- उद्घाटन 26 दिसंबर 1946 को रायगढ़ स्टेट के दीवान जेएन महंत ने किया था
रायगढ. जिला मुख्यालय के मध्य स्थित गांधीगंज में कबूतरों के लिए एक विशेष टावर बनाया गया है। यह टॉवर 1946 में सामजी परिवार के द्वारा बनाया गया गया था, जहां आज भी हजारों कबूतर रहते हैं। शहर के लोग सुबह शाम यहां पहुंचकर कबूतरों को दाना-पानी देते हैं। सामजी परिवार आज भी रायगढ़ में रहता है और उनका कहना है कि यह टावर उनकी परदादी की याद में बनाया गया था और यहां रह रहे हजारों कबूतरों में आज भी उनकी यादें बसी हुई हैं।
इस परिवार के युवा मयूर सामजी से जब बात की गई तो उन्होंने बताया कि पहले गांधीगंज में अनाज की मंडी लगती थी। उसे मंगल बाजार के नाम से जाना जाता था। मेरे दादा और परदादा भी इसी मंडी में व्यवसाय करते थे। मेरी परदादी भानी बाई को कबूतरों व पक्षियों से बहुत प्रेम था। वह मंडी में आने वाले कबूतरों को दाना-पानी देती रहती थीं।
उनकी अंतिम इच्छा थी कि मंडी के बीच कबूतरों के रहने के लिए एक टावर बने, जिससे यहां कबूतर रह सकें और यहीं उन्हें पर्याप्त दाना पानी भी मिल सके। मयूर के दादा ने अपनी मां की अंतिम इच्छा पूरी करने के लिए यह टावर बनवाया जो कि आज भी एक नायाब इमारत के रूप में उसी हालत में खड़ा हुआ है।
रायगढ़ स्टेट के दीवान ने किया था उद्घाटन
इस टावर का निर्माण सन 1946 में कच्छ कुंम्हरिया निवासी रायसाहब हरीलाल सामजी, बाबू नन्हेंलाल सामजी, बाबू गोविंद सामजी और बाबू वासुदेव सामजी ने अपनी माता भानी बाई के स्मरणार्थ कराया था। इस टावर को विशेष रूप से कबूतरों के रहवास को देखते हुए डिजाइन किया गया है, जिसमें ऊपर छोटे-छोटे बने घरौंदों में कबूतर रह सकते हैं। उसके थोड़ा नीचे एक चकरी नुमा प्लेट बनी है, जिसमें पानी भारा जाता था और नीचे जमीन पर दाना गिराया जाता था। इसका उद्घाटन 26 दिसंबर 1946 को रायगढ़ स्टेट के दीवान जेएन महंत ने किया था।
हर दिन सुबह पहुंचते हैं शहर के लोग
शहर के वरिष्ठ नागरिक गोपाल अग्रवाल का कहना है कि वह गांधीगंज में ही पैदा हुए और बचपन से इस टावर के यूं देखते आ रहे हैं। आज भी इस टॉवर के पास लोग सुबह शाम आते हैं। कबूतरों को दाना देते हैं। वहां रखे पात्रों में पानी भरते हैं और चले जाते हैं। ऐसा करके लोगों को काफी सुकून मिलता है, जो कि वह खुद अनुभव करते हैं।