इलाहाबाद हाईकोर्ट में लोक सेवा आयोग भर्ती की सीबीआई जांच की अधिकारिता पर बहस जारी।
इलाहाबाद. उत्तर प्रदेश लोक सेवा आयोग की पांच साल की परीक्षाओं की जांच सीबीआई को सौंपने की अधिकारिता के खिलाफ दाखिल याचिका पर सोमवार से सुनवाई जारी है। याचिका आयोग की तरफ से दाखिल की गयी है। आयोग के अधिवक्ता ने कहा कि आयोग एक संवैधानिक स्वायत्त संस्था है। उसके अध्यक्ष व सदस्यों के आचरण व भ्रष्टाचार के मामले में पद से हटाने अथवा उन्हें निलंबित करने की जांच करने का अधिकार अनुच्छेद 317 के तहत केवल सुप्रीम कोर्ट को ही है। अन्य कोई आयोग के क्रियाकलापों की जांच नहीं कर सकता।
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उनका कहना था कि राज्यपाल की संस्तुति पर राष्ट्रपति के संदर्भ पर सुप्रीम कोर्ट जांच कर कार्रवाई कर सकता है। इस तर्क के समर्थन में नजीरें भी पेश की गयी। सुनवाई के दौरान कई सवाल भी उठे कि यदि आयोग अपनी कर्मचारियों की अनियमितता की शिकायत पर कार्रवाई नहीं करता तो राज्य सरकार क्या मूकदर्शक रहेगी। वह भी ऐसी दशा में जब वह आयोग के अध्यक्ष को हटाने की मांग नहीं करती। यह भी सवाल उठा कि व्यापक अनियमितता पर क्या सेवा से हटाना ही दण्ड है। या आपराधिक कार्रवाई भी की जानी चाहिए।
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मामले की सुनवाई कर रहे चीफ जस्टिस डी.बी.भोसले व जस्टिस सुनीत कुमार की खण्डपीठ ने यह भी जानना चाहा कि यदि जांच के बाद सीबीआई इस निष्कर्ष पर पहंुचती है कि प्राथमिकी दर्ज कर विवेचना किया जाना जरूरी है तो ऐसे में क्या प्रक्रिया अपनानी होगी। हालांकि याची के वकील का कहना था कि राज्य सरकार को केवल सुप्रीम कोर्ट के जरिये जांच कराने की कार्रवाई का अधिकार है।
By Prasoon Pandey
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