रायबरेली

फिरोज गांधी पुण्यतिथि: रायबरेली में कितनी बची है उनकी विरासत? जिस सीट से शुरू हुआ गांधी परिवार का रिश्ता, वहां अब राहुल की सियासत

Rae Bareli Lok Sabha Seat: फिरोज गांधी की पुण्यतिथि पर जानिए रायबरेली में उनकी राजनीतिक विरासत कितनी बची है। 1951-52 और 1957 में उनकी जीत से शुरू हुआ गांधी परिवार का यह रिश्ता इंदिरा गांधी, सोनिया गांधी से होते हुए राहुल गांधी तक पहुंचा।
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Sep 08, 2026
Feroze Gandhi
फिरोज गांधी (Photo AI/IANS)

Feroze Gandhi Death Anniversar: देश की पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के पति फिरोज गांधी की आज पुण्यतिथि है। फिरोज गांधी का निधन 8 सितंबर 1960 को हुआ था। पारसी होने के बावजूद उनकी अंतिम इच्छा के अनुसार उनका अंतिम संस्कार हिंदू रीति-रिवाजों से किया गया। पारसी परंपराओं का पालन करते हुए शव के मुख पर कपड़ा रखकर 'अहनावेति' का पाठ भी हुआ। उनकी अस्थियों का कुछ हिस्सा संगम में प्रवाहित किया गया और कुछ भाग को दफनाकर कब्र बनाई गई।

बर्टिल फाक की किताब फिरोज- द फॉरगॉटेन गांधी में बताया गया है कि फिरोज के शव को तीन मूर्ति भवन में रखा गया था और इस दौरान सभी धर्मग्रंथों का पाठ किया गया था। फिरोज का अंतिम संस्कार हिंदू रीति रिवाजों से हुआ था और उनके 16 साल के बेटे राजीव गांधी ने उनके शव को मुखाग्नि दी थी।

किताब में ये भी बताया गया है कि फिरोज के पार्थिव शरीर को जहां रखा गया था, वहां पारसी परंपराओं का भी पालन हुआ था और उनके शव के मुंह पर कपड़े का टुकड़ा रख कर ‘अहनावेति’ का पहला अध्याय पढ़ा गया था।

अस्थियों को संगम में भी बहाया गया और दफनाया भी गया

जब फिरोज का अंतिम संस्कार हो गया तो उनकी कुछ अस्थियों को इलाहाबाद (वर्तमान में प्रयागराज) संगम में प्रवाहित कर दिया गया था, वहीं कुछ अस्थियों को दफना दिया गया था। जिस जगह पर अस्थियों को दफनाया गया, वहां फिरोज की कब्र बना दी गई।

आज उनकी पुण्यतिथि पर जब रायबरेली की सियासत और गांधी परिवार के रिश्ते को पीछे मुड़कर देखते हैं तो एक दिलचस्प सवाल सामने आता है कि जिस फिरोज गांधी ने रायबरेली को गांधी परिवार की राजनीतिक जमीन बनाने में अहम भूमिका निभाई, उनकी अपनी विरासत आज इस सीट पर कितनी दिखाई देती है? आइए जानते हैं।

रायबरेली से फिरोज ने शुरू की थी गांधी परिवार की सियासी पारी

1951-52 के पहले लोकसभा चुनाव में रायबरेली और प्रतापगढ़ जिलों को मिलाकर एक लोकसभा सीट थी। कांग्रेस के टिकट पर फिरोज गांधी यहां से चुनाव मैदान में उतरे और जीत हासिल की। इसके बाद 1957 में जब रायबरेली अलग लोकसभा सीट के रूप में अस्तित्व में आई, तब भी फिरोज गांधी कांग्रेस के टिकट पर चुनाव जीते।

यही वह दौर था जब रायबरेली का नाम गांधी परिवार की राजनीति से जुड़ना शुरू हुआ। फिरोज गांधी सिर्फ जवाहर लाल नेहरू के दामाद के तौर पर नहीं, बल्कि एक स्वतंत्र राजनीतिक पहचान रखने वाले सांसद के रूप में भी जाने जाते थे। संसद में उन्होंने अपनी ही सरकार और तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू की नीतियों पर सवाल उठाने में भी संकोच नहीं किया। भ्रष्टाचार और वित्तीय अनियमितताओं के मुद्दे उठाकर उन्होंने सत्ता पक्ष के भीतर से सवाल करने वाले सांसद की छवि बनाई।

फिरोज के बाद इंदिरा ने संभाली राजनीतिक विरासत

1960 में फिरोज गांधी के निधन के बाद रायबरेली से गांधी परिवार का रिश्ता खत्म नहीं हुआ। हालांकि, इसके बाद हुए उप-चुनाव और 1962 के चुनाव में यहां से गांधी परिवार का कोई सदस्य चुनाव नहीं लड़ा। 1962 में कांग्रेस की तरफ से उतरे बैजनाथ कुरील ने जनसंघ प्रत्याशी तारावती को हराया, लेकिन 1967 में इंदिरा गांधी ने रायबरेली से चुनाव लड़कर इस रिश्ते को नई राजनीतिक दिशा दी।

दरअसल, फिरोज गांधी के निधन के चार साल बाद 1964 में इंदिरा गांधी राज्यसभा पहुंचीं। वह 1967 तक राज्यसभा की सदस्य रहीं। इसी दौरान 1966 में इंदिरा गांधी देश की पहली महिला प्रधानमंत्री बनीं। प्रधानमंत्री बनने के बाद भी वह राज्यसभा सदस्य थीं। वर्ष 1967 में उन्होंने रायबरेली से लोकसभा चुनाव लड़कर सीधे चुनावी राजनीति में कदम रखा।

कांग्रेस उम्मीदवार के तौर पर मैदान में उतरीं इंदिरा गांधी ने 1967 के चुनाव में निर्दलीय प्रत्याशी बीसी सेठ को 91,703 वोटों के बड़े अंतर से हराया। इस जीत के साथ रायबरेली और इंदिरा गांधी का राजनीतिक रिश्ता और मजबूत हो गया।

इसके बाद 1971 का लोकसभा चुनाव आया। कांग्रेस ने एक बार फिर इंदिरा गांधी को रायबरेली से उम्मीदवार बनाया। उनके सामने संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी के प्रत्याशी राज नारायण थे। चुनाव नतीजे आए तो इंदिरा गांधी ने 1,83,309 वोट हासिल किए, जबकि राज नारायण को 71,499 वोट मिले। इस तरह इंदिरा गांधी 1,11,810 वोटों के अंतर से विजयी घोषित हुईं।

हालांकि चुनाव परिणाम आने के बाद राज नारायण ने इंदिरा गांधी के खिलाफ इलाहाबाद उच्च न्यायालय में चुनाव याचिका दाखिल की। उन्होंने इंदिरा गांधी पर सरकारी तंत्र के दुरुपयोग और चुनाव में अनियमितताओं का आरोप लगाया।राज नारा यण की इसी चुनाव याचिका पर फैसला सुनाते हुए इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने 1975 में इंदिरा गांधी के रायबरेली से चुनाव को अवैध घोषित कर दिया। इंदिरा गांधी ने इस फैसले को सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती दी और तत्काल इस्तीफा देने से इनकार कर दिया। इसके बाद देश की राजनीति में बड़ा घटनाक्रम हुआ और 1975 में आपातकाल लागू हुआ।

1977 में टूटा सिलसिला, फिर 1980 में वापसी

आपातकाल के बाद 1977 में कांग्रेस विरोधी लहर के बीच इंदिरा गांधी को रायबरेली में हार का सामना करना पड़ा। जनता लहर में राज नारायण ने उन्हें करीब 55 हजार वोटों से हराया।

लेकिन 1980 में इंदिरा गांधी ने फिर रायबरेली से जीत दर्ज की। हालांकि इसके बाद उन्होंने रायबरेली सीट छोड़कर मेंडक सीट अपने पास रखी। उनके इस्तीफे के बाद हुए उपचुनाव में अरुण नेहरू ने कांग्रेस के टिकट पर जीत दर्ज की। इसके बाद 1984 में भी अरुण नेहरू रायबरेली से सांसद बने। 1989 और 1991 में शीला कौल ने कांग्रेस के टिकट पर जीत दर्ज की। शीला कौल का भी नेहरू-गांधी परिवार से पारिवारिक रिश्ता था। इस तरह फिरोज गांधी के बाद रायबरेली में गांधी परिवार की विरासत सीधे या रिश्तेदारी के जरिए लंबे समय तक बनी रही।

1996-98 में गांधी परिवार की पकड़ को लगा झटका

रायबरेली का इतिहास यह भी बताता है कि गांधी परिवार के नाम मात्र से हर चुनाव जीतना हमेशा संभव नहीं रहा। 1996 में कांग्रेस ने शीला कौल के बेटे विक्रम कौल को मैदान में उतारा, लेकिन कांग्रेस मुकाबले से बाहर हो गई। विक्रम कौल को महज 25,457 वोट मिले और उनकी जमानत जब्त हो गई।1998 में शीला कौल की बेटी दीपा कौल कांग्रेस की उम्मीदवार बनीं, लेकिन वह भी चौथे स्थान पर रहीं और उनकी जमानत जब्त हो गई।इस दौरान भाजपा के अशोक सिंह ने लगातार दो चुनाव जीते। 1999 में कांग्रेस ने कैप्टन सतीश शर्मा के जरिए रायबरेली में वापसी की।यह दौर बताता है कि रायबरेली में गांधी परिवार की विरासत मजबूत जरूर रही, लेकिन वह अजेय नहीं थी।

Indira Gandhi (ANI Photo)

सोनिया ने चार बार जीता चुनाव

साल 2004 में राहुल गांधी ने अमेठी से चुनावी राजनीति शुरू की तो सोनिया गांधी रायबरेली से मैदान में उतरीं। उन्होंने सपा के अशोक कुमार सिंह को 2,49,765 वोटों से हराया। 2009 में सोनिया ने बसपा के आरएस कुशवाहा को 3,72,165 वोटों से हराया। 2014 में भाजपा के अजय अग्रवाल के खिलाफ 3,52,713 वोटों से जीत दर्ज की। 2019 में सोनिया गांधी को 5,33,687 वोट मिले, जबकि भाजपा के दिनेश प्रताप सिंह को 3,65,839 वोट मिले। सोनिया 1,67,848 वोटों से जीतीं।

Sonia Gandhi (ANI photo)

सोनिया गांधी ने चुनाव से लिया संन्यास

इसके बाद सोनिया गांधी ने स्वास्थ्य और उम्र का हवाला देते हुए लोकसभा चुनाव नहीं लड़ने का फैसला किया। अपने विदाई संदेश में उन्होंने कहा था कि मुझे यह कहते हुए फख्र हो रहा है कि मैं आज जो कुछ भी हूं, आपकी वजह से हूं और मैंने हमेशा आपके यकीन का सम्मान करने की पूरी कोशिश की है, अब स्वास्थ्य और उम्र की वजह से, मैं अगला लोकसभा चुनाव नहीं लड़ूंगी। सोनिया गांधी ने यह भी कहा था कि रायबरेली से उनका रिश्ता उनके ससुराल वालों की तरफ से विरासत में मिला है। 2024 में सोनिया गांधी चुनावी राजनीति से लोकसभा के बजाय राज्यसभा चली गईं। इसके बाद गांधी परिवार की अगली पीढ़ी के रूप में राहुल गांधी ने रायबरेली से चुनाव लड़ा और जीत दर्ज की। यानी 1950 के दशक में फिरोज गांधी से शुरू हुआ यह राजनीतिक सिलसिला सात दशक बाद राहुल गांधी तक पहुंच चुका है।

Updated on:
08 Sept 2026 12:33 pm
Published on:
08 Sept 2026 12:30 pm