Magh Mela Prayagraj: चार वर्षीय सार्थक द्विवेदी उर्फ ‘नागा साधु’ माघ मेला (Magh Mela) प्रयागराज में अपनी गहरी धार्मिक आस्था, श्लोकों के ज्ञान और साधु-संतों जैसी दिनचर्या के कारण श्रद्धालुओं के लिए आकर्षण का केंद्र बने हुए हैं, जहां उनकी मासूमियत और अध्यात्म का अनोखा संगम लोगों को अचंभित कर रहा है।
4 Year Old Naga Sadhu in Magh Mela: प्रयागराज के पावन संगम तट पर आयोजित विश्व प्रसिद्ध माघ मेला (Magh Mela) इन दिनों अपने अंतिम चरण की ओर बढ़ रहा है। देश-विदेश से आए साधु-संत, श्रद्धालु और पर्यटक यहां सनातन परंपराओं, कठिन साधनाओं और विविध आध्यात्मिक गतिविधियों को नजदीक से देख रहे हैं।
इसी विशाल धार्मिक समागम के बीच चार वर्षीय बालक सार्थक द्विवेदी, जिन्हें लोग प्यार से ‘नागा साधु’ भी कहने लगे हैं, श्रद्धालुओं के लिए आस्था और जिज्ञासा का विषय बन गए हैं। इतनी कम उम्र में धर्म और अध्यात्म के प्रति उनकी गहरी रुचि हर आने-जाने वाले को ठहरकर देखने और सुनने पर मजबूर कर रही है।
कानपुर से अपने माता-पिता के साथ कल्पवास के लिए आए सार्थक द्विवेदी का माघ मेला (Magh Mela) में कदम रखते ही मानो पूरा जीवन ही बदल गया हो। रंग-बिरंगे झंडे, साधु-संतों की वेशभूषा, गूंजते मंत्र और आरती की ध्वनि ने नन्हे सार्थक के मन पर गहरी छाप छोड़ी। धीरे-धीरे वह स्वयं भी पूजा-पाठ, आरती और धार्मिक अनुष्ठानों में शामिल होने लगा। आश्रम शिविरों में साधुओं के साथ बैठकर ध्यान लगाना, भजन सुनना और मंत्रों का उच्चारण करना अब उसकी दिनचर्या का हिस्सा बन गया है।
माघ मेला (Magh Mela) के सेक्टर 6, ओल्ड जीटी रोड स्थित दंडी संन्यासी नगर में अखिल भारतीय दंडी संन्यासी परिषद के राष्ट्रीय अध्यक्ष पीठाधीश्वर स्वामी ब्रह्माश्रम महाराज का शिविर लगा हुआ है। यहीं पर सार्थक अपने माता-पिता के साथ रहकर साधुओं की दिनचर्या को नजदीक से देखता और अपनाता है।
लंगोट पहनकर पूजा करना, आरती में हाथ जोड़कर खड़ा होना और संतों के साथ बैठकर श्लोक सुनना अब उसके लिए खेल जैसा बन गया है। स्वामी ब्रह्माश्रम महाराज भी उसकी लगन और श्रद्धा से इतने प्रभावित हैं कि कई बार उसे अपने बगल के आसन पर बैठाकर आशीर्वाद देते हैं।
अपनी मासूम उम्र के कारण सार्थक कई बार आश्रम परिसर में बिना वस्त्रों के ही घूमता दिखाई देता है, जिससे लोग उसे स्नेहपूर्वक ‘नागा साधु’ कहने लगे हैं। हालांकि इस नाम के पीछे कोई औपचारिक दीक्षा नहीं, बल्कि उसकी सरलता और साधु-संतों जैसा जीवन जीने की कोशिश है। आश्रम में आने वाले श्रद्धालु जब उसे श्लोक सुनाते हुए या आरती करते हुए देखते हैं, तो उसकी उम्र भूलकर उसकी श्रद्धा और आत्मविश्वास पर हैरान रह जाते हैं।
सार्थक ने कई संस्कृत श्लोक कंठस्थ कर रखे हैं। जब भी कोई श्रद्धालु उससे कुछ सुनाने को कहता है, वह पूरे आत्मविश्वास के साथ श्लोकों का उच्चारण करता है। उसकी स्पष्ट वाणी और भावपूर्ण उच्चारण देखकर लोग तालियां बजाने से खुद को रोक नहीं पाते। सनातन परंपरा के प्रति उसका यह लगाव और समझ उसकी उम्र के बच्चों से बिल्कुल अलग नजर आती है, जो उसे माघ मेला (Magh Mela) का खास आकर्षण बना रही है।
धर्म और साधना के बीच भी सार्थक अपनी पढ़ाई को नहीं भूलता। वह प्रयागराज के सिविल लाइंस स्थित ज्वाला देवी सरस्वती शिशु मंदिर में एलकेजी कक्षा का छात्र है। विद्यालय के प्रधानाचार्य इंद्रजीत त्रिपाठी बताते हैं कि सार्थक पढ़ाई में मेधावी है और कक्षा में सेनापति की भूमिका निभाता है। वह बच्चों और शिक्षकों के बीच काफी लोकप्रिय है। उनका कहना है कि सार्थक में नेतृत्व और संस्कार दोनों का अद्भुत मेल दिखाई देता है।
सार्थक का सपना है कि वह आगे चलकर वृंदावन जाकर संस्कृत की शिक्षा ग्रहण करे। वह स्वयं को दंडी आश्रम का चेला मानता है और कहता है कि भविष्य में भागवत कथा और रामकथा के माध्यम से सनातन धर्म का प्रचार करेगा। साधु-संतों के बीच घूमते हुए जब कोई उसे अपना शिष्य बनाने की बात करता है, तो वह गर्व से कहता है कि वह पहले से ही दंडी आश्रम के महाराज का शिष्य है।
अखिल भारतीय दंडी संन्यासी परिषद के राष्ट्रीय अध्यक्ष पीठाधीश्वर स्वामी ब्रह्माश्रम महाराज का मानना है कि जिस तरह की ललक और भावनात्मक जुड़ाव सार्थक में दिखाई दे रहा है, वह भविष्य में धर्म और अध्यात्म के क्षेत्र में एक बड़ा स्थान बना सकता है। उन्होंने बताया कि जल्द ही सार्थक उनके साथ वृंदावन जाने की तैयारी कर रहा है। वहीं किन्नर अखाड़ा के आचार्य महामंडलेश्वर प्रो. (डा.) स्वामी लक्ष्मी नारायण त्रिपाठी महाराज को भी सार्थक ‘गुरुजी’ कहकर संबोधित करता है, जो उसकी व्यापक आध्यात्मिक संगत को दर्शाता है।
माघ मेला (Magh Mela) हर साल कई अनोखे दृश्य और व्यक्तित्वों की पहचान बनता है, लेकिन इस बार चार वर्षीय सार्थक द्विवेदी उर्फ ‘नागा साधु’ ने अपनी मासूमियत, आस्था और श्लोकों की दुनिया से एक अलग ही छाप छोड़ी है। संगम की रेती पर खेलता हुआ यह नन्हा बालक आज श्रद्धालुओं के लिए प्रेरणा का स्रोत बन गया है, जो यह संदेश देता है कि उम्र भले ही छोटी हो, लेकिन आस्था और लगन की कोई सीमा नहीं होती।