सम्मानजनक व्यवहार सुनिश्चित करना भी है।

संवाद की आवश्यकता

विशेषज्ञों के अनुसार, इस पूरे घटनाक्रम में संवाद की कमी साफ दिखाई देती है। संत समाज का एक वर्ग मानता है कि यदि प्रशासन के उच्च अधिकारी सीधे संतों से संवाद करें और अपनी बात रखें, तो स्थिति सामान्य हो सकती है। अनिरुद्धाचार्य महाराज ने भी इसी दिशा में अपील करते हुए कहा कि “संतों के चरणों में जाइए, गलती हुई है तो माफी मांगिए। इससे बड़ा कोई समाधान नहीं है।”

सामाजिक सौहार्द का प्रश्न

यह मुद्दा केवल एक प्रशासनिक कार्रवाई तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि सामाजिक सौहार्द और आपसी विश्वास से भी जुड़ गया है। धार्मिक संगठनों का कहना है कि संत समाज के सम्मान से जुड़ा कोई भी मामला व्यापक असर डालता है।
वहीं कुछ सामाजिक विश्लेषकों का मानना है कि प्रशासन को अपनी कार्रवाई पर पुनर्विचार करते हुए यह सुनिश्चित करना चाहिए कि भविष्य में इस प्रकार की स्थिति उत्पन्न न हो।

प्रशासन की भूमिका पर बहस

इस पूरे घटनाक्रम ने प्रशासन की भूमिका और सीमाओं को लेकर भी चर्चा तेज कर दी है। सवाल यह उठ रहा है कि कानून व्यवस्था बनाए रखने और मानवीय गरिमा का सम्मान करने के बीच संतुलन कैसे साधा जाए। अनिरुद्धाचार्य महाराज के वक्तव्य को इसी संतुलन की मांग के रूप में देखा जा रहा है, जिसमें उन्होंने न तो टकराव की बात कही और न ही उग्र प्रतिक्रिया की, बल्कि विनम्रता और क्षमा को समाधान बताया। उनके बयान के बाद सोशल और धार्मिक मंचों पर भी चर्चा शुरू हो गई है। कई लोग इसे संत समाज की पीड़ा की अभिव्यक्ति बता रहे हैं, तो कुछ इसे प्रशासन के लिए आत्ममंथन का अवसर मान रहे हैं।

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