Stay on FIR Against ASP Anuj Chaudhary: ASP अनुज चौधरी के खिलाफ FIR पर रोक लगा दी गई है। हाईकोर्ट ने फिलहाल ASP अनुज चौधरी को अंतरिम राहत देते हुए निचली अदालत के आदेश पर रोक लगा दी है।
Stay on FIR Against ASP Anuj Chaudhary: संभल हिंसा मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अपर पुलिस अधीक्षक (ASP) अनुज चौधरी को बड़ी राहत दी है। हाईकोर्ट ने संभल की CJM कोर्ट द्वारा पुलिसकर्मियों के खिलाफ FIR दर्ज करने के आदेश पर फिलहाल रोक लगा दी है।
सोमवार को इस मामले में उत्तर प्रदेश सरकार और ASP अनुज चौधरी की ओर से दाखिल याचिकाओं पर इलाहाबाद हाईकोर्ट में सुनवाई हुई थी। याचिकाओं में निचली अदालत के आदेश को कई आधारों पर चुनौती दी गई है। इसके बाद मंगलवार को भी मामले की सुनवाई हुई, जहां सभी पक्षों ने अपनी-अपनी दलीलें रखीं।
हाईकोर्ट ने फिलहाल ASP अनुज चौधरी को अंतरिम राहत देते हुए निचली अदालत के आदेश पर रोक लगा दी है। अब इस मामले की अगली सुनवाई करीब 5 हफ्ते बाद होगी। बताया जा रहा है कि संभल हिंसा से जुड़े इस चर्चित मामले में 9 फरवरी को करीब 2 घंटे तक सुनवाई चली थी, जिसमें यूपी सरकार की ओर से विस्तार से अपना पक्ष रखा गया और दोनों पक्षों के बीच जोरदार बहस हुई।
याचिकाओं पर न्यायमूर्ति समित गोपाल ने सुनवाई की। मामला नवंबर 2024 की संभल हिंसा से संबंधित है। पिछले महीने यामीन की अर्जी पर संभल के तत्कालीन CJM ने उक्त आदेश किया था। हिंसा में घायल युवक के पिता यामीन ने आरोप लगाया कि पुलिस अधिकारियों ने उसके बेटे को जान से मारने की नीयत से गोली चलाई थी।
राज्य सरकार और पुलिस अधिकारी की ओर से एडिशनल एडवोकेट जनरल मनीष गोयल और अधिवक्ता एके संड ने पक्ष रखा। मनीष गोयल का कहना था कि मजिस्ट्रेट ने BNSS की सीमाओं का उल्लंघन किया है और कानून में निहित अनिवार्य सुरक्षा प्रावधानों की अनदेखी की है। उन्होंने BNSS की धारा 175 के तहत FIR दर्ज करने का आदेश तो किया लेकिन धारा 175 (4) में निर्धारित कठोर और अनिवार्य प्रक्रिया का पालन नहीं किया जो अपने आधिकारिक कर्तव्यों के निर्वहन के दौरान कार्य करने वाले लोक सेवकों को निरर्थक और दुर्भावनापूर्ण आपराधिक कार्यवाहियों से संरक्षण प्रदान करती है।
अपर महाधिवक्ता ने कहा कि BNSS धारा 175 (4) के तहत किसी लोक सेवक के खिलाफ जांच का आदेश देने से पहले मजिस्ट्रेट को दो चरणों की प्रक्रिया अपनानी होती है। राज्य की ओर से यह भी तर्क दिया गया कि शिकायतकर्ता ने प्रार्थना पत्र में यह तक नहीं बताया कि उसने पहले संबंधित थाने में शिकायत दर्ज कराई या नहीं, जबकि यह कानून के तहत एक आवश्यक शर्त है।